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“जुडिशियल सर्वेंट” : क्या यह शब्द न्यायपालिका को और लोकतांत्रिक बनाता है?

ओपिनियन | ABC National News | नई दिल्ली | 11 जुलाई 2026

भारत में वर्षों से सरकारी कर्मचारियों के लिए एक प्रचलित शब्द है— “गवर्नमेंट सर्वेंट”। यह शब्द किसी व्यक्ति की गरिमा कम नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि वह जनता के कर के पैसे से वेतन प्राप्त करता है और जनता की सेवा के लिए नियुक्त है। हाल के दिनों में एक नया शब्द चर्चा में आया है— “जुडिशियल सर्वेंट”। कुछ लोगों को यह शब्द असहज लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र की कसौटी पर देखें तो इस पर गंभीर और शांतिपूर्ण बहस होनी चाहिए।

देश की जिला अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सभी न्यायाधीशों का वेतन सरकारी खजाने से दिया जाता है। यह सरकारी खजाना किसी सरकार का निजी धन नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के टैक्स से बनता है। न्यायाधीशों का दायित्व भी जनता को न्याय देना है। इस दृष्टि से यह कहना कि वे जनता की सेवा करने वाले संवैधानिक पदाधिकारी हैं, किसी भी तरह उनकी गरिमा कम नहीं करता। यदि “गवर्नमेंट सर्वेंट” शब्द स्वीकार्य है, तो “जुडिशियल सर्वेंट” शब्द पर भी विचार किया जा सकता है, बशर्ते उसका आशय न्याय और संविधान की सेवा से हो, न कि किसी प्रकार का अपमान करना।

लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति या संस्था ईश्वर का स्थान नहीं ले सकती। न्यायपालिका लोकतंत्र का एक स्वतंत्र और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसे आलोचना, विमर्श या जवाबदेही से परे माना जाए। न्यायाधीश संविधान की शपथ लेते हैं, किसी राजा या शासक की नहीं। उनका कर्तव्य जनता को निष्पक्ष न्याय देना है। इसलिए उन्हें “जनता का न्यायिक सेवक” कहना लोकतांत्रिक सोच के अधिक निकट प्रतीत होता है, न कि उन्हें किसी अलौकिक या सर्वोच्च मानवीय दर्जे पर स्थापित करना।

इसी संदर्भ में अदालतों में वर्षों से प्रचलित संबोधन “माई लॉर्ड” पर भी विचार होना चाहिए। यह संबोधन औपनिवेशिक ब्रिटिश परंपरा की देन है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां संविधान सर्वोच्च है, कोई व्यक्ति नहीं। सर्वोच्च न्यायालय स्वयं भी समय-समय पर कह चुका है कि वकीलों के लिए न्यायाधीशों को “माई लॉर्ड” या “योर लॉर्डशिप” कहना अनिवार्य नहीं है; “सर”, “मैडम” या “योर ऑनर” जैसे सम्मानजनक संबोधन भी पर्याप्त हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़े शब्दों की जगह अधिक लोकतांत्रिक और भारतीय सोच के अनुरूप भाषा अपनाई जानी चाहिए।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा अक्षुण्ण रहे। “जुडिशियल सर्वेंट” शब्द का अर्थ यदि यह लगाया जाए कि न्यायाधीश सरकार के अधीन कर्मचारी हैं, तो यह संविधान की भावना के विपरीत होगा। लेकिन यदि इसका आशय यह हो कि छोटी अदालत के न्यायाधीश से लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तक सभी संविधान, कानून और जनता के प्रति जवाबदेह सार्वजनिक पदाधिकारी हैं, तो यह लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करता है।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संविधान का होता है। संसद, सरकार और न्यायपालिका—तीनों संविधान से अपनी शक्तियां प्राप्त करते हैं और अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। इसलिए शायद समय आ गया है कि हम पदों के साथ जुड़ी भाषा पर भी पुनर्विचार करें। “माई लॉर्ड” जैसी औपनिवेशिक विरासत की जगह यदि लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करने वाली भाषा विकसित होती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत होगा। “जुडिशियल सर्वेंट” शब्द भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा बन सकता है—एक ऐसा शब्द, जो न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखते हुए यह याद दिलाए कि न्याय अंततः जनता के लिए और जनता के नाम पर ही दिया जाता है।

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