शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 जुलाई 2026
देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) और अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (Institutes of National Importance-INIs) ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक-2025 के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है। इन संस्थानों ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से मांग की है कि उन्हें विधेयक के कई प्रावधानों से बाहर रखा जाए, क्योंकि ये उनकी संवैधानिक और वैधानिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा सांसद डी. पुरंदेश्वरी की अध्यक्षता वाली समिति इस विधेयक की समीक्षा कर रही है। संस्थानों का कहना है कि दशकों में बनी उनकी शैक्षणिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की क्षमता को किसी भी केंद्रीकृत व्यवस्था के अधीन नहीं किया जाना चाहिए।
‘वन नेशन, वन रेगुलेटर’ पर उठे सवाल, केंद्रीकरण पर चिंता
आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने समिति के समक्ष कहा है कि प्रस्तावित विधेयक उच्च शिक्षा के नियमन को अत्यधिक केंद्रीकृत बना सकता है। उनका तर्क है कि संसद के विशेष अधिनियमों के तहत स्थापित इन संस्थानों के लिए पहले से अलग कानूनी व्यवस्था मौजूद है, ऐसे में VBSA के कई प्रावधान उनके वर्तमान कानूनों से टकराव पैदा कर सकते हैं। संस्थानों ने यह भी पूछा है कि क्या उनके ऊपर भी वही नियम लागू होंगे जो अन्य विश्वविद्यालयों पर लागू किए जाएंगे। उनका कहना है कि यदि इस पर स्पष्टता नहीं दी गई तो भविष्य में प्रशासनिक और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं, जिससे देश की शीर्ष शिक्षण संस्थाओं का कामकाज प्रभावित होगा।
दंडात्मक प्रावधानों और स्वायत्तता पर भी जताई आपत्ति
शीर्ष संस्थानों ने विधेयक में प्रस्तावित दंडात्मक प्रावधानों पर भी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि एक समान दंड व्यवस्था सभी संस्थानों पर लागू करने से “अनपेक्षित और असमान परिणाम” सामने आ सकते हैं। उन्होंने समिति से आग्रह किया है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की विशेष प्रकृति और उनकी वैधानिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था बनाई जाए। संस्थानों का मानना है कि शोध, नवाचार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और अकादमिक उत्कृष्टता तभी संभव है जब उन्हें पर्याप्त संस्थागत स्वायत्तता मिले। अब संयुक्त संसदीय समिति इन सुझावों पर विचार कर रही है और संभावना है कि अंतिम रिपोर्ट में इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए विधेयक में संशोधन की सिफारिश की जा सकती है।




