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JDU की आत्महत्या की तैयारी: निशांत कुमार को CM बनाने का मौका खोकर पार्टी BJP के जाल में फंस गई

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राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | पटना/ नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026

बिहार की राजनीति में एक बार फिर JDU की आंतरिक कलह उजागर हो गई है, जो दरअसल पार्टी के अस्तित्व के संकट को छिपाने की बजाय और गहरा कर रही है। ललन सिंह के गुट ने नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने की पूरी ताकत लगाई, क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे JDU में नई ऊर्जा आएगी, युवा नेतृत्व उभरेगा और पार्टी अपनी अलग पहचान बचा पाएगी। लेकिन दूसरे धड़े, जो स्पष्ट रूप से BJP के प्रभाव में है, ने इसका पुरजोर विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि JDU ने एक सुनहरा मौका गंवा दिया, जिससे न सिर्फ पार्टी कमजोर हुई बल्कि बिहार में उसकी स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ गई।

यह विरोध जितना JDU की आंतरिक बात लगती है, उतना ही BJP की रणनीति का हिस्सा भी है। BJP बिल्कुल नहीं चाहती कि JDU कोई अपना मजबूत CM फेस खड़ा करे, खासकर निशांत कुमार जैसे युवा और नीतीश की विरासत से जुड़े चेहरे को। अगर निशांत कुमार मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में आगे बढ़ते तो न केवल JDU कार्यकर्ताओं में नई उम्मीद जागती, बल्कि बिहार की जनता में भी एक नया चेहरा लोकप्रिय होता। लेकिन BJP का मास्टर प्लान तो JDU को पूरी तरह निगलने का है। RSS और BJP की सोच साफ है — नीतीश कुमार का काम लालू प्रसाद यादव को रोकने का था, अब वह मिशन पूरा हो चुका है तो JDU की उपयोगिता समाप्त। अब इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में या सीधे BJP में विलय करके बिहार में एकतरफा BJP राज स्थापित करना है।

दुख की बात यह है कि JDU के कुछ नेता खुद इस खेल में शामिल हो गए हैं। वे समझते हैं कि BJP के साथ रहने में व्यक्तिगत फायदा है, लेकिन इसकी कीमत पार्टी के अस्तित्व और नीतीश कुमार की दशकों की मेहनत से बनी पहचान के साथ चुकानी पड़ रही है। ललन सिंह गुट की कोशिश सराहनीय थी, क्योंकि उन्होंने सही मायने में पार्टी को बचाने की कोशिश की। निशांत कुमार अगर CM फेस बन जाते तो JDU NDA के अंदर भी मजबूत स्थिति में होती और भविष्य की राजनीति में अपनी भूमिका तय कर पाती। लेकिन BJP प्रभावित धड़े ने इसे रोककर जाहिर कर दिया कि वे JDU को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में नहीं, बल्कि BJP का सहायक संगठन बनाकर रखना चाहते हैं।

बिहार की राजनीति में यह एक बड़ा सबक है। जब कोई पार्टी अपना नेतृत्व और निर्णय लेने की स्वतंत्रता खो देती है, तो वह धीरे-धीरे मरने लगती है। नीतीश कुमार ने चाहे जितनी बार गठबंधन बदले हों, लेकिन JDU की अपनी पहचान हमेशा बरकरार रही। आज वही पहचान खतरे में है। अगर JDU के नेता अभी भी अपनी आँखें नहीं खोलते और BJP के इस विलय के एजेंडे का विरोध नहीं करते, तो जल्द ही JDU का नाम सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह जाएगा।

निशांत कुमार को CM बनाने का मौका गंवाना JDU की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है। यह सिर्फ एक पद की लड़ाई नहीं थी, पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई थी। BJP की रणनीति साफ है — सहयोगी को इस्तेमाल करो, मजबूत होने मत दो और अंत में निगल लो। सवाल यह है कि JDU के नेता अब भी इस हकीकत को समझेंगे या चुपचाप BJP का हिस्सा बनकर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने में लगे रहेंगे? बिहार की जनता देख रही है और इतिहास भी।

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