राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026
नई दिल्ली। लोकसभा में आज पीएम नरेंद्र मोदी ने जो कुछ कहा, वो सिर्फ एक भाषण नहीं था, बल्कि देश की आने वाली राजनीति की दिशा तय करने वाला ऐलान था। “हम देश को नई दिशा देने जा रहे हैं, हमारी शासन व्यवस्था को संवेदनशीलता से भरने जा रहे हैं। इस मंथन से अमृत निकलेगा, वो देश की राजनीति के रूप-स्वरूप को तय करेगा,” पीएम के इन शब्दों ने सदन में तालियां बजाईं लेकिन विपक्षी बेंचों पर सन्नाटा छा गया। आजकल की ताजा खबरों में छाया यह मुद्दा सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़े परिसीमन विधेयक ने पूरे देश में मतभेद की आग भड़का दी है।
केंद्र सरकार ने आज लोकसभा में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक 2026 पेश कर दिया। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पहला विधेयक पेश किया तो गृह मंत्री अमित शाह ने दूसरे और तीसरे पर दस्तखत किए। वोटिंग में 251 के मुकाबले 185 वोटों से प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन कांग्रेस, सपा, टीएमसी, डीएमके और एआईएमआईएम जैसे दलों ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताते हुए जमकर विरोध किया। सदन में हंगामा मचा, नारेबाजी हुई और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चलता रहा। कुछ लोग इसे महिलाओं की सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं तो कुछ इसे लोकतंत्र पर हमला और दक्षिण बनाम उत्तर का नया खेल मान रहे हैं।
दरअसल, 2023 में पास हुए महिला आरक्षण कानून को अब 2029 के चुनावों से लागू करने के लिए लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने की तैयारी है। परिसीमन के जरिए नए जनसंख्या आधार पर सीटों का बंटवारा होगा, जिससे उत्तर के बड़े राज्यों को फायदा और दक्षिण के राज्यों को नुकसान का डर साफ दिख रहा है। विपक्ष कह रहा है कि बिना नई जनगणना के यह सब करना गलत है, जबकि सरकार दावा कर रही है कि दक्षिण के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा। अमित शाह ने भी यही आश्वासन दिया लेकिन विपक्षी नेता जैसे असदुद्दीन ओवैसी तो साफ कह रहे हैं कि “यह महिला आरक्षण की आड़ में कुछ और है”।
पीएम मोदी ने सदन में जोर देकर कहा कि यह फैसला नारी शक्ति को समर्पित है और देश की राजनीति को नई ऊंचाई देगा। उन्होंने कहा कि पंचायतों में पहले से ही लाखों महिलाएं काम कर रही हैं, अब संसद और विधानसभाओं में उनका वर्चस्व होगा। लेकिन विपक्ष का तर्क है कि सीटें बढ़ाने के नाम पर भाजपा अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। दक्षिणी राज्य जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र में जहां जनसंख्या नियंत्रण बेहतर है, वहां सीटें कम होने का खतरा है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में बढ़ोतरी होगी। यह मतभेद सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन का बड़ा मुद्दा बन गया है।
सदन के बाहर भी चर्चाएं गरम हैं। कुछ महिला संगठन इसे स्वागत योग्य बता रहे हैं और कह रहे हैं कि आखिरकार 30 साल की मांग पूरी होने जा रही है। वहीं कई राजनीतिक विश्लेषक चेतावरा रहे हैं कि परिसीमन बिना ठोस आंकड़ों के किया गया तो संघीय ढांचा कमजोर पड़ सकता है। तीन दिन चलेगी यह विशेष संसदीय सत्र, जिसमें बहस और पास होने के बाद कानून बन जाएगा। लेकिन सवाल अभी भी बाकी है – क्या यह वाकई महिलाओं का उत्थान है या फिर वोट बैंक और सत्ता के समीकरण बदलने की चाल? देश भर में बहस छिड़ी हुई है और आने वाले दिनों में यह और तेज होगी। जनता अब देख रही है कि आखिर यह नई दिशा किसके लिए और किसके खिलाफ साबित होगी।




