राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026
महिला आरक्षण बिल को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। कांग्रेस महासचिव Priyanka Gandhi ने केंद्र सरकार की मंशा पर सीधा हमला बोलते हुए सवाल उठाया है कि जब लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है, तो फिर इसे परिसीमन जैसी लंबी और विवादित प्रक्रिया से क्यों जोड़ा जा रहा है। उनका यह सवाल केवल एक गणितीय तर्क नहीं, बल्कि नीति और नीयत दोनों पर गंभीर प्रश्न के रूप में सामने आया है।
प्रियंका गांधी ने साफ शब्दों में कहा कि महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार देने के लिए शर्तें जोड़ना दरअसल इस पूरे मुद्दे को टालने की रणनीति है। उन्होंने Narendra Modi सरकार पर आरोप लगाया कि महिला सशक्तिकरण को राजनीतिक लाभ के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार की नीयत स्पष्ट है, तो 33 प्रतिशत आरक्षण आज की 543 सीटों में तुरंत लागू किया जा सकता है—इसके लिए किसी अतिरिक्त प्रक्रिया का इंतजार क्यों?”
उन्होंने इस मुद्दे को सामाजिक न्याय के बड़े फ्रेम में रखते हुए ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सवाल भी जोर से उठाया। उनका कहना है कि बिना स्पष्ट कोटा या व्यवस्था के यह आरक्षण अधूरा रहेगा और वास्तविक समानता का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समाज के वंचित वर्गों की महिलाओं को उचित हिस्सेदारी नहीं दी गई, तो यह कानून केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगा।
परिसीमन पर उनकी टिप्पणी सबसे ज्यादा राजनीतिक महत्व रखती है। प्रियंका गांधी ने कहा कि जनसंख्या आधारित सीटों का पुनर्निर्धारण केवल तकनीकी अभ्यास नहीं, बल्कि देश के संघीय संतुलन को प्रभावित करने वाला फैसला है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे कुछ राज्यों को disproportionate फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ सकता है। उनके अनुसार, “यह सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला निर्णय है—और अगर इसमें पारदर्शिता नहीं हुई, तो यह लोकतंत्र पर सीधा वार होगा।”
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की तैयारी कर रही है, जो आज की वास्तविक जनसंख्या संरचना को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता। पार्टी का मानना है कि इससे राजनीतिक असंतुलन और क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।
वहीं, केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम है और इसे एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश कर रही है। भाजपा का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन जरूरी हैं, ताकि सभी वर्गों और क्षेत्रों को संतुलित और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिल सके। सरकार इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक निर्णायक कदम बता रही है।
संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे पर बहस तेज हो चुकी है। एक तरफ विपक्ष इसे अधिकारों में देरी और राजनीतिक रणनीति बता रहा है, तो दूसरी ओर सरकार इसे संरचनात्मक सुधार और दीर्घकालिक न्याय का आधार मान रही है।
स्पष्ट है कि महिला आरक्षण बिल अब केवल विधायी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। 2029 के आम चुनावों से पहले यह बहस और तेज होगी, और इसका असर न केवल चुनावी समीकरणों पर, बल्कि भारत के सामाजिक और संघीय ढांचे पर भी गहराई से दिखाई देगा।




