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भारत में दो-दो बीवियों का बढ़ता चलन? दूसरी शादी के ट्रेंड ने छेड़ी नई बहस… महिलाएं भी कर रही हैं रिमेरिज

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 18 फरवरी 2026

भारत में 43% बढ़ा रीमैरिज ट्रेंड… महिलाएं भी ले रहीं दूसरी पारी का फैसला

भारत में विवाह को लेकर सामाजिक सोच तेजी से बदल रही है। जहां कभी शादी को जीवनभर का अटूट बंधन माना जाता था और दूसरी शादी को संकोच की नजर से देखा जाता था, वहीं अब तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। हालिया वैवाहिक रुझान रिपोर्ट के अनुसार देश में दूसरी शादी यानी रीमैरिज की चाह रखने वालों की संख्या में 43 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि रिश्तों को लेकर भारतीय समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।

हालांकि सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में “दो-दो बीवियों” जैसे शब्द सुर्खियां जरूर बटोर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ साफ करते हैं कि बढ़ता ट्रेंड मुख्य रूप से वैध रूप से पहली शादी समाप्त होने के बाद की नई शुरुआत को दर्शाता है। भारतीय कानून के तहत अधिकांश समुदायों में पहली शादी रहते दूसरी शादी अवैध है। ऐसे में आंकड़ों में दिख रही वृद्धि का संबंध तलाक, आपसी सहमति से अलगाव या जीवनसाथी के निधन के बाद की दूसरी पारी से है। फिर भी, यह बहस जरूर छिड़ी है कि क्या समाज अब रिश्तों को लेकर अधिक व्यावहारिक और खुला हो गया है।

रिपोर्ट की खास बात यह है कि इस बढ़ते ट्रेंड में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। पहले जहां तलाक या विधवा होने के बाद महिलाओं के लिए दोबारा शादी करना सामाजिक रूप से कठिन माना जाता था, वहीं अब शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं अपनी खुशियों और मानसिक संतुलन को प्राथमिकता दे रही हैं। परिवारों में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। कई माता-पिता अब अपनी बेटियों को दूसरी शादी के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि वे अधूरे या असंतोषजनक रिश्ते के बोझ से मुक्त होकर नई शुरुआत कर सकें।

शादी की औसत उम्र का लगभग 29 वर्ष तक पहुंच जाना भी इस व्यापक बदलाव का हिस्सा है। युवा वर्ग अब जल्दबाजी में विवाह करने के बजाय करियर, आर्थिक स्थिरता और मानसिक तैयारी को महत्व दे रहा है। दूसरी शादी के मामलों में यह परिपक्वता और भी स्पष्ट दिखाई देती है। अब रिश्तों में केवल सामाजिक मान्यता या पारिवारिक दबाव नहीं, बल्कि ‘कम्पैटिबिलिटी’ यानी आपसी समझ, सम्मान और जीवन मूल्यों की समानता को सबसे ऊपर रखा जा रहा है। कई लोग खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि पहली पारी में जो गलतियां हुईं, दूसरी पारी में वे उन्हें दोहराना नहीं चाहते।

डिजिटल मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म्स ने इस बदलाव को और गति दी है। तलाकशुदा, विधवा और विधुर प्रोफाइल की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है और उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिल रही है। इससे यह स्पष्ट है कि समाज अब व्यक्ति को उसके अतीत से नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान सोच और भविष्य की संभावनाओं से आंकने लगा है।

कुल मिलाकर, भारत में बढ़ता रीमैरिज ट्रेंड इस बात का संकेत है कि आदमी और महिला दोनों ही अब अपनी खुशियों को प्राथमिकता देने लगे हैं। “दूसरी पारी” अब समझौते की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और बेहतर जीवन की तलाश की प्रतीक बनती जा रही है। बदलते सामाजिक परिवेश में यह रुझान आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकता है।

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