Home » National » बिना सुनवाई 5 साल जेल में रखना जायज़?

बिना सुनवाई 5 साल जेल में रखना जायज़?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

सुमन कुमार | नई दिल्ली | 5 जनवरी 2026

जमानत न मिलना कितना सही, कितना ग़लत?

यह सवाल किसी एक व्यक्ति, किसी एक नाम या किसी एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, यह भारत के न्याय तंत्र, संविधान में निहित मूल अधिकारों और देश में लागू किए गए कठोर कानूनों के आपसी टकराव का प्रतीक बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किया जाना भले ही UAPA की सख्त कानूनी संरचना के भीतर तकनीकी रूप से सही ठहराया जा सकता हो, लेकिन नैतिक और संवैधानिक स्तर पर यह फैसला एक गहरे असहज सवाल को जन्म देता है—क्या किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल, बिना दोष सिद्ध हुए, पांच साल या उससे अधिक समय तक जेल में बंद रखना न्याय की परिभाषा में आता है? यह वही सवाल है जो संविधान की आत्मा को बार-बार कटघरे में खड़ा करता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। दशकों से भारतीय न्यायपालिका यह दोहराती आई है कि “जेल अपवाद है और जमानत नियम”, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को सज़ा से पहले ही सज़ा न भुगतनी पड़े। लेकिन UAPA जैसे विशेष कानून इस सिद्धांत को उलट देते हैं, जहां जमानत लगभग असंभव हो जाती है और लंबी कैद एक स्वाभाविक प्रक्रिया का रूप ले लेती है। सवाल यह नहीं है कि राज्य के पास कठोर कानून होने चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या ऐसे कानून नागरिक स्वतंत्रता को इस हद तक कुचल सकते हैं कि आज़ादी खुद एक अस्थायी अधिकार बन जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आज के आदेश में यह स्वीकार किया कि निरंतर हिरासत और ट्रायल में देरी एक गंभीर चिंता का विषय है और ऐसे मामलों में “हाइटेंड स्क्रूटनी” की आवश्यकता होती है। लेकिन इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि UAPA जैसे कानूनों में केवल लंबी हिरासत को जमानत का आधार नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के बाद स्थिति साफ हो जाती है—कानून की कठोरता के सामने व्यक्ति की स्वतंत्रता गौण हो जाती है। यहां यह सवाल स्वाभाविक है कि अगर पांच साल की कैद भी “संवैधानिक बाध्यता” को पार नहीं करती, तो फिर कितने साल बाद संविधान को बोलने का अधिकार मिलेगा?

असली चिंता आरोपों की गंभीरता नहीं है। असली चिंता यह है कि आरोप और सज़ा के बीच की संवैधानिक दीवार लगातार कमजोर होती जा रही है। अगर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने में ही आठ से दस साल लग जाएं, और वह पूरा समय जेल में बिताए, तो बाद में बरी होने की स्थिति में न्याय का क्या मूल्य रह जाता है? क्या अदालतें यह मानने को तैयार हैं कि एक निर्दोष व्यक्ति की ज़िंदगी के सबसे कीमती साल केवल “प्रक्रिया” के नाम पर निगल लिए गए?

इस फैसले का एक और चिंताजनक पहलू UAPA की वह व्याख्या है, जिसमें अदालत ने कहा कि यह कानून केवल पारंपरिक हिंसक आतंकी गतिविधियों तक सीमित नहीं है। अगर किसी गतिविधि से आवश्यक सेवाएं बाधित होती हैं या अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा होती है, तो उसे भी UAPA के दायरे में लाया जा सकता है। यह व्याख्या लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद गंभीर संकेत देती है, क्योंकि इससे विरोध, आंदोलन, असहमति और नागरिक प्रतिरोध जैसी गतिविधियां भी संदेह के घेरे में आ सकती हैं। जब “आशंका” ही अपराध का आधार बन जाए, तो लोकतंत्र और डर के बीच की रेखा बहुत पतली हो जाती है।

अदालत का यह कहना कि निरंतर हिरासत ने जमानत देने की संवैधानिक बाध्यता को पार नहीं किया है, इस पूरे आदेश का सबसे कठोर और चौंकाने वाला निष्कर्ष है। इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि पांच साल तक बिना सुनवाई के जेल में रहना, अदालत की नज़र में, अपने आप में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। यह निष्कर्ष न केवल आम नागरिक को विचलित करता है, बल्कि न्याय की मानवीय समझ पर भी गहरा आघात करता है। अगर यही तर्क सामान्य बन गया, तो “पहले जेल, बाद में फैसला” कोई असामान्य स्थिति नहीं, बल्कि एक नया सामान्य बन जाएगा।

यह लेख अदालत के आदेश को नकारता नहीं है, लेकिन व्यवस्था से सवाल ज़रूर करता है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर न्याय की गति इतनी धीमी हो सकती है कि आज़ादी खुद सज़ा में बदल जाए? क्या लोकतंत्र में असहमति इतनी महंगी हो सकती है कि उसका जवाब वर्षों की कैद हो? आज यह सवाल उमर खालिद और शरजील इमाम के संदर्भ में उठ रहा है, लेकिन कल यह किसी भी ऐसे आदमी पर लागू हो सकता है जो सत्ता से असहमति रखने का साहस करता है।

यही वजह है कि यह हेडलाइन भावनात्मक न होकर संवैधानिक विवेक को झकझोरने वाली है। जमानत न मिलना कानूनन सही हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ कानून ही नहीं, इंसाफ़ भी मायने रखता है। और जब इंसाफ़ पर यह सवाल उठने लगें कि वह देर से आएगा या आएगा भी या नहीं—तो यह केवल एक मुकदमे की कहानी नहीं रहती, बल्कि पूरे सिस्टम की आत्मा पर सवाल बन जाती है।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments