Home » National » उमर–शरजील को जमानत न देना चौंकाने वाला, अन्यायपूर्ण और शर्मनाक : प्रशांत भूषण

उमर–शरजील को जमानत न देना चौंकाने वाला, अन्यायपूर्ण और शर्मनाक : प्रशांत भूषण

सुमन कुमार | नई दिल्ली 5 जनवरी 2026

2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित “बड़ी साजिश” मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के फैसले पर देश की न्यायिक, बौद्धिक और नागरिक अधिकारों से जुड़ी दुनिया में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को “चौंकाने वाला, अन्यायपूर्ण और शर्मनाक” बताते हुए कड़ी आलोचना की है। सोशल मीडिया पर दिए गए अपने बयान में उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल न्याय के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का मज़ाक उड़ाने जैसा प्रतीत होता है।

प्रशांत भूषण ने स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम पर खुद किसी प्रकार की हिंसा में शामिल होने का आरोप नहीं है, बल्कि उन्हें कथित तौर पर “साजिश” के आरोप में वर्षों से जेल में रखा गया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों से दिए गए दोनों के कई भाषणों के वीडियो आज भी उपलब्ध हैं, जिनमें वे बार-बार हिंसा के खिलाफ बोलते हुए दिखाई देते हैं। इसके बावजूद, बिना ट्रायल और बिना दोष सिद्ध हुए, उन्हें पांच साल से अधिक समय तक जेल में बंद रखना न्याय की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। भूषण के अनुसार, यह स्थिति बेहद गंभीर सवाल खड़े करती है कि क्या भारत में अब सजा पहले और मुकदमा बाद में देने की प्रवृत्ति सामान्य होती जा रही है।

वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उस आधार पर भी गंभीर आपत्ति जताई, जिसके तहत जमानत खारिज करने के लिए पुलिस द्वारा पेश किए गए “संरक्षित गवाहों” (protected witnesses) के बयानों पर भरोसा किया गया। उन्होंने कहा कि जिन गवाहों की पहचान छिपी हुई है, जिनसे अभियुक्तों को खुली और प्रभावी जिरह का अवसर नहीं मिलता, उनके बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रखना न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को गहराई से कमजोर करता है। भूषण के मुताबिक, यह व्यवस्था आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई और अपने बचाव के मौलिक अधिकार के सीधे खिलाफ जाती है।

प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि बिना सुनवाई के पांच साल जेल में बिताना महज़ एक कानूनी तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक नैतिकता और न्याय की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह के फैसले भारत के संविधान के अनुच्छेद 21—जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार—पर सीधा प्रहार हैं। उनके अनुसार, यदि किसी लोकतांत्रिक देश में लंबी हिरासत को सामान्य और स्वीकार्य बना दिया गया, तो यह न्याय नहीं बल्कि एक खतरनाक और भयावह परंपरा की शुरुआत होगी।

इस बयान के सामने आने के बाद एक बार फिर यह बहस तेज़ हो गई है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन आखिर कहां और कैसे साधा जाए। जहां सरकार समर्थक वर्ग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के नजरिये से सही ठहरा रहा है, वहीं वरिष्ठ वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि यह मामला आने वाले समय में भारतीय न्याय व्यवस्था की दिशा और चरित्र तय करने वाला साबित हो सकता है। प्रशांत भूषण के शब्दों में, यह सिर्फ दो व्यक्तियों का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि भारत जैसे लोकतंत्र में आज़ादी की वास्तविक कीमत और अहमियत क्या बची है।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted