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ईरान बोला- ‘पीछे हटने का सवाल नहीं’: होर्मुज, युद्धविराम और पश्चिम एशिया संकट पर बढ़ा वैश्विक तनाव

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तेहरान/वॉशिंगटन/बीजिंग | 14 मई 2026

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने एक बार फिर कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि वह किसी भी दबाव के आगे “पीछे हटने वाला नहीं” है। ईरानी सेना के ब्रिगेडियर जनरल Mohammad Akrami Nia ने कहा कि देश की सेना “सर्वोच्च स्तर की तैयारी” में है और “पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं” है। इस बयान ने ऐसे समय पर वैश्विक चिंताएं बढ़ा दी हैं, जब अमेरिका, चीन और पश्चिम एशियाई देशों के बीच लगातार कूटनीतिक हलचल जारी है। उधर ईरान ने दावा किया है कि अमेरिका ने हालिया इस्लामाबाद वार्ता में दो बड़ी मांगें रखी थीं — पहला, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलना और दूसरा, ईरान के पास मौजूद 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम सामग्री को हटाना। ईरानी वार्ता टीम के सदस्य Mahmoud Nabavian के अनुसार अमेरिका ने सहयोग के बदले छह अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियां जारी करने का प्रस्ताव भी दिया था।

ईरानी सूत्रों के मुताबिक वार्ता के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने समझौते को आगे बढ़ाने के संकेत दिए थे, लेकिन बाद में राष्ट्रपति Donald Trump ने कथित रूप से उस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालांकि अमेरिका की ओर से इन दावों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति Mohammad Reza Aref ने साफ कहा है कि “होर्मुज पर ईरान का अधिकार स्थापित है और इस मुद्दे पर अब कोई बहस नहीं हो सकती।” यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका लगातार चाहता है कि इस समुद्री मार्ग को पूरी तरह खोला जाए ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर जारी तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दे सकता है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल परिवहन का रास्ता इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। तेल कीमतों में तेजी और आपूर्ति संकट ने पहले ही कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है।

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बीजिंग पहुंच चुके हैं, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से होने वाली है। माना जा रहा है कि ईरान युद्ध और होर्मुज संकट इस शिखर वार्ता के सबसे बड़े मुद्दों में शामिल रहेंगे। अमेरिका चाहता है कि चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ईरान को बातचीत की मेज पर वापस लाए और समुद्री मार्ग सामान्य कराए।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चीन इसके बदले अमेरिका से ताइवान और व्यापार नीति पर बड़ी रियायतें मांग सकता है। चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है और उसकी अर्थव्यवस्था भी इस संकट से प्रभावित हो रही है, लेकिन बीजिंग इस स्थिति का इस्तेमाल रणनीतिक दबाव के रूप में भी कर सकता है।

उधर इजरायल और ईरान के बीच तनाव भी कम नहीं हुआ है। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के कार्यालय ने खुलासा किया है कि युद्ध के दौरान उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का “गुप्त दौरा” किया था और वहां UAE के राष्ट्रपति Sheikh Mohammed bin Zayed से मुलाकात की थी। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात का मकसद क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान संकट पर रणनीतिक समन्वय था।

रिपोर्ट्स के अनुसार युद्ध के दौरान ईरान ने UAE को सबसे ज्यादा निशाना बनाया था। इसके बावजूद UAE अमेरिका और इजरायल दोनों के साथ अपने संबंध मजबूत बनाए हुए है। UAE उन अरब देशों में शामिल है जिन्होंने 2020 में Abraham Accords के तहत इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे।

इसी बीच अमेरिकी सीनेट में भी ईरान युद्ध को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया। अमेरिकी सीनेटरों ने बेहद करीबी वोटिंग में ट्रंप की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव को खारिज कर दिया। विपक्षी डेमोक्रेट नेताओं का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन बिना वैधानिक मंजूरी के सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है।

दूसरी तरफ लेबनान और गाजा में भी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। दक्षिणी लेबनान में इजरायली हमलों में कई लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं। वहीं Hamas ने आरोप लगाया है कि इजरायल लगातार युद्धविराम समझौते का उल्लंघन कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा, बल्कि अमेरिका, चीन, ईरान और इजरायल जैसी बड़ी शक्तियों के बीच वैश्विक रणनीतिक टकराव का केंद्र बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में ट्रंप-शी जिनपिंग वार्ता और ईरान की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि दुनिया तनाव कम होने की ओर बढ़ेगी या एक और बड़े भू-राजनीतिक संकट की तरफ।

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