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पर्यावरण से जुड़े तीन बड़े मुद्दों पर दखल जरूरी: जयराम रमेश

महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 30 दिसंबर 2025

कांग्रेस सांसद और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता जयराम रमेश ने पर्यावरण से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया भूमिका को अहम और समय की जरूरत बताया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पुराने फैसले को वापस लेकर अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा से जुड़े आदेश को सुधार किया है, जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि स्वागत योग्य भी है। जयराम रमेश के मुताबिक, इस फैसले को मोदी सरकार ने जिस तरह खुशी-खुशी अपनाया था, वह पर्यावरण के लिहाज से चिंताजनक था। जयराम रमेश ने कहा कि अरावली के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के सामने पर्यावरण से जुड़े तीन और बेहद अहम काम हैं, जिन पर अदालत को खुद संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर दखल देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर इन मामलों में समय रहते फैसला नहीं लिया गया, तो इसका सीधा नुकसान प्रकृति, वन्यजीव और आम लोगों को होगा।

पहला मुद्दा :

पहला मुद्दा राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व से जुड़ा है। जयराम रमेश ने याद दिलाया कि 6 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को रोक दिया था, जिसमें सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाएं बदलकर करीब 57 बंद पड़ी खदानों को दोबारा खोलने की बात कही गई थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए, क्योंकि इससे वन्यजीवों और जंगलों को भारी नुकसान पहुंचेगा।

दूसरा मुद्दा :

दूसरा मुद्दा पर्यावरण मंजूरी से जुड़ा है। जयराम रमेश ने कहा कि 18 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 16 मई 2025 के फैसले की समीक्षा का रास्ता खोल दिया था, जिसमें पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी (रेट्रोस्पेक्टिव अप्रूवल) पर रोक लगाई गई थी। उनके मुताबिक, ऐसी मंजूरियां कानून और न्याय की मूल भावना के खिलाफ हैं और शासन व्यवस्था का मजाक बनाती हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि किसी भी हालत में पिछली तारीख से दी जाने वाली पर्यावरण मंजूरी की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

तीसरा मुद्दा :

तीसरा मुद्दा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का है। जयराम रमेश ने कहा कि एनजीटी की स्थापना 2010 में संसद के कानून के तहत, सुप्रीम कोर्ट की सलाह और समर्थन से की गई थी। लेकिन बीते दस वर्षों में इसकी शक्तियों को लगातार कमजोर किया गया है। उनका कहना है कि अब सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी हो गया है, ताकि एनजीटी बिना किसी दबाव, डर या पक्षपात के कानून के मुताबिक अपना काम कर सके। जयराम रमेश का कहना है कि पर्यावरण की रक्षा सिर्फ कागजों और भाषणों से नहीं होगी। इसके लिए मजबूत कानून, ईमानदार नीयत और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं की सक्रिय भूमिका बेहद जरूरी है, ताकि विकास के नाम पर प्रकृति की बलि न दी जाए।

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