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इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम आदेश: राज्य के अंदर गोवंश परिवहन अपने आप में अपराध नहीं

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राष्ट्रीय/ उत्तर प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज | 18 अप्रैल 2026

उत्तर प्रदेश में गोवंश से जुड़े मामलों पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि राज्य के भीतर गाय या अन्य गोवंश (बछड़ा, बैल आदि) को वाहन में एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना मात्र अपराध की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें गोवंश परिवहन के आरोप में वाहन को जब्त किया गया था।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल परिवहन के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि पशुओं को अवैध वध या तस्करी के उद्देश्य से ले जाया जा रहा था। अदालत ने यह भी कहा कि संदेह मात्र के आधार पर आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।

वाहन जब्ती पर सख्ती

मामले की सुनवाई कर रही पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह शामिल थे, ने वाहन जब्ती को लेकर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि जब रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि गोवंश को वध के लिए ले जाया जा रहा था, तो वाहन को जब्त करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी नोट किया कि न तो वाहन से बीफ बरामद हुआ और न ही किसी अवैध गतिविधि के संकेत मिले, ऐसे में कार्रवाई को कानूनी कसौटी पर खरा नहीं माना जा सकता।

कानून की व्याख्या

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोहत्या निवारण अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा कि इस कानून का उद्देश्य अवैध वध और तस्करी को रोकना है, न कि सामान्य परिस्थितियों में पशुओं के परिवहन को अपराध घोषित करना। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रतिबंध मुख्यतः अवैध गतिविधियों से जुड़े मामलों पर लागू होते हैं, न कि सामान्य आवागमन पर।

पहले भी उठे दुरुपयोग के सवाल

अदालत ने यह भी माना कि इस प्रकार के मामलों में पहले भी कानून के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई हैं। कई मामलों में केवल संदेह के आधार पर लोगों को आरोपी बना दिया जाता है, जो न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

व्यापक संदेश

इस फैसले के जरिए अदालत ने साफ किया है कि कानून का इस्तेमाल तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। किसी भी कार्रवाई से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वास्तव में अपराध हुआ है या नहीं।

यह आदेश गोवंश से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है, जिसका असर भविष्य में पुलिस कार्रवाई और निचली अदालतों के फैसलों पर भी पड़ सकता है।

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