महेंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली 30 अक्टूबर 2025
भारत आज शिक्षा के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसके निर्णय आने वाले दशकों का चेहरा तय करेंगे। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) ने शिक्षा को समावेशी, लचीला और कौशल-आधारित बनाने की दिशा दिखाई है। लेकिन जमीनी स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश में गुणवत्तापूर्ण, सस्ती और समान अवसर देने वाली स्कूल व्यवस्था मौजूद है? उत्तर है — आंशिक रूप से।
देश के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के प्रयासों के बावजूद, एक बड़ा तबका अब भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर है। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा को एक “बाज़ार” में बदल दिया है, जहाँ आम आदमी की पहुँच सीमित होती जा रही है। ऐसे समय में केंद्रीय विद्यालय (Kendriya Vidyalaya) और जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) जैसी संस्थाएँ आशा की किरण बनकर उभरती हैं — जो शिक्षा में समानता और गुणवत्ता दोनों का प्रतीक हैं।
केंद्रीय विद्यालय — एक सफल मॉडल, लेकिन संख्या में सीमित
वर्तमान में देशभर में लगभग 1,250 केंद्रीय विद्यालय हैं, जहाँ केंद्रीय कर्मचारियों, सेना के जवानों, और अन्य नागरिकों के बच्चे कम खर्च में उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करते हैं।
इन स्कूलों में शिक्षण का स्तर, अनुशासन और सर्वांगीण विकास पर ध्यान, इन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों में शुमार करता है।
लेकिन सवाल यही है — क्या यह संख्या पर्याप्त है?
स्पष्ट रूप से नहीं। 135 करोड़ की आबादी वाले देश में महज़ 1,250 केंद्रीय विद्यालय एक समुद्र में बूंद के समान हैं। यदि सरकार कम से कम एक लाख केंद्रीय विद्यालय स्थापित करे, तो यह भारत की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने वाला कदम साबित हो सकता है।
नवोदय विद्यालय — ग्रामीण भारत की प्रतिभा को मंच
जवाहर नवोदय विद्यालय ग्रामीण भारत के बच्चों के लिए वरदान हैं। देश के 661 नवोदय विद्यालयों ने लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देकर उनका भविष्य संवारा है। यह स्कूल इस बात का उदाहरण हैं कि यदि समान अवसर दिया जाए तो गाँव का बच्चा भी वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल कर सकता है।
अब समय है कि प्रत्येक ज़िले, प्रत्येक ब्लॉक और यहाँ तक कि प्रत्येक तहसील में नवोदय विद्यालय खोले जाएँ — ताकि ग्रामीण भारत की प्रतिभा सीमाओं से मुक्त होकर आगे बढ़ सके।
शिक्षा और रोजगार — दोहरा लाभ
केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों का विस्तार केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि रोजगार सृजन का विशाल अवसर भी है। अगर एक लाख केंद्रीय विद्यालय स्थापित होते हैं, तो देशभर में लाखों शिक्षकों, प्रशासनिक कर्मचारियों और सहयोगी स्टाफ के लिए नौकरियाँ सृजित होंगी।
साथ ही, इन विद्यालयों के निर्माण, रखरखाव और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नया जीवन मिलेगा।
इससे भारत में “शिक्षित भारत – रोजगारयुक्त भारत” का सपना साकार हो सकता है।
क्यों ज़रूरी है यह विस्तार
- शिक्षा में समान अवसर – गरीब, मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों के बच्चे भी उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे।
- गुणवत्ता में सुधार – केंद्रीय विद्यालयों का मानक पूरे सरकारी स्कूल सिस्टम में गुणवत्ता की नई परिभाषा तय करेगा।
- आर्थिक न्याय – कम खर्च में उच्च शिक्षा का अवसर, आर्थिक असमानता को घटाएगा।
- राष्ट्रीय एकता का सेतु – ये विद्यालय देश के विभिन्न हिस्सों के छात्रों को एक मंच पर लाते हैं, जिससे भारतीयता की भावना मजबूत होती है।
मौजूदा पहलें और आगे की राह
सरकार द्वारा शुरू की गई PM-SHRI स्कूल योजना, DIKSHA प्लेटफॉर्म, SWAYAM कोर्सेज, और एकलव्य मॉडल विद्यालय जैसी योजनाएँ शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में अहम हैं। लेकिन अब ज़रूरत है कि इन्हीं पहलों के साथ केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों का नेटवर्क तेज़ी से विस्तारित किया जाए। अगर देश हर ज़िले में औसतन 100 केंद्रीय विद्यालय और 20 नवोदय विद्यालय स्थापित करने का लक्ष्य रखे, तो अगले पाँच वर्षों में भारत विश्व की सबसे बड़ी सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का उदाहरण बन सकता है।
शिक्षा में निवेश ही सबसे बड़ा राष्ट्र निर्माण
शिक्षा किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
केंद्रीय विद्यालयों का विस्तार केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि यह भारत के भविष्य को दिशा देने वाला राष्ट्रीय संकल्प होगा। एक लाख केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना का लक्ष्य — हर बच्चे तक समान, सस्ती और उत्कृष्ट शिक्षा पहुँचाने की गारंटी बन सकता है।
यही कदम भारत को न सिर्फ “विकसित राष्ट्र” की राह पर ले जाएगा, बल्कि उसे एक सशिक्षित, सक्षम और आत्मनिर्भर समाज में बदल देगा। वास्तव में, एक लाख केंद्रीय विद्यालय ही भारत की शिक्षा क्रांति की सच्ची बुनियाद बन सकते हैं।
एक लाख उत्कृष्ट सरकारी विद्यालयों की स्थापना न केवल भारत की शिक्षा व्यवस्था को नया आयाम दे सकती है, बल्कि यह देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को भी सशक्त बना सकती है। इन विद्यालयों के माध्यम से लाखों शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सम्मानजनक नौकरी का अवसर मिलेगा, वहीं करोड़ों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित होगा। यह पहल केवल स्कूल खोलने की नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय शिक्षा क्रांति की दिशा में कदम होगी — जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को उजाला देगी और भारत को ज्ञान, रोजगार और समानता के मार्ग पर अग्रसर करेगी।




