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अगर नमाजियों की संख्या से कानून-व्यवस्था बिगड़ती है तो पद छोड़ दें : इलाहाबाद हाई कोर्ट की SP-DM को सख्त टिप्पणी

एबीसी नेशनल न्यूज | प्रयागराज | 14 मार्च 2026

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यदि किसी जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) और जिलाधिकारी (DM) को यह लगता है कि मस्जिदों में नमाज पढ़ने आने वाले लोगों की संख्या बढ़ने से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है, तो उन्हें अपने पद पर बने रहने के बजाय इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर सरकार से अपना तबादला करवा लेना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की मूल जिम्मेदारी है और यदि अधिकारी इस जिम्मेदारी को निभाने में स्वयं को सक्षम नहीं मानते तो उन्हें उस पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन की उस दलील पर गंभीर आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था कि किसी धार्मिक स्थल पर बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। अदालत ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, पूजा-अर्चना करने और धार्मिक स्थलों पर जाने का मौलिक अधिकार देता है। ऐसे में यदि प्रशासन यह तर्क देता है कि लोगों के धार्मिक कार्यक्रमों या नमाज में शामिल होने से व्यवस्था बिगड़ सकती है, तो यह प्रशासनिक अक्षमता का संकेत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का काम लोगों के अधिकारों को सीमित करना नहीं बल्कि उचित सुरक्षा व्यवस्था और प्रबंधन के माध्यम से कानून-व्यवस्था को बनाए रखना है।

अदालत ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक गतिविधि को संभावित कानून-व्यवस्था की समस्या बताकर सीमित करना संवैधानिक अधिकारों की भावना के विपरीत है। न्यायालय के अनुसार यदि किसी स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं तो प्रशासन को अपनी तैयारियों और व्यवस्थाओं को मजबूत करना चाहिए, न कि नागरिकों के धार्मिक अधिकारों पर प्रश्न खड़ा करना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अधिकारी यह मानते हैं कि वे ऐसी स्थिति को संभाल नहीं सकते तो उन्हें अपने पद से हट जाना चाहिए, क्योंकि प्रशासनिक पद पर बैठा अधिकारी जनता की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही नियुक्त किया जाता है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने जिला प्रशासन से विस्तृत जवाब भी मांगा और यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर किन परिस्थितियों में नमाजियों की संख्या को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया। अदालत ने प्रशासन को यह भी याद दिलाया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। यदि प्रशासन स्वयं ही ऐसे अधिकारों को खतरे के रूप में प्रस्तुत करने लगे तो यह शासन व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद कानूनी और प्रशासनिक हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। कई विधि विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह रुख प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। उनका कहना है कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है और इसे निभाने में असमर्थता का बहाना बनाकर नागरिकों के धार्मिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत प्रशासन द्वारा दिए जाने वाले विस्तृत जवाब और प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी। फिलहाल अदालत की इस टिप्पणी ने प्रशासनिक जिम्मेदारी, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है, जिसकी गूंज राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी सुनाई दे रही है।

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