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मुस्लिम संत बनें तो स्वागत, मेरा विरोध क्यों?— हर्षा रिछारिया

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धर्म / आस्था | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज / नई दिल्ली | 22 अप्रैल 2026

संन्यास के फैसले पर उठे सवालों का दिया जवाब, बोलीं— महाकुंभ ने बदली जिंदगी, सोशल मीडिया पर रहूंगी सक्रिय

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और हाल ही में संन्यास लेने को लेकर चर्चा में आईं हर्षा रिछारिया ने अपने फैसले पर उठ रहे सवालों का खुलकर जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि जब कोई मुस्लिम संत बनता है तो समाज उसे सहजता से स्वीकार करता है, लेकिन उनके संन्यास लेने पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जो समझ से परे है। उनके इस बयान के बाद एक नई बहस ने जन्म ले लिया है। हर्षा रिछारिया मूल रूप से एक सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर के तौर पर जानी जाती रही हैं। इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर उनकी अच्छी-खासी फॉलोइंग रही है, जहां वह लाइफस्टाइल, विचार और निजी अनुभव साझा करती थीं। लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की ओर रुख किया और संन्यास लेने का फैसला किया, जिसने उन्हें अचानक सुर्खियों में ला दिया।

उन्होंने कहा कि उनका यह निर्णय किसी दबाव या दिखावे का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी आंतरिक अनुभूति का परिणाम है। हर्षा के मुताबिक महाकुंभ में शामिल होने के बाद उनकी सोच पूरी तरह बदल गई। “महाकुंभ ने मुझे भीतर से झकझोर दिया, मुझे एहसास हुआ कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है,” उन्होंने कहा।

संन्यास के बावजूद हर्षा ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सोशल मीडिया से दूरी नहीं बनाएंगी। उनका कहना है कि आज के दौर में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम है और वह इसके जरिए सकारात्मक संदेश और अपने आध्यात्मिक अनुभव लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं। “मैं पहले की तरह एक्टिव रहूंगी, लेकिन अब मेरा कंटेंट अलग होगा—अधिक शांत, अधिक सार्थक,” उन्होंने जोड़ा।

उनके बयान का सबसे चर्चित हिस्सा वह रहा, जिसमें उन्होंने धार्मिक पहचान और सामाजिक स्वीकार्यता पर सवाल उठाया। “अगर कोई मुस्लिम संत बनता है तो समाज उसे स्वीकार करता है, लेकिन मेरे फैसले पर विरोध क्यों?”—इस सवाल ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं; कुछ लोग उनके साहस और स्पष्टता की सराहना कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे अनावश्यक विवाद मान रहे हैं।

फिलहाल, हर्षा रिछारिया का यह कदम और उनके बयान दोनों ही सार्वजनिक बहस का विषय बन चुके हैं। यह मामला अब केवल एक व्यक्ति के निजी निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आस्था, पहचान और समाज की सोच से जुड़ा बड़ा विमर्श बनता जा रहा है।

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