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क्या जुल्म करने वाले लोग इतने निष्ठुर हो चुके हैं, या समाज कहीं चूक रहा है?

एबीसी नेशनल न्यूज | इंदौर | 20 फरवरी 2026

मध्य प्रदेश के Indore में MBA छात्रा की हत्या और अदालत में पेशी के दौरान आरोपी के चेहरे पर दिखी कथित मुस्कान ने पूरे देश को विचलित कर दिया है। सवाल केवल एक अपराध का नहीं है, बल्कि उस मनःस्थिति का है जो किसी आदमी को इतना संवेदनहीन बना देती है कि वह एक जीवन समाप्त करने के आरोप में घिरा होने के बावजूद भावशून्य दिखाई दे। क्या हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां अपराध के बाद भी अपराधबोध लुप्त होता जा रहा है?

अदालतें साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती हैं, भावनाओं के आधार पर नहीं। इसलिए किसी आरोपी के चेहरे के भाव से कानूनी निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। फिर भी समाज भावनात्मक प्रतिक्रिया देता है—क्योंकि यहां बात एक युवा छात्रा की जिंदगी की है, उसके सपनों की है, उसके परिवार के टूट जाने की है। जब ऐसे मामले में आरोपी सार्वजनिक रूप से निश्चिंत या मुस्कराता हुआ दिखे, तो यह पीड़ा को और गहरा कर देता है।

यह घटना हमें कई स्तरों पर आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है। पहला प्रश्न है—क्या युवाओं के रिश्तों में संवाद की जगह अहंकार और स्वामित्व की भावना ले रही है? प्रेम यदि अधिकार में बदल जाए और असहमति को अपमान समझा जाए, तो परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। दूसरा प्रश्न है—क्या हम मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त गंभीरता से ले रहे हैं? भावनात्मक अस्थिरता, अस्वीकृति को न झेल पाने की प्रवृत्ति और क्रोध प्रबंधन की कमी कई बार हिंसा का रूप ले लेती है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—सामाजिक संस्कार। क्या हम अपने बच्चों को यह सिखा पा रहे हैं कि संबंध बराबरी के होते हैं, स्वामित्व के नहीं? कि “ना” का अर्थ “ना” होता है? कि असफल प्रेम या टूटे रिश्ते जीवन का अंत नहीं, बल्कि अनुभव का हिस्सा होते हैं? यदि परिवार, शिक्षा संस्थान और समाज मिलकर यह बुनियादी शिक्षा देने में असफल होते हैं, तो ऐसी घटनाएं केवल कानूनी मामला नहीं रह जातीं—वे सामाजिक विफलता का आईना बन जाती हैं।

हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि भावनात्मक आक्रोश न्याय प्रक्रिया पर हावी न हो। किसी भी आरोपी को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल अदालत को है। लेकिन समाज का यह अधिकार भी है कि वह न्याय व्यवस्था से पारदर्शिता, तेजी और संवेदनशीलता की अपेक्षा करे। जब अपराध जघन्य हो और पीड़ित युवा हो, तो न्याय में देरी समाज के विश्वास को कमजोर करती है।

आज जरूरत केवल कठोर सजा की मांग करने की नहीं, बल्कि रोकथाम की रणनीति बनाने की है। कॉलेजों में काउंसलिंग सिस्टम मजबूत हो, रिश्तों और लैंगिक सम्मान पर खुली बातचीत हो, और परिवार बच्चों के भावनात्मक संघर्ष को हल्के में न लें—ये सब उतने ही जरूरी कदम हैं जितना कि सख्त कानून।

अंततः सवाल यही है—क्या जुल्म करने वाले लोग निष्ठुर हो चुके हैं, या हम सबने मिलकर संवेदनशील समाज गढ़ने की जिम्मेदारी कहीं पीछे छोड़ दी है? अगर हम केवल हर घटना के बाद आक्रोश व्यक्त करेंगे और मूल कारणों पर काम नहीं करेंगे, तो ऐसी खबरें फिर लौटेंगी। न्याय केवल अदालत का फैसला नहीं होता, वह समाज की चेतना का स्तर भी होता है।

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