राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026
करीबी सहयोगी पर ईडी की कार्रवाई के बाद सामने आए हरिश रावत
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरिश रावत ने शनिवार को बड़ा बयान दिया। अपने एक सहयोगी पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद रावत ने कहा कि वह कांग्रेस में अपने दो पदों से हटना चाहते हैं। उनका कहना है कि किसी सहयोगी पर लगे आरोपों की वजह से कांग्रेस की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। रावत का यह बयान ऐसे समय आया है जब ईडी ने उनके पूर्व कार्यकाल से जुड़े एक अधिकारी और उनके निजी सहायक रहे चंदन सिंह जीना से जुड़े ठिकानों पर तलाशी की है।
ईडी की छापेमारी में क्या मिला?
ईडी के अनुसार, यह कार्रवाई 2016 के वीपीडीओ परीक्षा मामले से जुड़ी जांच के तहत की गई। एजेंसी ने चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसरों पर तलाशी के दौरान 32 लाख रुपये नकद, सोना और महंगी घड़ियां जब्त किए जाने की बात कही है। जीना उस समय हरिश रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विशेष कार्याधिकारी यानी ओएसडी के रूप में काम कर चुके थे। ईडी की कार्रवाई के बाद इस मामले ने उत्तराखंड की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है।
रावत ने खुद क्यों सामने आकर पद छोड़ने की बात कही?
हरिश रावत ने कहा कि कांग्रेस और उसके कार्यकर्ता भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एकजुट हैं। उनका कहना है कि उनके किसी सहयोगी से जुड़े आरोपों का असर पार्टी की इस लड़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस के दो पदों से हटने की इच्छा जताई। उनका संदेश साफ है कि व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा उसका सिद्धांत होना चाहिए। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि पार्टी ने उनके पद छोड़ने के प्रस्ताव को स्वीकार किया है या नहीं।
2016 का वीपीडीओ परीक्षा मामला फिर चर्चा में
इस कार्रवाई ने करीब एक दशक पुराने वीपीडीओ परीक्षा मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। वीपीडीओ यानी ग्राम पंचायत विकास अधिकारी की परीक्षा से जुड़ा यह मामला पहले भी उत्तराखंड में विवाद का विषय रहा है। अब ईडी की कार्रवाई के बाद जांच का वित्तीय पहलू भी चर्चा में है। हालांकि, किसी व्यक्ति के ठिकाने से नकदी, सोना या महंगी वस्तुएं बरामद होना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता। आगे की जांच में इन संपत्तियों और धन के स्रोत से जुड़े सवालों की जांच होना जरूरी है।
सवाल सहयोगी पर कार्रवाई से आगे का है
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि अगर किसी पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में काम कर चुके अधिकारी या सहयोगी पर गंभीर वित्तीय जांच चल रही है, तो राजनीतिक जिम्मेदारी की सीमा कहां तक तय होगी? क्या सिर्फ संबंधित व्यक्ति की जांच होगी या उस समय के फैसलों और प्रशासनिक व्यवस्था की भी पड़ताल होगी? दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी मानने से पहले कानूनी प्रक्रिया पूरी होने दी जाए।
रावत के बयान का राजनीतिक संदेश
हरिश रावत का पद छोड़ने की इच्छा जताना अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। वह लंबे समय से कांग्रेस की उत्तराखंड राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। ऐसे समय में जब उनके पूर्व सहयोगी से जुड़ी ईडी की कार्रवाई चर्चा में है, उन्होंने खुद को पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति से अलग खड़ा करने के बजाय पद छोड़ने की इच्छा जताई है। अब निगाह कांग्रेस नेतृत्व पर है कि वह उनके प्रस्ताव पर क्या फैसला करता है और इस पूरे मामले में पार्टी का अगला राजनीतिक कदम क्या होता है।
ईडी की कार्रवाई के बाद कांग्रेस के सामने भी चुनौती
कांग्रेस के लिए चुनौती केवल राजनीतिक बयान देने की नहीं है। पार्टी को यह भी स्पष्ट करना होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी नीति सभी मामलों में एक जैसी है। अगर किसी नेता या उसके सहयोगी से जुड़े मामले में जांच होती है, तो पार्टी की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वह जांच का सामना किस तरह करती है। रावत का बयान इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन आगे की स्थिति ईडी की जांच और पार्टी के फैसले पर निर्भर करेगी।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल ईडी की जांच जारी है और बरामदगी से जुड़े तथ्यों की कानूनी जांच होनी बाकी है। हरिश रावत ने अपने दो कांग्रेस पदों से हटने की इच्छा जताई है, लेकिन उनके इस्तीफे या पदमुक्ति पर अंतिम फैसला पार्टी को करना होगा। दूसरी तरफ जांच एजेंसी को यह पता लगाना होगा कि बरामद नकदी, सोने और महंगी घड़ियों का स्रोत क्या है और इनका 2016 के वीपीडीओ परीक्षा मामले से क्या संबंध है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हरिश रावत का पद छोड़ने का फैसला कांग्रेस की भ्रष्टाचार के खिलाफ छवि को मजबूत करेगा, और क्या ईडी की जांच अब 2016 के परीक्षा मामले के पीछे छिपे पूरे वित्तीय नेटवर्क तक पहुंचेगी?


