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ज्ञानेश कुमार ने इतने गैरकानूनी काम किए हैं कि पश्चिम बंगाल और बिहार के चुनाव भी कैंसिल होने चाहिए — पूर्व CEC एस.वाई. क़ुरैशी

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अक्टूबर 2026

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर उठे विवाद ने अब बेहद गंभीर रूप ले लिया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. क़ुरैशी ने चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और सामने आई रिपोर्टों के संदर्भ में सवाल उठाया है कि यदि चुनावी प्रक्रिया में कानून और निर्धारित नियमों की अनदेखी हुई है, तो उसके आधार पर कराए गए चुनावों की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं। क़ुरैशी ने हालिया घटनाक्रम को चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने से लेकर Form-6 में बदलाव, चुनावी डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े फैसलों तक कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक मामले में Form-6 से जुड़े बदलाव को “unauthorised” और “illegal” तक बताया गया था।

यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को सामान्य राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे पहुंचा दिया है। सवाल अब यह नहीं है कि विपक्ष चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है या नहीं। सवाल यह है कि अगर आयोग के भीतर ही दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले या प्रक्रिया पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे थे, तो उन आपत्तियों का क्या हुआ? किस प्रक्रिया के तहत फैसले लिए गए? क्या तीन सदस्यीय आयोग में सभी सदस्यों की वास्तविक भागीदारी थी? और यदि किसी निर्णय को बाद में बदलना पड़ा, तो मूल निर्णय किस आधार पर लिया गया था?

पूर्व CEC क़ुरैशी ने भी इसी संस्थागत सवाल को उठाया है। उनके अनुसार विवाद अब केवल SIR की नीति का नहीं रह गया, बल्कि यह प्रश्न बन गया है कि क्या चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए फैसले वास्तव में पूरे चुनाव आयोग के फैसले थे। उन्होंने चुनाव आयोग की आंतरिक स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया में संस्थागत सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया है।

विवाद का दूसरा बड़ा मोर्चा Form-6 और चुनावी सॉफ्टवेयर है। रिपोर्टों के अनुसार Form-6 में किए गए बदलावों को लेकर आयोग के भीतर आपत्तियां दर्ज हुईं। विपक्ष का आरोप है कि यदि किसी वैधानिक प्रक्रिया में बदलाव करना था तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए था। कपिल सिब्बल ने भी आरोप लगाया है कि Form-6 से संबंधित बदलाव आवश्यक केंद्रीय अधिसूचना के बिना किए गए और ECI NET के जरिए मतदाता जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया को केंद्रीकृत किया गया। ये उनके आरोप हैं; चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर इन विवादों पर अलग स्पष्टीकरण दिया है।

अब सवाल सीधे चुनावों की विश्वसनीयता तक पहुंच गया है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने बिहार, पश्चिम बंगाल समेत हालिया चुनावों को लेकर दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग के रिकॉर्ड, असहमति संबंधी नोट्स और कथित एकतरफा फैसलों की जांच करने तथा हालिया चुनावों की वैधता पर विचार करने की मांग की है। यह फिलहाल राजनीतिक और कानूनी मांग है; किसी चुनाव को रद्द करने का अधिकार संबंधित संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही तय होगा।

चुनाव आयोग का पक्ष भी इस विवाद का अहम हिस्सा है। आयोग ने कहा है कि SIR से संबंधित प्रक्रिया तीनों चुनाव आयुक्तों की निगरानी में हुई और आयोग ने अपने निर्णयों को लेकर स्पष्टीकरण दिए हैं। इसलिए अब असली लड़ाई आरोप बनाम आरोप की नहीं, बल्कि रिकॉर्ड बनाम रिकॉर्ड की है—कौन सा फैसला कब लिया गया, किसने लिया, किस आधार पर लिया गया और उस समय आयोग के प्रत्येक सदस्य की क्या राय थी।

ऐसे में पूर्व CEC की टिप्पणी ने पहले से गरम राजनीतिक बहस में एक और बड़ा सवाल जोड़ दिया है। अगर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर ही गंभीर संस्थागत सवाल उठ रहे हैं, तो मतदाता अपने वोट और मतदाता सूची की शुचिता पर भरोसा कैसे बनाए रखे? यही वह सवाल है जिसका जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी रिकॉर्ड, स्वतंत्र जांच और स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया से मिलना चाहिए।

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