ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू / नई दिल्ली | 20 मई 2026
नेपाल द्वारा धान रोपाई सीजन से ठीक पहले भारत से आपातकालीन आधार पर रासायनिक उर्वरक आयात की कोशिश केवल एक सामान्य कृषि समाचार नहीं है। यह पूरी दक्षिण एशियाई खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के भीतर पैदा हो रहे उस गहरे संकट का संकेत है, जिसकी जड़ें अब स्थानीय कृषि नीतियों से कहीं आगे जाकर वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा बाजार और युद्धों से जुड़ चुकी हैं। नेपाल ने भारत की सरकारी कंपनी Rashtriya Chemicals and Fertilisers Limited से 80 हजार टन यूरिया और डीएपी उर्वरक की आपूर्ति के लिए औपचारिक प्रक्रिया शुरू की है। लेकिन इस खबर का वास्तविक अर्थ कहीं अधिक बड़ा है — दुनिया की खाद्य व्यवस्था अब युद्ध, समुद्री मार्गों और ऊर्जा संकट की बंधक बनती जा रही है।
नेपाल की स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि उसकी कृषि प्रणाली बड़े पैमाने पर आयातित उर्वरकों पर निर्भर है। धान नेपाल की खाद्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और देश की बड़ी आबादी के लिए कैलोरी तथा प्रोटीन का मुख्य स्रोत भी। ऐसे में यदि रोपाई के समय उर्वरक नहीं पहुंचते, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा; यह सीधे खाद्य कीमतों, ग्रामीण आय, सामाजिक स्थिरता और आयात निर्भरता पर दिखाई देगा। नेपाल पहले ही बजट सीमाओं और बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण अपनी अनुमानित उर्वरक खरीद घटाने को मजबूर हो चुका है। सरकार ने जहां 5.5 लाख टन आयात का लक्ष्य रखा था, वहीं वास्तविक क्षमता अब लगभग 4.4 लाख टन तक सिमटती दिखाई दे रही है।
इस संकट की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितता है। दुनिया के तेल, गैस, सल्फर और उर्वरक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में युद्ध या आपूर्ति बाधा बढ़ती है, तो उसका असर केवल ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य उत्पादन की वैश्विक लागत पर भी पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि उर्वरकों की कमी और ऊर्जा लागत में वृद्धि 2026 और 2027 में वैश्विक खाद्य आपूर्ति को कमजोर कर सकती है। यह चेतावनी अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई; नेपाल जैसी अर्थव्यवस्थाएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बनती जा रही हैं।
यह पूरा घटनाक्रम एक और बड़े सवाल को सामने लाता है — क्या दक्षिण एशिया अपनी कृषि सुरक्षा को लेकर अत्यधिक बाहरी निर्भरता का शिकार हो चुका है? भारत, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की कृषि व्यवस्था आज वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनावों से गहराई से प्रभावित हो रही है। यदि उर्वरक आपूर्ति कुछ सप्ताह देर से पहुंचे, तो पूरी फसल चक्र प्रभावित हो सकता है। कृषि किसी फैक्ट्री उत्पादन की तरह “पोस्टपोन” नहीं की जा सकती। बीज, बारिश और उर्वरक — तीनों को तय समय पर मिलना ही पड़ता है। यही कारण है कि खाद संकट अंततः खाद्य संकट में बदलने की क्षमता रखता है।
नेपाल के लिए स्थिति और जटिल इसलिए है क्योंकि वहां जलवायु परिवर्तन का दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस बार सामान्य से कम मानसून की आशंका जताई है। लगातार तीन वर्षों की अधिक बारिश के बाद यदि इस बार वर्षा कम होती है और उसी समय उर्वरक संकट पैदा होता है, तो कृषि उत्पादन पर दोहरी मार पड़ सकती है। इससे ग्रामीण क्रय शक्ति घटेगी, खाद्य महंगाई बढ़ेगी और नेपाल को अधिक खाद्यान्न आयात करना पड़ सकता है। कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में यही स्थितियां धीरे-धीरे सामाजिक अस्थिरता और राजनीतिक दबाव का कारण बनती हैं।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम रणनीतिक महत्व रखता है। नेपाल का भारत से उर्वरक आयात केवल व्यापार नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है। यदि भारत समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करता है, तो यह न केवल पड़ोसी देश की कृषि सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में भारत की भूमिका भी मजबूत करेगा। दक्षिण एशिया में खाद्य और कृषि सहयोग आने वाले वर्षों में सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। क्योंकि भविष्य के संघर्ष केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि पानी, भोजन, ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी तय होंगे।
यह संकट दुनिया को एक और कठोर सच याद दिलाता है — वैश्विक युद्ध और भू-राजनीतिक संघर्षों का सबसे बड़ा असर हमेशा गरीब और विकासशील समाजों पर पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो केवल पेट्रोल नहीं महंगा होता; खेतों की लागत बढ़ती है, खाद महंगी होती है, फसल कमजोर होती है और अंततः भोजन आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगता है। इसलिए पश्चिम एशिया का संघर्ष केवल पश्चिम एशिया का मुद्दा नहीं रह जाता; उसका असर नेपाल के धान खेतों तक पहुंच जाता है।
और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या आने वाले वर्षों में दुनिया “ऊर्जा सुरक्षा” से आगे बढ़कर “खाद्य सुरक्षा युद्धों” के दौर में प्रवेश कर रही है? क्योंकि जब उर्वरक, पानी और भोजन वैश्विक राजनीति के केंद्र में आने लगें, तब संकट केवल कृषि का नहीं रहता; वह सभ्यता की स्थिरता का प्रश्न बन जाता है।




