संजीव कुमार | नई दिल्ली 9 जनवरी 2026
नई दिल्ली। केंद्र सरकार कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़ा एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। खबरों के मुताबिक, सरकार पीएफ की सैलरी लिमिट को मौजूदा ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 से ₹30,000 करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इससे निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों की सैलरी, टेक-होम इनकम और रिटायरमेंट फंड पर सीधा असर पड़ेगा। वर्तमान व्यवस्था के तहत ₹15,000 तक की बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों पर पीएफ कटौती अनिवार्य है। कर्मचारी और नियोक्ता दोनों 12–12% योगदान करते हैं। लेकिन सैलरी लिमिट बढ़ने के बाद ₹25,000 या ₹30,000 तक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए भी पीएफ कटौती अनिवार्य हो सकती है। इसका मतलब है कि अब ज्यादा सैलरी वाले कर्मचारियों का भी बड़ा हिस्सा पीएफ में जाएगा।
कर्मचारियों को क्या होगा फायदा?
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कर्मचारियों का रिटायरमेंट फंड कहीं ज्यादा मजबूत होगा। सैलरी लिमिट बढ़ने से हर महीने पीएफ में ज्यादा रकम जमा होगी, जिससे बुढ़ापे में सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित हो सकेगा। इसके अलावा, पीएफ पर मिलने वाला ब्याज टैक्स-फ्री होता है, जिससे यह लंबे समय के लिए एक सुरक्षित निवेश माना जाता है। साथ ही, आपात स्थिति में पीएफ से आंशिक निकासी की सुविधा भी कर्मचारियों को राहत देती है।
क्या होगा नुकसान या चिंता?
हालांकि इस फैसले का दूसरा पहलू भी है। सैलरी लिमिट बढ़ने से कर्मचारियों की मंथली टेक-होम सैलरी घट सकती है, क्योंकि हर महीने पीएफ कटौती ज्यादा होगी। खासकर वे कर्मचारी जो घर का खर्च, EMI और बच्चों की पढ़ाई जैसी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, उनके लिए यह बोझ बढ़ा सकता है। वहीं, नियोक्ताओं पर भी अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा, क्योंकि उन्हें भी ज्यादा योगदान करना होगा।
सरकार क्यों कर रही है यह बदलाव?
सरकार का मानना है कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कई कर्मचारियों के पास रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त बचत नहीं होती। EPF की सैलरी लिमिट बढ़ाकर सरकार चाहती है कि ज्यादा कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आएं और भविष्य में पेंशन व बचत की समस्या से बच सकें। यह कदम श्रम सुधारों और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।
अभी क्या स्थिति है?
फिलहाल सरकार की ओर से इस पर अंतिम अधिसूचना जारी नहीं हुई है। यह प्रस्ताव विचाराधीन है और श्रम मंत्रालय, नियोक्ता संगठनों तथा ट्रेड यूनियनों से चर्चा के बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह नियम लागू होता है, तो सरकार कुछ छूट या विकल्प भी दे सकती है, ताकि कर्मचारियों पर अचानक बोझ न पड़े।
पीएफ की सैलरी लिमिट बढ़ाने का प्रस्ताव लंबे समय में फायदेमंद, लेकिन तुरंत असर में चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जहां यह कर्मचारियों को सुरक्षित भविष्य देगा, वहीं उनकी मौजूदा जेब पर दबाव भी बढ़ा सकता है। अब सबकी निगाहें सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि यह बदलाव कर्मचारियों के लिए फायदे का सौदा बनेगा या नई चिंता।




