अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वाशिंगटन/तेहरान | 12 जून 2026
कुछ ही घंटों में दुनिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो बिल्कुल अलग चेहरे देखे। पहले उन्होंने ईरान को “बहुत कड़ा सबक” सिखाने और सैन्य हमले की चेतावनी देकर पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाओं को चरम पर पहुंचा दिया, फिर अचानक घोषणा कर दी कि प्रस्तावित हमले रद्द कर दिए गए हैं क्योंकि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। ट्रंप के इस अप्रत्याशित यू-टर्न ने वैश्विक कूटनीति, ऊर्जा बाजारों और सुरक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह युद्ध और शांति के बीच ट्रंप की नई रणनीति है या फिर अमेरिका और ईरान के बीच कोई बड़ा समझौता वास्तव में आकार ले रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई महीनों से तनाव लगातार बढ़ता रहा है। हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों, ईरानी जवाबी कार्रवाइयों और समुद्री मार्गों पर बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया था। इसी पृष्ठभूमि में गुरुवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एक तीखा संदेश जारी किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान को “बहुत कड़ी कीमत” चुकाने पर मजबूर करेगा और आवश्यकता पड़ने पर ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर भी नियंत्रण स्थापित कर सकता है।
खार्ग द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है। देश के अधिकांश तेल निर्यात इसी द्वीप के माध्यम से होते हैं। ट्रंप की इस चेतावनी को केवल बयानबाजी नहीं बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई के संकेत के रूप में देखा गया। नतीजतन वैश्विक तेल बाजार में तुरंत प्रतिक्रिया देखने को मिली और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया। निवेशकों और रणनीतिक विश्लेषकों ने आशंका जताई कि यदि अमेरिका वास्तव में खार्ग द्वीप या ईरानी तेल अवसंरचना को निशाना बनाता है तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
हालांकि कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने एक नया संदेश जारी कर सबको चौंका दिया। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत उच्चतम स्तर तक पहुंच चुकी है और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक सहमति बन गई है। इसी कारण उन्होंने उस रात प्रस्तावित हवाई हमलों और बमबारी को रद्द करने का फैसला लिया है।
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका, इज़राइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, तुर्किये, पाकिस्तान, जॉर्डन, मिस्र और अन्य क्षेत्रीय देशों की भागीदारी से समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। उन्होंने यहां तक कहा कि समझौते के अंतिम बिंदुओं पर चर्चा लगभग पूरी हो चुकी है और जल्द ही हस्ताक्षर की तारीख तथा स्थान की घोषणा की जा सकती है।
हालांकि इसके साथ ही ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के खिलाफ लागू अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी फिलहाल जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि जब तक औपचारिक समझौता अंतिम रूप नहीं ले लेता, तब तक ईरान पर दबाव बनाए रखा जाएगा। इससे यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन अभी भी “दबाव और संवाद” की दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है।
दूसरी ओर, ईरान ने ट्रंप के नवीनतम दावों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। इससे पहले ईरानी नेतृत्व अमेरिका को चेतावनी दे चुका था कि यदि नए सैन्य हमले किए गए तो उसका जवाब पहले से अधिक कठोर होगा। ईरान के वरिष्ठ नेताओं ने कहा था कि अमेरिकी आक्रामकता पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है और इससे ऊर्जा बाजारों में गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दिया। ट्रंप की शुरुआती धमकी के बाद जहां तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, वहीं हमले रद्द किए जाने की घोषणा के बाद बाजार में राहत देखने को मिली और कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक अभी भी स्थिति पर सतर्क नजर बनाए हुए हैं क्योंकि क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने भी दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
ट्रंप की यह रणनीति नई नहीं है। वे अक्सर पहले कड़े बयान देकर दबाव बनाते हैं और फिर बातचीत का रास्ता खोलते हैं। लेकिन इस बार हालात कहीं अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां पहले से ही उच्च स्तर पर हैं और किसी भी गलत आकलन से बड़ा संघर्ष भड़क सकता है।
दुनिया की निगाहें वाशिंगटन और तेहरान पर टिकी हुई हैं। यदि वास्तव में कोई समझौता आकार लेता है तो यह हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक माना जाएगा। लेकिन यदि बातचीत विफल होती है तो सैन्य टकराव का खतरा फिर बढ़ सकता है। ऐसे में ट्रंप का ताजा यू-टर्न फिलहाल युद्ध की आशंकाओं को टालने वाला कदम जरूर दिखाई देता है, लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह स्थायी शांति की शुरुआत है या किसी बड़े घटनाक्रम से पहले की रणनीतिक खामोशी।



