ओपिनियन/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026
भारत की चुनावी व्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सवाल केवल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का नहीं रह गया है। सवाल अब निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, उसके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और अंततः उस न्यायिक व्यवस्था तक पहुंच गया है, जिसे इन विवादों पर संवैधानिक कसौटी पर फैसला करना है। सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और देशव्यापी SIR को चुनौती देने वाली याचिका को अगले सप्ताह सुनने पर सहमति दी है। याचिका में आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने निर्वाचन आयोग की सामूहिक शक्ति का कथित तौर पर एकतरफा इस्तेमाल किया और SIR से जुड़े फैसले निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं लिए गए। अदालत ने अभी इन आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है; लेकिन इतना जरूर है कि अब ये सवाल सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच चुके हैं।
मामला इसलिए असाधारण महत्व रखता है क्योंकि याचिका केवल SIR को चुनौती नहीं देती, बल्कि यह मूल सवाल उठाती है कि क्या तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग की सामूहिक संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल उसका कोई एक सदस्य अपनी ओर से कर सकता है। रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग से जुड़े कुछ फैसलों पर कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की ओर से इन आपत्तियों की अलग व्याख्या सामने आई है और कहा गया है कि वे SIR की मूल नीति या IT संबंधी फैसलों के बारे में नहीं थीं। इसलिए यहां आरोप और प्रतिवाद दोनों को अलग-अलग रखना जरूरी है। अंतिम सत्य वही होगा जो दस्तावेजों और न्यायिक परीक्षण से सामने आएगा।
लेकिन चुनावी लोकतंत्र में एक सवाल ऐसा है जिसे किसी तकनीकी विवाद के खाते में डालकर टाला नहीं जा सकता—मतदाता का भरोसा कैसे कायम रहेगा? मतदाता सूची किसी सरकारी विभाग की सामान्य फाइल नहीं है। उसमें किसी नागरिक का नाम होना उसके मतदान के अधिकार से जुड़ा है। नाम हटना, नाम जुड़ना, आपत्ति लगना या किसी आवेदन को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाना—हर कदम का सीधा असर लोकतांत्रिक भागीदारी पर पड़ सकता है। इसलिए SIR को लेकर असली सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने नाम हटाए गए। असली सवाल यह होना चाहिए कि किस आधार पर हटाए गए, किस प्रक्रिया से हटाए गए, संबंधित नागरिक को क्या सूचना मिली और उसे अपनी बात रखने का कितना अवसर मिला।
यहीं से निर्वाचन आयोग की जवाबदेही का प्रश्न शुरू होता है। यदि किसी नागरिक का नाम वास्तव में गलत तरीके से सूची में है, तो उसे हटाने की कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए। यदि किसी योग्य मतदाता का नाम गलती से हटता है, तो उसे वापस जोड़ने का आसान और प्रभावी रास्ता होना चाहिए। और यदि किसी ने जानबूझकर गलत जानकारी देकर किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति की है, तो जांच के बाद जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इसलिए SIR की सफलता या विफलता का फैसला राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शी रिकॉर्ड से होना चाहिए।
27 मई 2026 के बिहार SIR फैसले ने भी इस पूरे विवाद को संवैधानिक विमर्श के केंद्र में ला दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बिहार में SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की शक्तियों से जुड़े सवालों पर विचार किया गया था। अब नई याचिका आयोग की निर्णय लेने की आंतरिक संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। यानी बहस का अगला चरण केवल यह नहीं है कि SIR करने की शक्ति आयोग के पास है या नहीं; सवाल यह भी है कि उस शक्ति का इस्तेमाल आयोग ने किस संस्थागत तरीके से किया।
इसी पृष्ठभूमि में CJI सूर्यकांत की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े एक अलग घटनाक्रम में CJI सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों के साथ प्रस्तावित संसदीय संवाद पर तीखी आपत्ति जताई है। सिब्बल ने इसे शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के संदर्भ में गंभीर प्रश्न बताया। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह सिब्बल की कानूनी-राजनीतिक आलोचना है, न्यायालय द्वारा स्थापित कोई तथ्य या निष्कर्ष नहीं।
मगर जिस समय निर्वाचन आयोग और SIR से जुड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच रहा है, उसी समय ‘एक देश, एक चुनाव’ पर संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रस्तावित बातचीत का विवाद सामने आना संस्थागत दृष्टि से निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। संयुक्त संसदीय समिति ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट जाने का कार्यक्रम बनाया था। समिति के बीच प्रसारित एजेंडे में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के साथ simultaneous elections यानी ‘एक देश, एक चुनाव’ पर “informal discussion” का उल्लेख था। बाद में यह दौरा रद्द/स्थगित कर दिया गया।
इस मामले में घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की ओर से संसदीय समिति को बताया गया कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन भविष्य में न्यायिक समीक्षा के लिए अदालत के सामने आ सकता है और इसलिए इस विषय पर मौजूदा न्यायाधीशों के साथ ऐसी बातचीत करना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कहा कि दौरा मुख्यतः सुप्रीम कोर्ट परिसर और पुस्तकालय से परिचित कराने के लिए था तथा कार्यक्रम संबंधी कारणों से टाला गया। यानी दौरा क्यों टला, इसे लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग व्याख्या है; लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है—प्रस्तावित अनौपचारिक बैठक हुई नहीं।
यहीं कपिल सिब्बल का सवाल अपनी पूरी गंभीरता के साथ सामने आता है। उनका तर्क है कि संसद कानून बनाती है और यदि वही कानून बाद में संवैधानिक चुनौती के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने आता है, तो अदालत को उसकी वैधता पर स्वतंत्र निर्णय करना होगा। ऐसे में मौजूदा न्यायाधीशों के साथ उस प्रस्तावित कानून पर पहले से अनौपचारिक चर्चा करना शक्तियों के पृथक्करण की संवैधानिक भावना को लेकर सवाल पैदा कर सकता है। सिब्बल ने इस तरह की बातचीत पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
अब इस पूरे परिदृश्य को SIR से जोड़कर देखिए। एक तरफ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल अदालत के सामने हैं। दूसरी तरफ संसद की एक समिति और सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रस्तावित संवाद को लेकर संस्थागत मर्यादा पर बहस हो रही है। दोनों घटनाओं के केंद्र में अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन दोनों का अंतिम संबंध संवैधानिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे से है।
न्यायपालिका के लिए भी यही कसौटी है। अदालत को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं है; उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना है। इसी तरह निर्वाचन आयोग को केवल स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है; उसकी निर्णय-प्रक्रिया इतनी पारदर्शी होनी चाहिए कि नागरिक को उसकी स्वतंत्रता पर भरोसा करने के लिए किसी राजनीतिक दल की सदस्यता या विचारधारा की जरूरत न पड़े।
यही कारण है कि CJI सूर्यकांत पर उठे सवालों को भी सावधानी से देखा जाना चाहिए। किसी न्यायाधीश के खिलाफ राजनीतिक या कानूनी आलोचना को स्वतः सत्य मान लेना उतना ही गलत होगा जितना किसी आलोचना को केवल इसलिए खारिज कर देना कि वह राजनीतिक व्यक्ति ने की है। सवालों का जवाब रिकॉर्ड और संवैधानिक प्रक्रिया से मिलना चाहिए। सिब्बल का आरोप अपनी जगह है; अदालत का निष्कर्ष अपनी जगह होगा। दोनों को एक मान लेना न्यायिक प्रक्रिया के साथ भी अन्याय होगा और सार्वजनिक बहस के साथ भी।
SIR को लेकर भी यही सिद्धांत लागू होता है। यदि निर्वाचन आयोग के खिलाफ आरोप हैं, तो उनका जवाब राजनीतिक बयान से नहीं बल्कि आंकड़ों और दस्तावेजों से दिया जाना चाहिए। यदि किसी मतदाता का नाम हटाया गया है तो कारण सामने होना चाहिए। यदि कोई आवेदन गलत पाया गया तो उसका रिकॉर्ड होना चाहिए। यदि कोई शिकायत सही पाई गई तो सुधार होना चाहिए। और यदि आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं, तो संबंधित रिकॉर्ड अदालत के सामने रखे जाने चाहिए।
दरअसल, लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती। चुनाव के दिन तो मतदाता मतदान करता है। असली परीक्षा उससे पहले और बाद में होती है—मतदाता सूची कैसे बनी, किसका नाम जुड़ा, किसका नाम हटा, शिकायत कैसे सुनी गई, राजनीतिक दलों की आपत्तियों का जवाब कैसे दिया गया और चुनाव कराने वाली संस्था के फैसलों पर स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा कितनी प्रभावी रही।
इसलिए SIR विवाद को केवल ज्ञानेश कुमार बनाम विपक्ष की लड़ाई बनाकर देखना इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा। उसी तरह CJI सूर्यकांत पर उठे सवालों को केवल कपिल सिब्बल बनाम सुप्रीम कोर्ट की बहस बना देना भी पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न व्यक्ति से बड़ा है—संवैधानिक संस्थाएं अपनी-अपनी सीमाओं में कितनी पारदर्शिता, स्वतंत्रता और जवाबदेही के साथ काम कर रही हैं?
और शायद यही इस समय सबसे जरूरी सवाल है: क्या भारत का आम मतदाता इतना भरोसा कर सकता है कि उसका नाम मतदाता सूची में किसी राजनीतिक इच्छा से नहीं, बल्कि कानून और पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर रहेगा?
क्योंकि वोट केवल एक बटन दबाने का अधिकार नहीं है। वह नागरिक और लोकतंत्र के बीच सबसे सीधा रिश्ता है। उस रिश्ते में संदेह पैदा हो जाए तो उसका समाधान किसी एक नेता के बयान से नहीं होगा। समाधान होगा—खुले रिकॉर्ड से, स्पष्ट प्रक्रिया से, जवाबदेही से और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा से।
अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के सामने SIR और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल होंगे। अदालत क्या निष्कर्ष निकालती है, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि अब बहस चुनाव आयोग की चौखट से निकलकर संविधान की चौखट तक पहुंच चुकी है। और इस परीक्षा में केवल ज्ञानेश कुमार या कोई एक संस्था नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी कटघरे में खड़ा है।



