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CJI सूर्यकांत न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हैं: कपिल सिब्बल

वोट पर सवालों से अदालत की चौखट तक: चुनावी भरोसे की परीक्षा, ‘एक देश-एक चुनाव’ पर संवैधानिक टकराव

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

भारत में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक के उस भरोसे का नाम है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहेगा, उसका वोट निष्पक्ष तरीके से दर्ज होगा और चुनाव कराने वाली संस्था अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से निभाएगी। लेकिन जब SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, Form-7 के कथित दुरुपयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो मामला महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहता। कर्नाटक में Form-7 को लेकर विवाद, मुंबई में CJP का प्रदर्शन और अब ‘एक देश, एक चुनाव’ पर संसद तथा सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रस्तावित संवाद को लेकर उठे संवैधानिक सवाल—ये सभी घटनाएं एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं: लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा आखिर किस तरह कायम रखा जाए?

कर्नाटक में Form-7 को लेकर उठे सवाल इसी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। Form-7 मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाला निर्धारित माध्यम है। इसलिए केवल Form-7 दाखिल होना किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। वास्तविक सवाल यह है कि कितने आवेदन दाखिल हुए, उनके पीछे क्या कारण थे, कितने आवेदन सत्यापन के बाद सही पाए गए और क्या कहीं जानबूझकर गलत जानकारी देकर किसी योग्य मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज कराई गई। चुनाव आयोग द्वारा ऐसे मामलों की जांच और निगरानी के निर्देश दिए जाने के बाद अब वास्तविक स्थिति जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी। लोकतंत्र में आरोप महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी जांच ही तय करती है।

इसी विवाद के बीच Cockroach Janta Party यानी CJP ने 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में बड़ा प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। CJP संस्थापक अभिजीत डिपके ने 1 अक्टूबर को मुंबई प्रेस क्लब में कहा कि संगठन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन करेगा। संगठन ने SIR प्रक्रिया के तहत तैयार की जा रही मतदाता सूची को फ्रीज करने, प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों की जांच कराने तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने और उसमें नागरिक समाज की भागीदारी की मांग भी रखी है। CJP के मुताबिक मुंबई के बाद छह अन्य शहरों में प्रदर्शन होंगे और अक्टूबर के अंत तक आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचेगा। CJP द्वारा लगाए गए आरोप और उसकी राजनीतिक मांगें संगठन का पक्ष हैं; उनकी पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है।

लेकिन चुनावी भरोसे की यह लड़ाई केवल सड़क पर नहीं है। संसद के भीतर ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े विधेयकों को लेकर भी संवैधानिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था से जुड़े संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच संयुक्त संसदीय समिति कर रही है। समिति के 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट जाने का कार्यक्रम प्रस्तावित था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के साथ ‘अनौपचारिक चर्चा’ का उल्लेख था। विपक्षी सदस्यों ने इसी पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जिस प्रस्तावित कानून की संवैधानिक वैधता भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती दी जा सकती है, उसके बारे में मौजूदा न्यायाधीशों के साथ अनौपचारिक चर्चा न्यायपालिका और विधायिका की संस्थागत सीमाओं को लेकर सवाल खड़े कर सकती है।

विवाद बढ़ने के बाद प्रस्तावित सुप्रीम कोर्ट दौरा टाल दिया गया। हालांकि संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने इसकी वजह विपक्ष की आपत्तियों को नहीं, बल्कि सदस्यों के कार्यक्रम और समय-सारणी से जुड़ी कठिनाइयों को बताया। इसलिए इस घटनाक्रम में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रस्तावित बैठक हुई नहीं। इसे सीजेआई या अन्य न्यायाधीशों के साथ हो चुकी बैठक के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसी मुद्दे पर वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने बेहद कड़ा सवाल उठाया है। सिब्बल ने आरोप लगाया कि CJI सूर्यकांत “न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हैं”। उनका सवाल ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े प्रस्तावित विधेयकों पर संसदीय समिति और मौजूदा न्यायाधीशों के बीच अनौपचारिक बातचीत की संवैधानिक उपयुक्तता से जुड़ा है। सिब्बल का तर्क है कि संसद कानून बनाती है और यदि उस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जाती है तो न्यायपालिका उसकी समीक्षा करती है। ऐसे में जिस कानून पर भविष्य में सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना पड़ सकता है, उसके बारे में मौजूदा न्यायाधीशों के साथ पहले से अनौपचारिक चर्चा शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को लेकर सवाल पैदा कर सकती है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। सिब्बल का यह कथन उनका आरोप और राजनीतिक-कानूनी मत है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं। न तो इस प्रस्तावित बैठक के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला दिया है और न ही यह कहा गया है कि CJI या अन्य न्यायाधीशों ने प्रस्तावित कानून पर कोई राय व्यक्त की। विवाद एक प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर था, जिसे बाद में टाल दिया गया।

यही अंतर इस पूरे मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। संसदीय समितियां कानूनों की जांच के दौरान विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, संवैधानिक विशेषज्ञों और विभिन्न हितधारकों से राय ले सकती हैं। ऐसी सलाह लेना संसदीय जांच की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। लेकिन मौजूदा न्यायाधीशों के साथ ऐसे विधेयक पर अनौपचारिक बातचीत, जो भविष्य में न्यायिक समीक्षा के लिए उसी अदालत के सामने पहुंच सकता है, एक अलग संस्थागत प्रश्न है। यही वह बिंदु है जिस पर सिब्बल और विपक्षी सदस्यों ने आपत्ति जताई।

इस विवाद का मूल सवाल इसलिए ‘एक देश, एक चुनाव’ के समर्थन या विरोध से भी बड़ा है। सवाल है कि संसद और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक दूरी और संवाद की सीमा क्या होनी चाहिए? संसद को कानून बनाने की स्वतंत्रता चाहिए और न्यायपालिका को उस कानून की संवैधानिकता पर स्वतंत्र निर्णय देने की स्थिति में रहना चाहिए। यदि किसी प्रस्तावित कानून पर दोनों संस्थाओं के बीच ऐसा संवाद हो जिससे भविष्य की न्यायिक समीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठें, तो उस संवाद की प्रकृति और सीमा पर सार्वजनिक स्पष्टता आवश्यक हो जाती है।

यहीं मतदाता सूची का विवाद और ‘एक देश, एक चुनाव’ का विवाद एक दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। दोनों मामलों का विषय अलग है, लेकिन दोनों में संस्थागत विश्वास केंद्रीय मुद्दा है। चुनाव आयोग के मामले में नागरिक यह जानना चाहता है कि उसका नाम किस आधार पर हटाया गया या क्यों बरकरार रखा गया। संसद और न्यायपालिका के मामले में नागरिक यह देखना चाहता है कि कानून बनाने और उसकी संवैधानिक समीक्षा करने वाली संस्थाएं अपनी-अपनी भूमिकाओं की स्पष्ट सीमाओं के भीतर काम कर रही हैं।

इसलिए कर्नाटक में Form-7 से जुड़े प्रत्येक विवाद की निष्पक्ष जांच, SIR के दौरान नाम हटाने की प्रक्रिया की पारदर्शिता, नागरिकों को आपत्ति और अपील का प्रभावी अवसर, चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब और संसद-सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रस्तावित संवाद की स्पष्ट संवैधानिक मर्यादा—इन सभी की अपनी-अपनी जगह है।

लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल इस बात से नहीं बनती कि वे कहती क्या हैं। वह इस बात से बनती है कि वे अपने फैसलों और प्रक्रियाओं को कितना पारदर्शी बनाती हैं। मतदाता सूची पर सवाल उठें तो रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। Form-7 को लेकर शिकायत हो तो जांच का परिणाम सामने आना चाहिए। SIR पर आपत्ति हो तो नागरिक को अपना पक्ष रखने और सुधार कराने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए। और जब न्यायपालिका तथा संसद की भूमिकाओं पर सवाल उठें तो दोनों संस्थाओं की संवैधानिक सीमाओं को स्पष्ट रखा जाना चाहिए।

आज का सबसे बड़ा सवाल किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आम मतदाता को चुनावी व्यवस्था पर इतना भरोसा है कि वह यह माने कि उसका वोट सुरक्षित है, उसकी शिकायत सुनी जाएगी और संस्थाएं राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएंगी? यही भरोसा लोकतंत्र की असली पूंजी है।

मुंबई के शिवाजी पार्क में उठने वाली आवाज हो या दिल्ली के जंतर-मंतर की प्रस्तावित हुंकार, कर्नाटक में Form-7 को लेकर चल रही जांच हो या संसद की संयुक्त समिति का सुप्रीम कोर्ट दौरा टलना—इन घटनाओं का अंतिम अर्थ राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रियाओं और तथ्यात्मक जांच से तय होगा।

वोट पर सवाल हो या अदालत की चौखट तक पहुंचती संवैधानिक बहस—लोकतंत्र की असली परीक्षा संस्थाओं के प्रति भरोसे की है। और भरोसा मांगने से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है।

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