एबीसी नेशनल न्यूज | 13 जनवरी 2026
ढाका। बांग्लादेश के जाने-माने अर्थशास्त्री और चुनावी सुधारों के समर्थक डॉ. बदीउल आलम मजूमदार ने देश की चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक बांग्लादेश में एक निष्पक्ष और तटस्थ कार्यवाहक सरकार नहीं बनेगी, तब तक वहां स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं है। उनका मानना है कि मौजूदा हालात में चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। डॉ. मजूमदार ने कहा कि बांग्लादेश में पिछले कुछ वर्षों से चुनावों को लेकर विवाद बढ़ते जा रहे हैं। विपक्षी दलों और आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि सत्तारूढ़ सरकार के रहते चुनाव निष्पक्ष नहीं हो पाते। उन्होंने बताया कि पहले बांग्लादेश में कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था थी, जिसका मकसद चुनाव के दौरान प्रशासन को राजनीति से दूर रखना था। उस व्यवस्था के रहते हुए चुनाव अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय माने जाते थे, लेकिन अब उसके हटने से चुनावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अर्थशास्त्री ने यह भी कहा कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास पर टिका होता है। अगर लोग यह मानने लगें कि चुनाव पहले से तय हैं या सत्ता के प्रभाव में हो रहे हैं, तो मतदान में भागीदारी घटती है और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ जाती हैं। डॉ. मजूमदार के अनुसार, निष्पक्ष चुनाव के लिए सबसे जरूरी है कि चुनाव कराने वाली सरकार खुद किसी राजनीतिक पक्ष में न हो।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चुनावों की विश्वसनीयता लगातार गिरती रही, तो इसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ेगा। निवेशकों का भरोसा कमजोर होगा, सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और देश की लोकतांत्रिक साख को नुकसान पहुंचेगा।
डॉ. बदीउल आलम मजूमदार ने अपील की कि बांग्लादेश में सभी राजनीतिक दलों को आपसी बातचीत के जरिए ऐसा रास्ता निकालना चाहिए, जिससे एक स्वीकार्य और तटस्थ कार्यवाहक सरकार का गठन हो सके। उनका कहना है कि यही एकमात्र तरीका है, जिससे जनता का विश्वास लौटाया जा सकता है और देश में वास्तव में स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संभव हो पाएंगे। डॉ. मजूमदार का यह बयान बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर एक गंभीर चेतावनी है। यह बयान यह भी दिखाता है कि चुनावी सुधार और निष्पक्ष व्यवस्था अब केवल विपक्ष की मांग नहीं, बल्कि देश के जिम्मेदार बुद्धिजीवियों की भी बड़ी चिंता बन चुकी है।




