राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026
संसद का नाटक ‘सनातन का अपमान’ कैसे हो गया?
संसद परिसर में अयोध्या राम मंदिर के चंदे में कथित चोरी को लेकर विपक्ष द्वारा किए गए नाट्य मंचन को ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद के खिलाफ मामला दर्ज किया जाना राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करता है। किसी नाटक में पुजारी की वेशभूषा पहनना, श्रद्धालु का अभिनय करना और चंदे की कथित चोरी को प्रतीकात्मक तरीके से प्रस्तुत करना अपने आप में सनातन धर्म का अपमान कैसे हो गया? नाटक, अभिनय, स्वांग और प्रतीकात्मक मंचन भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। नाटक के जरिए धार्मिक और पौराणिक कथाएं जन-जन तक पहुंचाई गई हैं, सामाजिक कुरीतियों पर चोट की गई है, भ्रष्टाचार का मजाक उड़ाया गया है, व्यवस्था की खामियां दिखाई गई हैं और सत्ता से कठिन सवाल पूछे गए हैं। संसद परिसर में हुए नाट्य प्रदर्शन का संदर्भ भी स्पष्ट था—सवाल भगवान राम के अस्तित्व, उनकी मर्यादा या सनातन धर्म की आस्था पर नहीं था, बल्कि भगवान राम के नाम पर श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चंदे की कथित चोरी पर था। ऐसे में राजनीतिक व्यंग्य को उसके संदर्भ से काटकर धार्मिक अपमान में बदल देना और फिर उसके आधार पर नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर देना अभिव्यक्ति और राजनीतिक विरोध की स्वतंत्रता के लिहाज से चिंताजनक है।
नाटक और अभिनय भारतीय सभ्यता की बेहद पुरानी परंपरा हैं
भारत में नाटक कोई आधुनिक राजनीतिक आविष्कार नहीं है कि संसद के बाहर कुछ सांसदों ने पहली बार किसी मुद्दे को अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत कर दिया हो। भारत की शास्त्रीय नाट्य परंपरा हजारों वर्षों पुरानी मानी जाती है और भरतमुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ अभिनय, रस, भाव, संगीत, नृत्य और मंचन की विकसित भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। समय के साथ संस्कृत नाटकों से लेकर रामलीला, रासलीला, नौटंकी, स्वांग, तमाशा, जात्रा, भवाई और आधुनिक नुक्कड़ नाटक तक असंख्य रूप विकसित हुए। इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं रहा। समाज को संदेश देना, धार्मिक कथाओं को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना, अन्याय का विरोध करना, सामाजिक बुराइयों पर चोट करना और सत्ता तथा व्यवस्था पर व्यंग्य करना भी भारतीय नाट्य परंपरा का हिस्सा रहा है। इसलिए संसद परिसर में किसी राजनीतिक मुद्दे को समझाने के लिए प्रतीकात्मक अभिनय किया गया तो केवल अभिनय की वजह से उसे धर्म का अपमान मान लेना नाटक की पूरी प्रकृति को नजरअंदाज करना होगा। नाटक में कलाकार वास्तविक पात्र नहीं होता; वह किसी विचार, परिस्थिति या चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है। यही सिद्धांत रामलीला में लागू होता है, यही फिल्मों और रंगमंच में और यही राजनीतिक नुक्कड़ नाटकों में भी लागू होना चाहिए।
रामलीला सबसे बड़ा उदाहरण—अभिनय अपमान होता तो यह परंपरा कैसे चलती?
भारत में अभिनय और धार्मिक पात्रों के मंचन का सबसे बड़ा उदाहरण रामलीला है। हर वर्ष देश के हजारों शहरों, कस्बों और गांवों में कलाकार भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, भगवान हनुमान, रावण, विभीषण, दशरथ, कैकेयी और साधु-संतों सहित रामायण के अनेक पात्रों की भूमिकाएं निभाते हैं। कोई सामान्य कलाकार भगवान राम का रूप धारण करता है, कोई हनुमान बनता है और कोई रावण। मंच पर युद्ध होता है, संवाद होते हैं, क्रोध और शोक दिखाया जाता है और पूरी कथा अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। दर्शक जानते हैं कि सामने खड़ा व्यक्ति वास्तव में भगवान राम या हनुमान नहीं, बल्कि कलाकार है। इसके बावजूद कोई यह नहीं कहता कि कलाकार द्वारा भगवान राम का रूप धारण करना अपने आप में भगवान राम का अपमान है। उलटे उसी अभिनय के माध्यम से रामायण की कथा, भगवान राम की मर्यादा और धर्म का संदेश पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुंचता रहा है। इसलिए केवल धार्मिक वेशभूषा या किसी पुजारी के पात्र को मंच पर लाने से धर्म का अपमान सिद्ध नहीं हो सकता। अभिनय को उसके उद्देश्य, संदेश और संदर्भ से समझना पड़ता है। यही सामान्य कसौटी संसद परिसर के नाटक पर भी लागू होनी चाहिए।
संसद में भगवान राम का मजाक नहीं, ‘चंदा चोरी’ पर व्यंग्य था
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य नाटक का संदर्भ है। संसद परिसर में हुए मंचन में किसी सांसद ने स्वयं को भगवान राम घोषित नहीं किया था, भगवान राम की भूमिका निभाकर उनका मजाक नहीं उड़ाया गया था और न रामायण या सनातन धर्म की किसी धार्मिक मान्यता को निशाना बनाया गया था। राजनीतिक प्रदर्शन का विषय अयोध्या राम मंदिर के दान से जुड़ी चोरी और उसकी जवाबदेही था। पप्पू यादव ने पुजारी का पात्र निभाया और अन्य सांसदों ने श्रद्धालुओं तथा दान देने की प्रक्रिया को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया। राजनीतिक संदेश यह था कि श्रद्धालु मंदिर में अपनी आस्था से पैसा देता है और यदि वही पैसा चोरी हो जाए तो जिम्मेदारी किसकी है? इस प्रस्तुति को कोई पसंद कर सकता है, कोई खराब राजनीतिक नाटक कह सकता है, कोई इसकी शैली से असहमत हो सकता है और कोई इसे जरूरत से ज्यादा नाटकीय मान सकता है, लेकिन इससे नाटक का मूल विषय बदल नहीं जाता। भगवान राम पर व्यंग्य करना और भगवान राम के नाम पर आए चंदे की कथित चोरी पर व्यंग्य करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। इन दोनों को जानबूझकर एक बना देना राजनीतिक बहस को मूल मुद्दे से भटकाने जैसा है।
भ्रष्ट पुजारी का पात्र सभी पुजारियों या सनातन का अपमान नहीं होता
नाटक, सिनेमा और साहित्य में किसी एक चरित्र को पूरे समाज, धर्म या पेशे का प्रतिनिधि मान लेना बेहद कमजोर तर्क होगा। किसी फिल्म में भ्रष्ट पुलिस अधिकारी दिखाया जाता है तो उससे पूरी भारतीय पुलिस का अपमान नहीं हो जाता। किसी नाटक में भ्रष्ट नेता दिखाया जाता है तो उससे लोकतंत्र का अपमान नहीं हो जाता। किसी कहानी में बेईमान डॉक्टर हो सकता है, लेकिन उसका अर्थ यह नहीं कि कहानीकार पूरे चिकित्सा पेशे को बेईमान बता रहा है। उसी तरह किसी राजनीतिक नाटक में एक ऐसे पुजारी का पात्र दिखाया गया जो कथित तौर पर चंदा लेकर चला जाता है, तो उससे देश के सभी पुजारियों, भगवान राम या पूरे सनातन धर्म का अपमान स्वतः सिद्ध नहीं होता। नाटक में पात्र किसी खास घटना या प्रवृत्ति का प्रतीक हो सकता है। अगर हर नकारात्मक पात्र को उसके पूरे धर्म, जाति, पेशे या समुदाय से जोड़ दिया जाए तो नाटक, फिल्म, उपन्यास और राजनीतिक व्यंग्य लगभग असंभव हो जाएंगे। इसलिए संसद के प्रदर्शन में भगवा वस्त्र देखकर ही उसे ‘सनातन का अपमान’ घोषित करना नाटकीय अभिव्यक्ति और वास्तविक धार्मिक अपमान के बीच के जरूरी अंतर को मिटा देता है।
असली धार्मिक सवाल तो रामलला के चढ़ावे की सुरक्षा का है
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष वह श्रद्धालु है जो भगवान राम के प्रति अपनी आस्था से मंदिर में चढ़ावा देता है। कोई दस रुपये देता है, कोई सौ, कोई हजार और कोई लाखों रुपये देता है, लेकिन रकम चाहे जितनी हो, उसके पीछे मौजूद श्रद्धा का मूल्य नहीं लगाया जा सकता। मंदिर में दिया गया पैसा किसी राजनीतिक पार्टी, सरकार या नेता के लिए नहीं होता; श्रद्धालु उसे रामलला के चरणों में अर्पित करता है। ऐसे में यदि उसी दान से चोरी या गबन के आरोप सामने आते हैं तो सबसे पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि श्रद्धालुओं का पैसा सुरक्षित क्यों नहीं रहा, कथित चोरी कैसे हुई, जिम्मेदार कौन था, व्यवस्था में कहां चूक हुई और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो इसके लिए क्या कदम उठाए गए? इन प्रश्नों को उठाना भगवान राम का अपमान नहीं कहा जा सकता। बल्कि सवाल उल्टा पूछा जाना चाहिए—श्रद्धालु की आस्था को ज्यादा चोट किस बात से पहुंचेगी: उसके चढ़ावे की कथित चोरी पर किए गए नाटक से या उसके भगवान के नाम पर दिए गए पैसे की वास्तविक चोरी से? यदि सनातन की भावना और श्रद्धालुओं की आस्था की इतनी ही चिंता है तो बहस का केंद्र नाटक से ज्यादा उस दान की सुरक्षा और जवाबदेही होनी चाहिए।
राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद पर मुकदमा सवालों के घेरे में
वाराणसी में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने और सनातन धर्म के कथित अपमान को लेकर मामला दर्ज होने के बाद अब असली प्रश्न यह है कि राजनीतिक व्यंग्य और आपराधिक धार्मिक अपमान के बीच सीमा कहां खींची जाएगी। शिकायत करने वाले व्यक्ति को किसी प्रदर्शन से आपत्ति हो सकती है और उसे अपनी शिकायत रखने का अधिकार है, लेकिन किसी नागरिक को कोई नाटक बुरा लगना और उस नाटक का कानून की नजर में अपराध होना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में व्यंग्य हमेशा सुविधाजनक नहीं होता। नेताओं के कार्टून बनते हैं, उनकी नकल की जाती है, संसद से सड़क तक प्रतीकात्मक प्रदर्शन होते हैं, पुतले बनाए जाते हैं और नुक्कड़ नाटकों के जरिए सत्ता तथा व्यवस्था पर कटाक्ष किया जाता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि असुविधाजनक अभिव्यक्ति को भी पर्याप्त जगह मिले। इस मामले में उपलब्ध संदर्भ को देखते हुए राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद पर आपराधिक मामला दर्ज करना अनुचित और राजनीतिक रूप से बेईमानी भरा कदम दिखाई देता है, क्योंकि नाटक के घोषित राजनीतिक संदर्भ और उसके निशाने को दरकिनार करके उसे पूरे सनातन धर्म के अपमान में बदल दिया गया है।
रामलीला स्वीकार है तो राजनीतिक नाटक को भी उसके संदर्भ से समझिए
धार्मिक पात्र या धार्मिक वेशभूषा मंच पर आते ही धर्म का अपमान हो जाता है, यह सिद्धांत भारत की अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की कसौटी पर ही नहीं टिकता। रामलीला में रावण बनने वाला कलाकार वास्तव में रावण नहीं होता, भगवान हनुमान का अभिनय करने वाला व्यक्ति भगवान हनुमान नहीं हो जाता और साधु का अभिनय करने वाला कलाकार देश के सभी साधुओं का प्रतिनिधि नहीं बन जाता। ठीक उसी प्रकार संसद परिसर में पुजारी की भूमिका निभाने वाला सांसद समूचे सनातन धर्म या भारत के प्रत्येक पुजारी का प्रतिनिधि नहीं था। वह एक राजनीतिक संदेश के भीतर एक पात्र था। उसके अभिनय का अर्थ समझने के लिए यह देखना होगा कि कहानी क्या थी और व्यंग्य किस पर था। यदि कहानी यह थी कि श्रद्धालु चंदा देता है और चंदे की कथित चोरी होती है, तो राजनीतिक संदेश भी उसी कथित चोरी और जवाबदेही के बारे में था। उसे भगवान राम का मजाक घोषित कर देना नाटक के वास्तविक संदर्भ को बदल देना है। नाटक को नाटक की तरह देखने और उसके संदेश को उसके संदर्भ में समझने की बुनियादी उदारता लोकतंत्र में होनी चाहिए।
बीजेपी के कार्यक्रम में ‘हनुमान’ अभिनय है तो विपक्ष का नाटक अपमान कैसे?
यहीं बीजेपी और उसके समर्थकों के सामने समान कसौटी का सबसे असहज सवाल खड़ा होता है। लखनऊ में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के स्वागत कार्यक्रम के दौरान भगवान हनुमान के स्वरूप में सजा एक कलाकार उनके काफिले के आगे नाचता दिखाई दिया और उसके हाथ में बीजेपी का झंडा भी नजर आया। इस घटना पर विश्व हिंदू परिषद से जुड़े पदाधिकारियों की ओर से भी आपत्ति सामने आई। अब यदि बीजेपी के किसी राजनीतिक आयोजन में हनुमान का रूप धारण करने वाले कलाकार के मामले में यह तर्क दिया जाए कि वह केवल अभिनय था और भगवान हनुमान का अपमान करने की कोई मंशा नहीं थी, तो यही सिद्धांत विपक्ष के नाट्य मंचन पर भी लागू होना चाहिए। उद्देश्य और संदर्भ को दोनों मामलों में देखना होगा। अपने राजनीतिक कार्यक्रम में भगवान हनुमान का स्वरूप आए तो उसे ‘कलाकार’ और ‘अभिनय’ कहा जाए, लेकिन विपक्ष के प्रदर्शन में कोई व्यक्ति पुजारी का पात्र निभाए तो वह अचानक ‘सनातन का अपमान’ बन जाए—यह दोहरा पैमाना टिकाऊ नहीं है। आस्था की कसौटी सत्ता और विपक्ष देखकर नहीं बदल सकती। नियम एक है तो वह सबके लिए एक होना चाहिए। मध्य प्रदेश में गणेश जी को आर एस एस के गणवेश में दिखाना आपत्ति होना चाहिए था। लेकिन तब ये सभी खामोश रहे।
नाटक को अपराध बनाने से राजनीतिक अभिव्यक्ति पर खतरनाक असर पड़ेगा
भारतीय लोकतंत्र में नुक्कड़ नाटक, व्यंग्य, कार्टून और प्रतीकात्मक प्रदर्शन लंबे समय से राजनीतिक अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। विश्वविद्यालयों से लेकर गांव-कस्बों और राजनीतिक आंदोलनों तक नाटक के माध्यम से महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक अन्याय, सांप्रदायिकता और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे नाटकों का उद्देश्य कई बार जानबूझकर व्यवस्था को असहज करना होता है, क्योंकि व्यंग्य की शक्ति ही यह है कि वह कठिन सवाल को सरल और तीखे प्रतीक में बदल देता है। यदि हर राजनीतिक नाटक में किसी धार्मिक या सामाजिक पात्र के इस्तेमाल को संबंधित धर्म या समुदाय का अपमान मानकर मुकदमा दर्ज होने लगे, तो कलाकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और सामान्य नागरिक किसी भी संवेदनशील विषय पर अभिनय करने से डरेंगे। संसद परिसर का नाटक पसंद नहीं आया तो उसकी आलोचना कीजिए, उसकी भाषा और प्रस्तुति पर सवाल उठाइए, उसे खराब राजनीतिक व्यंग्य कहिए—लेकिन राजनीतिक असहमति और आपराधिक अपराध के बीच की दूरी खत्म करना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।
सनातन इतना कमजोर नहीं कि एक राजनीतिक नाटक से खतरे में पड़ जाए
सनातन धर्म की शक्ति उसकी विशालता, विविधता और बौद्धिक परंपरा में है। हजारों वर्षों से भारतीय दर्शन में प्रश्न पूछे गए हैं, शास्त्रार्थ हुए हैं, मतभेद हुए हैं, अनेक दर्शनों ने एक-दूसरे से बहस की है और ईश्वर तथा सत्य तक पहुंचने के अलग-अलग रास्तों को जगह मिली है। इतनी विशाल सभ्यता को किसी राजनीतिक नाटक से खतरे में बताना स्वयं उसकी शक्ति को छोटा करके देखने जैसा है। राम किसी राजनीतिक पार्टी के नहीं हैं, हनुमान किसी संगठन की निजी संपत्ति नहीं हैं और सनातन किसी सरकार के प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं है। राजनीतिक दल आएंगे और जाएंगे, सरकारें बदलेंगी, नेता बदलेंगे, लेकिन राम भारतीय सभ्यता की चेतना में बने रहेंगे। इसलिए किसी राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह अपनी सुविधा के अनुसार तय करे कि कौन-सा अभिनय सनातन का सम्मान है और कौन-सा अपमान। यदि आस्था की रक्षा करनी है तो उसका पैमाना सार्वभौमिक होना चाहिए, राजनीतिक नहीं।
मुकदमे के शोर में चंदे की चोरी का सवाल गायब नहीं होना चाहिए
राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद पूरी राजनीतिक बहस के केंद्र में ‘सनातन का अपमान’ आ गया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि नाट्य मंचन आखिर हुआ क्यों था। प्रदर्शन के पीछे मुद्दा राम मंदिर के दान में कथित चोरी और उसकी जवाबदेही का था। इसलिए मूल प्रश्न आज भी वहीं खड़े हैं—श्रद्धालुओं के चंदे की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा रही है, चोरी कैसे हुई, कौन जिम्मेदार है और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? इन सवालों का उत्तर विपक्षी सांसदों के खिलाफ FIR दर्ज कर देने से नहीं मिल सकता। अगर बहस इतनी बदल जाए कि देश नाटक करने वाले सांसदों के कपड़ों पर चर्चा करता रहे और जिस कथित चोरी को लेकर नाटक हुआ वह सार्वजनिक विमर्श से गायब हो जाए, तो यह मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने का काम करेगा। धर्म की प्रतिष्ठा की रक्षा आवश्यक है, लेकिन भगवान के नाम पर दिए गए श्रद्धालु के पैसे और विश्वास की रक्षा भी धार्मिक संवेदनशीलता का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।
‘सनातन का अपमान’ राजनीतिक सुविधा का हथियार नहीं बनना चाहिए
इस पूरे विवाद का निष्कर्ष बहुत सीधा है। भारत में नाटक सदियों से समाज का आईना रहा है। रामलीला ने राम की कथा जन-जन तक पहुंचाई, लोकनाट्यों ने समाज की विसंगतियों पर चोट की और आधुनिक नुक्कड़ नाटकों ने सत्ता, भ्रष्टाचार और अन्याय से सवाल किए। संसद परिसर में हुआ मंचन भी राजनीतिक व्यंग्य की इसी परंपरा में देखा जाना चाहिए। नाटक में पुजारी का पात्र दिखाना अपने आप सनातन का अपमान नहीं है, राम मंदिर के चंदे की कथित चोरी पर सवाल उठाना भगवान राम का अपमान नहीं है और किसी राजनीतिक व्यंग्य से असहमत होना उसे स्वतः अपराध नहीं बना देता। इस संदर्भ में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद पर मुकदमा दर्ज करना बेईमानी भरा कदम इसलिए दिखाई देता है क्योंकि इससे नाटक के वास्तविक संदेश को धार्मिक अपमान में बदलने और मूल सवाल—श्रद्धालुओं के चंदे की सुरक्षा और जवाबदेही—को पीछे धकेलने का खतरा पैदा होता है। सनातन की प्रतिष्ठा किसी एक नाटक से छोटी नहीं है। यदि वास्तव में सनातन की मर्यादा की चिंता है तो नियम सभी के लिए समान रखिए—अपने राजनीतिक आयोजन में धार्मिक अभिनय को ‘श्रद्धा’ और विरोधी के यहां उसी अभिव्यक्ति को ‘सनातन का अपमान’ बताने की राजनीति न धर्म के साथ न्याय करती है, न लोकतंत्र के साथ।




