राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 अक्टूबर 2026
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले पुलिस कार्रवाई का दायरा अब सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों तक पहुंच गया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज को शनिवार को जंतर-मंतर के नजदीक हिरासत में ले लिया गया। उनके साथ फिल्म निर्माता अबान रजा, शोधकर्ता परन अमिताभ और शिक्षाविद एवं कलाकार अंजलि एस. को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। ये सभी पोस्टर लेकर प्रदर्शन के समर्थन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने पहुंचे थे।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में रहने वाले ज्यां द्रेज सहित चार लोग जंतर-मंतर के पास केरल हाउस के नजदीक एकत्र हुए थे। वे पोस्टर लेकर खड़े थे और मीडिया से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई। द्रेज ने आदर्श नगर पुलिस स्टेशन से फोन पर बातचीत में कहा, “हम पोस्टर लेकर खड़े थे और मीडिया से बात कर रहे थे, तभी पुलिस ने बिना कुछ बताए हमें उठा लिया।”
द्रेज के बयान ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है कि क्या शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने पहुंचे लोगों को भी प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में पुलिस की ओर से इस विशेष हिरासत के संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इसलिए कार्रवाई के औचित्य और उसके आधार को लेकर प्रशासन का पक्ष सामने आना जरूरी है।
‘हम अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहते थे’
ज्यां द्रेज ने बताया कि वे और उनके साथी वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराने पहुंचे थे। उनका उद्देश्य पोस्टरों के जरिए अपनी बात रखना और मीडिया से संवाद करना था। उनके अनुसार, समूह किसी हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं था, बल्कि प्रदर्शन के प्रति अपना समर्थन जाहिर कर रहा था।
द्रेज देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका काम गरीबी, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों से जुड़ा रहा है। ऐसे में उनका हिरासत में लिया जाना इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक दलों के विरोध तक सीमित नहीं रहने देता। अब सवाल यह भी है कि नागरिक समाज, शोधकर्ताओं और कलाकारों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए कितनी जगह मिल रही है।
प्रदर्शन से पहले सख्ती, अधिकारों पर बहस तेज
सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। इस प्रदर्शन से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई और कई राजनीतिक नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं।
ऐसे माहौल में द्रेज और उनके साथियों की हिरासत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर बहस को और तेज कर दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की कार्रवाई का स्पष्ट आधार और उचित प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। यदि लोग केवल पोस्टर लेकर अपनी बात रख रहे थे, तो इस कार्रवाई के कारणों को सार्वजनिक करना पारदर्शिता के लिहाज से जरूरी होगा।
पुलिस को देना होगा जवाब
ज्यां द्रेज के अनुसार, पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेते समय कोई कारण नहीं बताया। उनका यह बयान उस समय आया है, जब दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर पहले ही बड़े पैमाने पर सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं और राजनीतिक दलों की ओर से कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
इस मामले में पुलिस का विस्तृत पक्ष सामने आने के बाद ही हिरासत के कानूनी आधार और परिस्थितियों का पूरा आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल, द्रेज का बयान एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है: यदि नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से पोस्टर लेकर अपनी बात रखने पहुंचते हैं, तो उन्हें बिना कारण बताए हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी?
दिल्ली में जारी घटनाक्रम अब केवल एक प्रदर्शन की अनुमति का मामला नहीं रह गया है। यह नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण असहमति और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही से जुड़े सवालों को भी सामने ला रहा है।



