ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/श्रीनगर | 10 अक्टूबर 2026
देश की राजधानी दिल्ली में लोकतांत्रिक विरोध की आवाज को लेकर बड़ा राजनीतिक टकराव खड़ा हो गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले भारी पुलिस तैनाती, जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर नाकेबंदी और विपक्षी नेताओं व कार्यकर्ताओं की हिरासत ने सरकार और प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली के हालात की तुलना कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लागू प्रतिबंधों से की है।
महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली की स्थिति को कश्मीर के उस दौर की याद दिलाने वाला बताया, जब लोगों की आवाजाही पर पाबंदियां लगाई गई थीं और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई थीं। उनका आरोप है कि जिस तरह कश्मीर में प्रतिबंधों के बीच विरोध की आवाज को दबाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं, वैसी ही तस्वीर अब राजधानी दिल्ली में दिखाई दे रही है।
‘पहले कश्मीर को घेरा, अब दिल्ली की बारी?’
महबूबा मुफ्ती ने कहा, “आज की दिल्ली, अनुच्छेद 370 के असंवैधानिक निरस्तीकरण के बाद के कश्मीर की भयावह याद दिलाती है।” उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय लोगों को घरों में बंद कर दिया गया था, इंटरनेट बंद कर दिया गया था और पूरे क्षेत्र को घेराबंदी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था।
मुफ्ती ने आगे कहा कि उस समय भी भाजपा ने यह दावा किया था कि किसी ने विरोध नहीं किया। उनके बयान का आशय यह सवाल उठाना है कि जब विरोध करने के रास्ते ही सीमित कर दिए जाएं, लोगों की आवाजाही बाधित हो और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाए, तो विरोध की वास्तविक तस्वीर सामने कैसे आएगी?
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली में सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई पर राजनीतिक विवाद तेज है। हालांकि, कश्मीर और दिल्ली की परिस्थितियों में समानता का दावा महबूबा मुफ्ती का राजनीतिक आकलन है; दोनों घटनाओं की कानूनी और प्रशासनिक पृष्ठभूमि अलग-अलग तथ्यों के आधार पर देखी जानी चाहिए।
प्रदर्शन से पहले हिरासत, सड़कों पर सुरक्षा का पहरा
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। इससे पहले दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण सहित कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग और राजधानी में भारी सुरक्षा तैनाती ने इस कार्रवाई को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताएं जताई गई हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि शांतिपूर्ण विरोध को नियंत्रित करने के लिए अपनाए गए कदम कितने जरूरी और कितने व्यापक थे।
लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन विरोध और असहमति की जगह बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा संबंधी खतरे हैं, तो उनका समाधान ऐसा होना चाहिए जो अनावश्यक रूप से नागरिकों के अधिकारों और आवाजाही को प्रभावित न करे।
चुनाव आयोग पर सवाल, जवाबदेही की मांग
सीजेपी का प्रस्तावित प्रदर्शन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर उठाए जा रहे सवालों से जुड़ा है। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है। विपक्ष के कुछ नेता भी चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की जांच की मांग कर रहे हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और दस्तावेजों के आधार पर पड़ताल जरूरी है। आरोपों को बिना जांच के स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले गंभीर सवालों का जवाब केवल सुरक्षा व्यवस्था या प्रदर्शन पर पाबंदियों से नहीं दिया जा सकता; संबंधित संस्थाओं को तथ्यों और प्रक्रिया के आधार पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होती है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
दिल्ली की मौजूदा स्थिति ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या लोकतंत्र में असहमति को सुरक्षा का खतरा मानकर सीमित किया जाएगा, या शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखने का रास्ता खोजा जाएगा?
महबूबा मुफ्ती की कश्मीर से तुलना ने इस विवाद को और तीखा कर दिया है। उनके बयान से साफ है कि विपक्ष इस कार्रवाई को केवल एक प्रदर्शन की अनुमति का मामला नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक विरोध के अधिकार से जोड़कर देख रहा है।
अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह हिरासत और प्रतिबंधों के औचित्य को स्पष्ट करे तथा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जुड़े सवालों का जवाब दे। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों को सुनने और असहमति के लिए जगह बनाए रखने से भी परखी जाती है।



