अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 1 सितंबर 2026
नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने हिमालयी क्षेत्र में ऐसी तबाही मचाई है, जिसकी तस्वीरें देखकर कलेजा कांप उठे। मौत का आंकड़ा लगभग 1,000 पहुंच गया है, जबकि 4,471 लोग अब भी लापता हैं। नेपाल में 939 मौतों की पुष्टि हो चुकी है और चीन के तिब्बत क्षेत्र में 16 लोगों की जान जाने के बाद इस पूरे आपदा क्षेत्र में ज्ञात मृतकों की संख्या 955 हो गई है। छठे दिन भी राहत और बचाव अभियान जारी है, लेकिन हजारों परिवारों के लिए हर गुजरता घंटा उम्मीद और बेचैनी के बीच बीत रहा है।
सबसे भयावह तस्वीर उन परिवारों की है जो अपने लापता परिजनों की तस्वीरें हाथ में लेकर अस्पतालों, सेना के शिविरों और राहत केंद्रों के बाहर भटक रहे हैं। किसी को बेटे की तलाश है, किसी को पति की, तो कोई अपने भाई या पिता की खबर का इंतजार कर रहा है। काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में लोग लापता लोगों की तस्वीरें चिपका रहे हैं, ताकि किसी को पहचानने में मदद मिल सके। दूसरी तरफ चितवन में अंतिम संस्कार के दौरान परिवारों की चीख-पुकार ने इस त्रासदी के दर्द को और गहरा कर दिया है।
नेपाल में 3,925 लोग अब भी लापता हैं। इनमें 592 विदेशी नागरिक शामिल हैं। नुवाकोट और रसुवा सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में हैं। नुवाकोट में 1,158 और रसुवा में 865 लोग लापता बताए गए हैं। जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारी भी बाढ़ की चपेट में आए हैं। अधिकारियों के मुताबिक लापता लोगों में नेपाली सेना के 45 जवान, 38 पुलिसकर्मी और 18 सीमा शुल्क एवं आव्रजन अधिकारी भी शामिल हैं।
तबाही की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नेपाल के कई इलाकों में बरामद शवों को रखने के लिए मुर्दाघर कम पड़ गए हैं। नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील करते हुए एक हजार से ज्यादा फ्रीजर यूनिट की जरूरत बताई है। बड़ी संख्या में शवों की तत्काल पहचान नहीं हो पा रही है। ऐसे में डीएनए नमूने लिए जा रहे हैं और कुछ शवों को सामूहिक रूप से दफनाया जा रहा है, ताकि बाद में डीएनए मिलान के जरिए परिवार अपने अपनों की पहचान कर सकें।
प्रलय का असर भारत तक भी पहुंचा है। उत्तर प्रदेश में नेपाल से आने वाली नदियों से 17 शव बरामद किए गए हैं। इन्हें बाढ़ में बहकर आए पीड़ितों का माना जा रहा है, हालांकि इन्हें अभी नेपाल के आधिकारिक मृतक आंकड़े में शामिल नहीं किया गया है। नदियों का तेज बहाव अपने साथ केवल मलबा ही नहीं ला रहा, बल्कि उन परिवारों की उम्मीदों को भी तोड़ रहा है जो सीमा के इस पार अपने किसी प्रियजन के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इस आपदा ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। सड़कें, पुल, बस्तियां और जलविद्युत परियोजनाएं बाढ़ और मलबे की चपेट में आई हैं। कई स्थानों पर सुरंगों और परियोजना स्थलों में लोगों के फंसे होने की आशंका है। पहाड़ी इलाकों का कठिन भूगोल, भारी मलबा और खराब मौसम बचाव अभियान को बेहद चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। सेना और सुरक्षा बल लगातार मलबा हटाने, शवों को निकालने और संभावित रूप से फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी इस प्राकृतिक आपदा ने भारी नुकसान पहुंचाया है। वहां अब तक 16 मौतों की पुष्टि हुई है और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। इस तरह नेपाल और चीन के सीमावर्ती हिमालयी इलाकों में यह आपदा एक व्यापक मानवीय संकट का रूप ले चुकी है।
आंकड़े भले ही 955 मौतों और 4,471 लापता लोगों की कहानी बताते हों, लेकिन इनके पीछे हजारों परिवारों का दर्द छिपा है। किसी घर में चूल्हा इसलिए नहीं जल रहा क्योंकि बेटा वापस नहीं आया, किसी मां की आंखें दरवाजे पर टिकी हैं, तो किसी बच्चे को अब भी भरोसा है कि उसके पिता लौट आएंगे। बचाव दल मलबे में जिंदगी तलाश रहे हैं और परिवार तस्वीरों में अपने अपनों का चेहरा।
नेपाल में पानी का प्रलय शायद धीरे-धीरे थम जाएगा, लेकिन जिन परिवारों से उनके अपने छिन गए हैं, उनके लिए यह त्रासदी पानी उतरने के बाद भी खत्म नहीं होगी। लगभग एक हजार मौतें और हजारों लापता लोग इस आपदा के सिर्फ आंकड़े नहीं हैं—ये हजारों अधूरी कहानियां, उजड़े घर और उन लोगों की तलाश हैं जिनका इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ है।




