नई दिल्ली 27 अक्टूबर 2025
दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए 121 मोहल्ला क्लीनिकों को बंद करने का आदेश जारी किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय राजधानी में डेंगू, वायरल बुखार और सर्दी-जुकाम के मामलों में तेज़ी देखी जा रही है। सरकारी आदेश के मुताबिक, ये क्लीनिक प्रशासनिक अनियमितताओं, किराया विवादों और स्टाफ पेमेंट संबंधी शिकायतों के कारण बंद किए जा रहे हैं। लेकिन इस निर्णय से सबसे बड़ा झटका उन डॉक्टरों, नर्सों, फार्मासिस्टों और पैरामेडिकल स्टाफ को लगा है, जिनकी नौकरी पर अब संकट मंडरा रहा है। बताया जा रहा है कि हजारों लोगों की रोज़ी-रोटी इस फैसले से प्रभावित होगी।
दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक की शुरुआत अरविंद केजरीवाल सरकार ने 2015 में की थी, जिसका उद्देश्य था कि हर नागरिक को अपने मोहल्ले में ही मुफ्त और सुलभ स्वास्थ्य सुविधा मिले। इन क्लीनिकों के ज़रिए न केवल लाखों लोगों का मुफ्त इलाज हुआ, बल्कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को अस्पतालों की लंबी कतारों से भी राहत मिली। लेकिन अब 121 क्लीनिकों को बंद करने के आदेश ने सरकार की नीयत और नीतियों दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जब देश की राजधानी पहले से ही प्रदूषण, बीमारियों और अस्पतालों की भीड़ से जूझ रही है, तब इस तरह का कदम जनता के हितों के खिलाफ है।
सूत्रों के अनुसार, जिन क्लीनिकों को बंद किया गया है, उनमें कई ऐसे हैं जो वर्षों से लगातार अच्छी सेवाएं दे रहे थे। कई डॉक्टरों और स्टाफ ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पिछले कुछ महीनों से उन्हें वेतन नहीं मिल रहा था और किराया भुगतान को लेकर भी विवाद बढ़ गए थे। इसके अलावा, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की कमी भी इस संकट की एक बड़ी वजह बनी। कई जगहों पर क्लीनिकों का बिजली और पानी कनेक्शन भी काट दिया गया है, जिससे मरीजों को भारी असुविधा हो रही है।
विपक्षी दलों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे “जनविरोधी कदम” करार दिया है। बीजेपी नेताओं ने कहा कि जिस मोहल्ला क्लीनिक मॉडल को केजरीवाल सरकार देशभर में प्रचारित करती रही, वही अब उसकी नीतिगत असफलता का प्रतीक बन गया है। कांग्रेस ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दिल्ली सरकार की प्राथमिकताएं अब जनता से ज़्यादा राजनीति पर केंद्रित हैं। वहीं, कई सामाजिक संगठनों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इस फैसले की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन मानकों के आधार पर क्लीनिक बंद किए जा रहे हैं और उन क्षेत्रों में अब स्वास्थ्य सेवाओं की भरपाई कैसे होगी।
उधर, दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि यह कदम अस्थायी है और जल्द ही इन क्लीनिकों को नए प्रबंधन मॉडल के तहत फिर से चालू किया जाएगा। लेकिन फिलहाल, राजधानी में रहने वाले लाखों गरीब और मजदूर वर्ग के लोग, जो रोज़मर्रा की बीमारियों के इलाज के लिए इन क्लीनिकों पर निर्भर थे, खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस संकट का समाधान जल्द नहीं निकाला गया तो आने वाले सर्दियों के मौसम में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव पड़ सकता है।
मोहल्ला क्लीनिकों का बंद होना केवल स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता नहीं, बल्कि उस वादे का भी टूटना है जो “हर दिल्लीवासी को निःशुल्क इलाज” के नाम पर किया गया था। यह फैसला आने वाले समय में दिल्ली के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर गहरा असर डाल सकता है।




