एबीसी डेस्क 3 दिसंबर 2025
देशभर में SIR (Summary Revision / Special Immunisation Register / Special Information Report—राज्य अनुसार परिभाषा अलग) के दबाव, अत्यधिक कार्यभार और लगातार बढ़ते प्रशासनिक तनाव ने एक भयावह रूप ले लिया है। कई राज्यों से लगातार ऐसी मौतों और आत्महत्याओं की खबरें सामने आ रही हैं, जिनमें BLO (Booth Level Officer), सहायक BLO, सुपरवाइजर और संबंधित स्टाफ शामिल हैं। परिवारों का आरोप है कि असंभव लक्ष्य, लंबी ड्यूटी, मानसिक दबाव और अधिकारियों की प्रताड़ना ने इन कर्मचारियों को मौत के रास्ते पर धकेल दिया। यह आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं, बल्कि उन दर्जनों परिवारों के बिखर जाने की दास्तान हैं, जिन्होंने अपने किसी प्रियजन को “सरकारी सिस्टम के बोझ” में खो दिया।
उत्तर प्रदेश: सबसे ज्यादा मौतें, सबसे ज्यादा सवाल
उत्तर प्रदेश में हालात सबसे भयावह हैं—यहां BLO रंजू दुबे, शोभा रानी, आशीष कुमार, विजय कुमार वर्मा और सर्वेश कुमार गंगवार की मौतों ने प्रशासन को झकझोर कर रख दिया है। BLO सर्वेश सिंह और विपिन यादव ने आत्महत्या कर ली, जबकि सहायक BLO अरविंद कुमार और SIR सुपरवाइजर सुधीर कोरी के निधन ने सिस्टम की विफलता की पोल खोल दी है। परिजनों की पीड़ा एक ही बात पर टिकती है—“काम का दबाव जानलेवा हो चुका है।”
केरल: युवा कर्मचारी ने छोड़ी दुनिया
केरल से अनीश जॉर्ज की आत्महत्या ने पूरे राज्य में SIR की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। स्थानीय मीडिया ने इसे प्रशासनिक दबाव और लंबी ड्यूटी घड़ियों से जोड़ा है। सवाल सीधा है—क्या किसी सरकारी प्रोजेक्ट की सफलता के लिए कर्मचारियों की जान को दांव पर लगाना जायज़ है?
तमिलनाडु: BLO और आंगनबाड़ी सेविका तक डिप्रेशन की मार
तमिलनाडु में BLO जहिता की आत्महत्या और एक आंगनबाड़ी सेविका द्वारा आत्महत्या का प्रयास यह दर्शाता है कि基层 स्तर के स्टाफ कितने तनाव में काम कर रहे हैं।基层 कर्मचारी अक्सर सबसे ज्यादा जिम्मेदारी झेलते हैं, पर उनकी सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और समर्थन शून्य के बराबर है।
पश्चिम बंगाल: लगातार मौतें और किसी की जिम्मेदारी तय नहीं
BLO नमिता, शांति और जाकिर हुसैन हक की मौतों के बाद BLO रिंकू तरफदार की आत्महत्या से राज्य के प्रशासनिक ढांचे पर तीखा सवाल खड़ा हुआ है। विपक्ष और कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि रिपोर्टिंग के दबाव और लगातार लक्ष्य बदलने की नीति ने फील्ड स्टाफ को मानसिक रूप से तोड़ दिया है।
राजस्थान: मौतों की लिस्ट बढ़ती गई, सिस्टम चुप
राजस्थान में BLO अनुज गर्ग, हरिओम बैरवा और SIR सुपरवाइजर संतराम की मौत के बाद BLO मुकेश जांगिड की आत्महत्या ने चेतावनी की घंटी बजा दी है। कर्मचारी संगठनों का दावा है कि SIR से जुड़े कामों के लिए कोई प्रशिक्षण, कोई सुरक्षा उपाय और कोई मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट सिस्टम मौजूद नहीं है।
मध्य प्रदेश: सबसे लंबी सूची, सबसे गहरी त्रासदी
मध्य प्रदेश में BLO भुवन, रमाकांत पांडे, सीताराम गोंड, अनिता नागेश्वर, मनीराम नापित, श्याम सुंदर शर्मा, सुजान सिंह रघुवंशी और मनीराम नापित की मौतों ने हड़कंप मचा दिया। BLO उदयभान सिंह सिहारे और नायब तहसीलदार कविता कड़ेला की आत्महत्याओं ने संकेत दिया है कि यह अब एक “व्यवस्थित मानव त्रासदी” बन चुका है। सवाल फिर वही—क्या सिस्टम यह समझना चाहता है कि जिन कर्मचारियों से वह आंकड़े मांग रहा है, वे भी इंसान हैं?
गुजरात: लगातार मौतों से सहमा प्रशासन
गुजरात में BLO रमेशभाई परमार, सहायक उषाबेन, BLO दिनेश कुमार रावल और BLO डिंकल सिंगोड़ावाला की मौत के बाद BLO अरविंद वढेर की आत्महत्या और BLO सहायक कल्पना पटेल की मौत ने SIR के क्रूर दबाव की गंभीरता को सामने ला दिया है। लगातार काम, लक्ष्य का बोझ और अधिकारियों की कड़ाई ने基层 कर्मचारियों की जिंदगी को जोखिम में डाल दिया है।
सिस्टम कब जागेगा?
देशभर में सामने आई BLO और सुपरवाइजर्स की मौतें एक चेतावनी हैं—यह एक प्रशासनिक महामारी है। SIR जैसे अभियानों को बिना स्टाफ की सुरक्षा, प्रशिक्षण, सहायता और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के चलाना सीधा मानवाधिकार मुद्दा है। सवाल यह नहीं कि SIR सफल हुआ या नहीं— सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी कीमत कितनी और कितने जीवनों में चुकाई गई? सरकार को जवाब देना ही होगा—क्या किसी सरकारी अभियान को “जानलेवा” बनने दिया जा सकता है? क्या ये मौतें सिर्फ आंकड़े हैं या एक विफल सिस्टम का आईना?




