राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अक्टूबर 2026
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने अपनी अगली बड़ी रैली की तैयारी शुरू कर दी है। दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस को 1 नवंबर को रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने की अनुमति दे दी है। दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अशुतोष और सौरव को हिरासत से रिहा नहीं किए जाने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। पार्टी का कहना है कि दोनों को कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है।
इस बीच, CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके को 17 अक्टूबर को दिल्ली की अदालत से राहत मिली। एहतियातन हिरासत में लिए गए दीपके को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के बाद रिहा कर दिया गया। लेकिन उनकी रिहाई के बावजूद दिल्ली में विरोध प्रदर्शन थमे नहीं हैं। महिला कार्यकर्ता लगातार आठवें दिन भी प्रदर्शन कर रही हैं। SIR, चुनाव आयोग की जवाबदेही और प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
1 नवंबर को रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, कांग्रेस को 1 नवंबर को रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी किया गया है। SIR के विरोध में कांग्रेस देशभर में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान चला रही है। पार्टी ने इस अभियान के समन्वय और निगरानी के लिए 208 नेताओं को पर्यवेक्षक भी नियुक्त किया है।
कांग्रेस इस अभियान के जरिए मतदाता सूचियों में बदलाव और कथित वोट चोरी के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहती है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची से जुड़े सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए। आने वाली रैली को इस अभियान के अगले बड़े राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
CJP की चेतावनी—अशुतोष और सौरव को रिहा करो
कॉकरोच जनता पार्टी ने अशुतोष और सौरव को हिरासत में रखे जाने के मामले में कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। पार्टी का कहना है कि यदि दोनों को 18 अक्टूबर तक रिहा नहीं किया गया, तो हिरासत के लिए जिम्मेदार लोगों को कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराने की कोशिश की जाएगी। CJP ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से सलाह लेने की बात भी कही है।
CJP की कानूनी प्रमुख के अनुसार, दोनों की रिहाई से जुड़ी प्रक्रिया में सुनवाई के समय और जांच अधिकारी के पहुंचने को लेकर समस्या हुई। पार्टी ने हिरासत की वैधता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, इस मामले में हिरासत के आधार और अदालत की आगे की कार्रवाई से जुड़ी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है।
यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है, जब शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की एहतियाती कार्रवाई को लेकर कानूनी बहस तेज हो रही है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कानून-व्यवस्था का खतरा मानना कितना उचित?
शिक्षाविद और स्तंभकार अपूर्वानंद झा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दलील दी है कि शांतिपूर्ण विरोध को शांति भंग करने के बराबर मानना उचित नहीं है। उनकी याचिका में आरोप लगाया गया है कि निषेधाज्ञाओं और एहतियाती हिरासत का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञाओं की वैधता को चुनौती दी गई है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में विरोध जताने का अधिकार नागरिकों के लिए अहम है। वहीं, प्रशासन की जिम्मेदारी भी है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। असली सवाल यह है कि इन दोनों जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और यह कैसे सुनिश्चित हो कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा पर सवाल
दिल्ली में महिला कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। 17 अक्टूबर को AIDWA, SFI, KYS और अन्य संगठनों से जुड़ी महिलाओं ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय की ओर मार्च किया। प्रदर्शनकारियों ने SIR के विरोध के दौरान महिलाओं के साथ कथित यौन उत्पीड़न और पुलिस कार्रवाई के मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग की।
महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा का मुद्दा अब इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा बन गया है। शिकायतों की निष्पक्ष जांच, पीड़ितों की सुरक्षा और दोषियों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई जरूरी है। किसी भी शिकायत को बिना जांच खारिज करना या तथ्यों की पुष्टि से पहले किसी को दोषी ठहराना, दोनों ही उचित नहीं होंगे।
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक जांच पैनल ने जुलाई 2026 में जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर हुई हिंसा से जुड़े मामलों की जांच के लिए पोर्टल शुरू किया है। गृह मंत्रालय के अनुसार, पेलेट गन के इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने या परेशान करने, अत्यधिक बल प्रयोग और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी।
दिल्ली में SIR के 78.5 प्रतिशत मामले सुलझाने का दावा
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान सामने आए ‘नो-मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के कुल 33,12,919 मामलों में से करीब 26 लाख मामलों का समाधान किया जा चुका है। कार्यालय ने 17 अक्टूबर को बताया कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी इन मामलों को सुलझाने के लिए काम कर रहे हैं।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अनुसार, बूथ लेवल अधिकारी (BLO) मतदाताओं से जरूरी दस्तावेज जुटाने के लिए उनके घर भी जा रहे हैं। इसका उद्देश्य उन मामलों का समाधान करना है, जिनमें मतदाता का रिकॉर्ड मैप नहीं हो पाया है या उपलब्ध जानकारी में तार्किक अंतर पाया गया है।
यह प्रशासनिक दावा SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाए। जिन लोगों के दस्तावेजों या रिकॉर्ड में समस्या है, उन्हें उसे ठीक कराने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
लंदन तक पहुंचा विरोध, मोदी समर्थकों ने भी किया प्रदर्शन
भारत में चुनाव आयोग और SIR को लेकर चल रहा विरोध विदेशों तक भी पहुंच गया है। लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में 17 अक्टूबर को सैकड़ों लोग महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास जुटे। यह प्रदर्शन कांग्रेस के ओवरसीज यूथ विंग और ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय छात्रों के समूहों की ओर से आयोजित किया गया था।
प्रदर्शनकारियों ने ‘वोट चोरी’ के मुद्दे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने भी जवाबी प्रदर्शन किया। पुलिस ने दोनों समूहों को अलग रखा, ताकि टकराव की स्थिति पैदा न हो।
लंदन में हुए इन प्रदर्शनों से पता चलता है कि SIR और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भारतीय राजनीति में चल रही बहस अब विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के बीच भी चर्चा का विषय बन गई है।
आगे क्या?
दिल्ली में कांग्रेस की 1 नवंबर की रैली, CJP की कानूनी चेतावनी और सुप्रीम कोर्ट में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ी याचिका आने वाले दिनों में इस विवाद को और महत्वपूर्ण बना सकती है। एक ओर प्रशासन निषेधाज्ञाओं और कानून-व्यवस्था के आधार पर कार्रवाई कर रहा है, तो दूसरी ओर प्रदर्शनकारी हिरासत, महिला सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जवाब मांग रहे हैं।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि अशुतोष और सौरव के मामले में क्या कार्रवाई होती है, महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जुड़े सवालों पर क्या रुख अपनाता है।
SIR को लेकर जारी विवाद का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। इसके लिए मतदाता सूची की प्रक्रिया में पारदर्शिता, शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा, पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा—इन सभी पर ठोस कदम जरूरी होंगे।



