राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे पर गंभीर सवाल उठाते हुए उसे “भ्रामक और दोहरी बातों वाला” बताया है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकारिकार्जुन खड़गे ने 12 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में SIR के दौरान सामने आई बताई जा रही अनियमितताओं का मुद्दा उठाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा।
कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और आवेदन की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि ‘वोट चोरी’ के खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है। हालांकि, ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं; इन पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार का पक्ष तथा संबंधित दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
हलफनामे पर कांग्रेस ने क्यों उठाए सवाल?
कांग्रेस की मुख्य आपत्ति चुनाव आयोग के उस हलफनामे को लेकर है, जो SIR से जुड़े विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया है। पार्टी का सवाल है कि यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक हुई है, तो अलग-अलग राज्यों से उठ रही शिकायतों और आवेदन प्रक्रिया में हुए बदलावों का स्पष्ट तथा दस्तावेजी जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा?
मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था है। इसमें किसी पात्र मतदाता का नाम छूटना या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम दर्ज रहना चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि चुनाव आयोग हर शिकायत का तथ्यात्मक जवाब दे और यह स्पष्ट करे कि नाम जोड़ने, हटाने तथा आपत्तियों के निपटारे में कौन-से नियम अपनाए गए।
कांग्रेस का कहना है कि केवल हलफनामा दाखिल कर देना पर्याप्त नहीं है। प्रक्रिया की पारदर्शिता साबित करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड, निर्णयों का आधार और नियमों के पालन का विवरण भी सार्वजनिक जांच के दायरे में होना चाहिए।
12 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश का मुद्दा
मल्लिकार्जुन खड़गे ने SIR को लेकर 12 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में कथित अनियमितताओं के उदाहरण सामने रखे। कांग्रेस का कहना है कि इन शिकायतों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरी प्रक्रिया के संदर्भ में जांचा जाना चाहिए।
मतदाता सूची में संशोधन के दौरान नागरिकों को अपने नाम की स्थिति जानने, गलत प्रविष्टियों पर आपत्ति दर्ज कराने और पात्र होने पर नाम जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी राज्य में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाते हैं या आवेदन प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा होता है, तो उसका कारण स्पष्ट करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से उठाए गए हर मामले की स्वतंत्र पुष्टि और राज्यवार आंकड़ों की जांच जरूरी है। चुनाव आयोग को शिकायतों का जवाब संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर देना चाहिए, ताकि राजनीतिक आरोपों और प्रमाणित अनियमितताओं के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।
फॉर्म-6 पर बदलते बयानों का सवाल
इस विवाद का एक प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 को लेकर है। इसी फॉर्म का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के आवेदन के लिए किया जाता है। कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणा या जानकारी से जुड़े बदलावों को लेकर चुनाव आयोग के बयानों में अंतर क्यों दिखाई देता है।
यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि आवेदन प्रक्रिया में किसी भी बदलाव का सीधा असर उन नागरिकों पर पड़ सकता है जो पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना चाहते हैं या जिनका नाम सूची में नहीं है। यदि कोई अतिरिक्त घोषणा जरूरी है, तो मतदाताओं को उसकी जानकारी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए। यह भी साफ होना चाहिए कि बदलाव किस नियम के तहत किया गया और उसका उद्देश्य क्या है।
चुनाव आयोग को दस्तावेजों के साथ बताना चाहिए कि फॉर्म-6 की प्रक्रिया में वास्तव में क्या बदला, कब बदला और क्या यह बदलाव पहले से लागू नियमों के अनुरूप था। इससे भ्रम दूर होगा और नागरिकों का भरोसा मजबूत करने में मदद मिलेगी।
मोदी-शाह पर भी कांग्रेस ने उठाए सवाल
खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे ‘वोट चोरी’ के खिलाफ चल रहे आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को लेकर भी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए।
यह राजनीतिक विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में चुनाव आयोग की जवाबदेही, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा भी है।
हालांकि, सरकार या किसी संवैधानिक पदाधिकारी की भूमिका को लेकर लगाए गए आरोपों की पुष्टि तथ्यों और दस्तावेजों से ही हो सकती है। इसीलिए जरूरी है कि सभी पक्ष राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस जानकारी सामने रखें।
सवालों का जवाब रिकॉर्ड से मिलना चाहिए
SIR पर विवाद के बीच सबसे अहम मांग पारदर्शिता की है। चुनाव आयोग को फॉर्म-6 से जुड़े नियमों, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, राज्यों से मिली शिकायतों तथा उन पर की गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण देना चाहिए। जहां नियमों के उल्लंघन की शिकायत है, वहां उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
कांग्रेस के आरोपों का जवाब भी तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए। यदि आयोग का दावा है कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार हुई है, तो संबंधित दस्तावेज और निर्णयों का आधार इस दावे को परखने में मदद कर सकते हैं।
मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार का आधार है। किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना गंभीर चिंता का विषय है, जबकि गलत प्रविष्टियों को हटाने की प्रक्रिया भी कानून और पारदर्शिता के अनुरूप होनी चाहिए।
अब चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के सामने चुनौती है कि वे उठाए गए सवालों का स्पष्ट, तथ्यात्मक और दस्तावेजी जवाब दें। लोकतंत्र में भरोसा केवल दावों से नहीं बनता—उसके लिए निष्पक्ष प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।



