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घर में स्पिन के आगे ढेर, अब श्रीलंका में अग्निपरीक्षा: टीम इंडिया को गंभीर-गुरुमंत्र—स्वीप खेलो, कदम बढ़ाओ, वरना फिर वही हाल

न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका ने भारत को उसी की जमीन पर स्पिन से किया था बेदम; अब गॉल-कोलंबो में फिर घूमती गेंद का खतरा—गौतम गंभीर का बल्लेबाजों को साफ संदेश, बाएं हाथ के स्पिनर पर स्वीप और ऑफ स्पिनर के खिलाफ क्रीज से बाहर निकलकर बिगाड़ो लाइन-लेंथ

खेल | ABC NATIONAL NEWS | कोलंबो | 7 अगस्त 2026

स्पिन कभी भारत की ताकत थी, अब वही सबसे बड़ी कमजोरी क्यों?

भारतीय बल्लेबाज और स्पिन गेंदबाजी—कभी इन दोनों का रिश्ता ऐसा था कि दुनिया के बड़े से बड़े स्पिनर भारत आने से पहले अपनी रणनीति दो बार सोचते थे। भारतीय बल्लेबाज गेंद की फ्लाइट पढ़ते थे, आगे निकलकर खेलते थे, कलाई का इस्तेमाल करते थे और स्पिनर की अच्छी गेंद को भी रन में बदल देते थे। लेकिन पिछले कुछ समय में तस्वीर हैरान करने वाली तेजी से बदली है। न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका ने भारत को उसी के घर में लगातार टेस्ट सीरीज में क्लीन स्वीप किया और दोनों बार भारतीय बल्लेबाजी की सबसे बड़ी कमजोरी स्पिन के सामने खुलकर सामने आई। बल्लेबाज क्रीज में फंसे रहे, रन बंद हुए, दबाव बढ़ा और फिर एक के बाद एक विकेट गिरते चले गए। अब भारतीय टीम श्रीलंका पहुंच चुकी है, जहां गॉल और कोलंबो की पिचों पर फिर स्पिन का जाल इंतजार कर रहा है। इसलिए इस बार तैयारी का मंत्र बेहद सीधा है—स्वीप खेलना सीखो, पैरों का इस्तेमाल करो और स्पिनर को अपनी मर्जी से गेंदबाजी मत करने दो।

10 दिन पहले श्रीलंका पहुंची टीम, क्योंकि इस बार बहाने की गुंजाइश नहीं

भारत पहला टेस्ट शुरू होने से करीब 10 दिन पहले श्रीलंका पहुंच गया है और SLC XI के खिलाफ कोलंबो के NCC में अभ्यास मुकाबला भी तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इतनी जल्दी पहुंचने का मकसद साफ है—बल्लेबाजों को श्रीलंका की परिस्थितियों में ढलने के लिए पर्याप्त समय देना। पिछले घरेलू झटकों के बाद टीम मैनेजमेंट अच्छी तरह जानता है कि श्रीलंका जाकर फिर वही गलतियां दोहराई गईं तो सवाल सिर्फ बल्लेबाजों पर नहीं, कोचिंग स्टाफ और पूरी तैयारी पर उठेंगे। मुख्य कोच गौतम गंभीर ने भी खिलाड़ियों को संदेश दिया है कि 15 अगस्त की सुबह तक टीम के पास सामने आने वाले हर सवाल का जवाब होना चाहिए। गंभीर चाहते हैं कि तैयारी में कोई बॉक्स खाली न छूटे। यानी इस बार यह कहने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए कि गेंद उम्मीद से ज्यादा घूमी, पिच धीमी थी या स्पिनरों की लाइन समझने में वक्त लगा। खतरा पहले से मालूम है, इसलिए जवाब भी पहले से तैयार होना चाहिए।

समस्या स्पिन नहीं, क्रीज में जड़ हो जाना है

भारतीय बल्लेबाजों की हालिया सबसे बड़ी समस्या यह नहीं रही कि वे घूमती गेंद खेल ही नहीं सकते। असली समस्या यह रही कि कई बार वे स्पिनर के खिलाफ क्रीज में बंधकर रह गए। बल्लेबाज न पूरी तरह आगे निकला, न पीछे गया और न ही स्वीप से गेंदबाज की लाइन बिगाड़ पाया। नतीजा यह हुआ कि विरोधी स्पिनर एक ही जगह गेंद डालते रहे और बल्लेबाज धीरे-धीरे दबाव में फंसते गए। टेस्ट क्रिकेट में टर्निंग पिच पर केवल खराब गेंद का इंतजार करना खतरनाक रणनीति है, क्योंकि खराब गेंद आने से पहले कोई अच्छी गेंद आपका विकेट ले सकती है। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भी यही कमजोरी सामने आई। जब भारतीय बल्लेबाजों के पसंदीदा रन बनाने वाले इलाके बंद किए गए तो वे स्ट्राइक बदलने और नए रास्ते खोजने में संघर्ष करते दिखाई दिए। गेंदबाज को चुनौती देने के बजाय कई बल्लेबाज उसकी अगली गलती का इंतजार करते रहे—और उस इंतजार की कीमत विकेट से चुकानी पड़ी।

गंभीर का होमवर्क सीधा—बाएं हाथ के स्पिनर को स्वीप करो

श्रीलंका दौरे से पहले भारतीय बल्लेबाजों के अभ्यास में स्वीप शॉट पर खास ध्यान दिया जा रहा है। इसके पीछे साफ रणनीति है। बाएं हाथ का स्पिनर अगर लगातार स्टंप और पैड की लाइन में गेंद डाल रहा है तो केवल सीधे बल्ले से उसका सामना करते रहने पर वह बल्लेबाज को बांध सकता है। लेकिन बल्लेबाज स्वीप खेलना शुरू कर दे तो वही गेंद स्क्वायर लेग और फाइन लेग की तरफ रन दे सकती है। इससे फील्ड बदलती है और सबसे महत्वपूर्ण बात—गेंदबाज को अपनी लाइन और लेंथ बदलनी पड़ती है। श्रीलंका में कम उछाल वाली पिचों पर सही तरीके से खेला गया स्वीप बेहद प्रभावी हथियार हो सकता है। भारत को इसलिए समझना होगा कि स्वीप कोई दिखावे का शॉट नहीं बल्कि स्पिनर के नियंत्रण को तोड़ने का तरीका है। स्पिनर अगर पांच ओवर तक एक ही जगह गेंद डाल रहा है तो गलती केवल गेंदबाज की अच्छी गेंदबाजी की नहीं, बल्लेबाज की निष्क्रियता की भी है।

ऑफ स्पिनर आया तो क्रीज से बाहर निकलो, उसकी लेंथ बिगाड़ो

दूसरा बड़ा मंत्र पैरों के इस्तेमाल का है। ऑफ स्पिनर को अगर बल्लेबाज क्रीज में खड़े होकर लगातार खेलने लगे तो गेंदबाज के लिए अपनी पसंदीदा लेंथ पकड़ना आसान हो जाता है। लेकिन बल्लेबाज कभी एक-दो कदम आगे निकले, कभी गेंद की पिच तक पहुंचे और कभी पीछे जाकर जगह बनाए तो गेंदबाज को लगातार अपनी लेंथ बदलनी पड़ती है। यही पुराने दौर के भारतीय बल्लेबाजों की बड़ी ताकत हुआ करती थी। वे स्पिनर को यह तय नहीं करने देते थे कि मुकाबला कहां खेला जाएगा। अब गंभीर की टीम उसी कला को फिर मजबूत करना चाहती है। इसका मतलब हर दूसरी गेंद पर आगे निकलकर छक्का मारना नहीं है। मकसद है गेंद की पिच तक पहुंचकर टर्न खत्म करना, गेंदबाज को लेंथ छोटी करने पर मजबूर करना और उसे यह महसूस कराना कि बल्लेबाज क्रीज का कैदी नहीं है।

सामने प्रभात जयसूर्या—एक ही जगह गेंद डालकर गलती का इंतजार करने वाला शिकारी

श्रीलंका में भारतीय बल्लेबाजों की सबसे कठिन परीक्षाओं में प्रभात जयसूर्या का सामना शामिल होगा। बाएं हाथ के इस स्पिनर की सबसे बड़ी ताकत लगातार स्टंप्स पर हमला करना और बल्लेबाज को गलती के लिए मजबूर करना है। वह हर गेंद पर कोई जादू करने की कोशिश नहीं करता; उसकी ताकत लगातार सही जगह गेंद डालकर बल्लेबाज के धैर्य और तकनीक को चुनौती देना है। अगर भारतीय बल्लेबाज उसके खिलाफ क्रीज में जमे रहे और केवल खराब गेंद का इंतजार करते रहे तो मुकाबला जयसूर्या की शर्तों पर खेला जाएगा। इसलिए स्वीप, स्ट्राइक रोटेशन और पैरों का इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उसके साथ धनंजय डी सिल्वा की ऑफ स्पिन, रमेश मेंडिस और दोनों हाथों से गेंदबाजी करने की क्षमता रखने वाले कामिंदु मेंडिस जैसे विकल्प श्रीलंका को विविधता देते हैं। यानी भारतीय बल्लेबाज एक ही तरह के स्पिन की तैयारी करके नहीं उतर सकते।

पंत करते हैं पैरों का इस्तेमाल, बाकी बल्लेबाजों को भी खोलना होगा खेल

मौजूदा भारतीय बल्लेबाजी में ऋषभ पंत उन खिलाड़ियों में हैं जो स्पिनर को अपनी शर्तों पर गेंदबाजी करने देना पसंद नहीं करते। वह आगे निकल सकते हैं, अचानक हमला कर सकते हैं और गेंदबाज की लाइन बिगाड़ने का जोखिम लेने से नहीं डरते। केएल राहुल ने भी कई मौकों पर पैरों का इस्तेमाल करने की इच्छा दिखाई है। लेकिन पूरी बल्लेबाजी इकाई में यह आदत लगातार दिखाई नहीं देती। स्वीप की स्थिति भी लगभग यही है। भारतीय बल्लेबाज तकनीकी रूप से मजबूत हो सकते हैं, लेकिन यदि स्पिनर के खिलाफ उनके पास केवल दो या तीन रन बनाने वाले शॉट हैं तो विपक्ष के लिए फील्ड लगाकर उन्हें बांधना आसान हो जाता है। टर्निंग विकेट पर बल्लेबाज को केवल विकेट बचाने की तकनीक नहीं, रन निकालने की तकनीक भी चाहिए।

स्टीव स्मिथ-पुजारा से लेकर ख्वाजा-कैरी तक ने दिखाया रास्ता

श्रीलंका में सफल बल्लेबाजी का कोई एक ही तरीका नहीं है। स्टीव स्मिथ और चेतेश्वर पुजारा जैसे बल्लेबाजों ने पैरों का शानदार इस्तेमाल करके स्पिनरों की लेंथ बिगाड़ी है। दूसरी तरफ उस्मान ख्वाजा और एलेक्स कैरी जैसे बल्लेबाज स्वीप और रिवर्स स्वीप का इस्तेमाल करके रन निकालते रहे हैं। श्रीलंका के अपने बल्लेबाजों ने भी स्वीप को हथियार बनाया है। मतलब साफ है—तकनीक अलग हो सकती है, लेकिन एक बात लगभग हर सफल बल्लेबाज में मिलती है: वह स्पिनर को लगातार अपनी पसंदीदा जगह गेंद नहीं डालने देता। भारत को भी यही सीख दोबारा अपनानी होगी। बल्लेबाज अपनी शैली छोड़े बिना इतना जरूर करे कि गेंदबाज को हर ओवर में उसके लिए नई योजना बनानी पड़े।

टर्निंग विकेट पर केवल डिफेंस करते रहे तो एक गेंद आपका नाम लेकर आएगी

टेस्ट क्रिकेट में एक पुरानी बात बार-बार सही साबित होती है—बहुत ज्यादा घूमती पिच पर कोई बल्लेबाज हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं है। आप दस गेंद शानदार तरीके से रोक सकते हैं, लेकिन ग्यारहवीं गेंद तेजी से अंदर आ सकती है, ज्यादा घूम सकती है, नीची रह सकती है या बल्ले का किनारा ले सकती है। इसलिए सिर्फ विकेट बचाने की कोशिश कई बार विकेट गंवाने का रास्ता बन जाती है। बल्लेबाज को रन भी बनाते रहना होता है ताकि गेंदबाज दबाव में आए और कप्तान को फील्ड बदलनी पड़े। स्ट्राइक बदलना इसीलिए बेहद जरूरी है। अगर एक स्पिनर लगातार एक ही बल्लेबाज को पांच-सात गेंदें डाल रहा है तो उसके पास जाल बिछाने का समय है। एक सिंगल उस पूरी योजना को तोड़ सकता है। भारत की पिछली नाकामियों में यही छोटी दिखने वाली बात बहुत बड़ी बन गई थी।

50-60 रन से तय होने वाले टेस्ट में यही फर्क जीत-हार तय करेगा

श्रीलंका में मुकाबले कई बार बहुत बड़े स्कोर से नहीं बल्कि 50-60 रन के अंतर से तय होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी बल्लेबाज के 30 अतिरिक्त रन पूरी टीम के लिए मैच बदल सकते हैं। यही कारण है कि स्वीप और पैरों का इस्तेमाल केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि मैच जीतने की रणनीति है। मान लीजिए कोई बल्लेबाज 70 गेंदों में केवल 20 रन बनाकर आउट हो गया। उसने विकेट जरूर कुछ समय बचाया, लेकिन गेंदबाज को दबाव में नहीं डाला। वहीं वही बल्लेबाज स्वीप, सिंगल और आगे निकलकर खेलने से 70 गेंदों में 45 रन बना दे तो विपक्षी कप्तान को फील्ड बदलनी होगी और गेंदबाज को भी जोखिम लेना पड़ेगा। टर्निंग पिच पर यह अंतर बहुत बड़ा हो जाता है।

अब असली परीक्षा बल्लेबाजों की नहीं, गंभीर की तैयारी की भी है

गौतम गंभीर के लिए भी श्रीलंका दौरा बेहद महत्वपूर्ण है। न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ घरेलू नाकामी के बाद यह कहना आसान था कि बल्लेबाज स्पिन के खिलाफ बेहतर खेलें। लेकिन अब कोचिंग स्टाफ को मालूम है कि समस्या कहां है और उसे सुधारने के लिए पर्याप्त समय भी मिला है। इसलिए श्रीलंका में अगर वही पुरानी तस्वीर दिखाई दी—क्रीज में फंसे बल्लेबाज, स्ट्राइक रोटेशन बंद, स्वीप गायब और स्पिनर एक ही जगह गेंद डालकर विकेट निकालते हुए—तो सवाल खिलाड़ियों के साथ कोचिंग और तैयारी पर भी उठेंगे। गलती पहली बार हो तो कमजोरी कही जा सकती है; बार-बार वही गलती हो तो वह खराब तैयारी बन जाती है।

अब बहाना नहीं चलेगा—खतरा भी मालूम, इलाज भी मालूम

टीम इंडिया श्रीलंका पहुंच चुकी है। सामने कौन-से स्पिनर होंगे, लगभग मालूम है। पिच कैसी हो सकती है, मालूम है। पिछली हार क्यों हुई, यह भी मालूम है। समस्या का समाधान क्या है—स्वीप, फुटवर्क, स्ट्राइक रोटेशन और गेंदबाज की लेंथ बिगाड़ना—यह भी मालूम है। इसलिए इस बार परिस्थितियों को दोष देना मुश्किल होगा। भारतीय बल्लेबाजों को दिखाना होगा कि उन्होंने पिछली हार से वास्तव में कुछ सीखा है। सिर्फ नेट्स में स्वीप लगाने या आगे निकलकर गेंद खेलने से काम नहीं चलेगा; असली परीक्षा तब होगी जब गॉल की पिच घूम रही होगी, चार फील्डर बल्ले के आसपास खड़े होंगे और सामने वाला स्पिनर लगातार स्टंप पर गेंद डाल रहा होगा।

भारत कभी दुनिया को स्पिन खेलना सिखाता था। अब श्रीलंका में उसे खुद साबित करना है कि वह यह कला भूला नहीं है। गंभीर का होमवर्क साफ है—स्वीप करो, कदमों का इस्तेमाल करो, रन बनाते रहो और स्पिनर को हावी मत होने दो। वरना न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जो कहानी घर में लिखी गई थी, उसका अगला अध्याय श्रीलंका में भी लिखा जा सकता है।

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