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ट्रंप के आगे फिर टेक दिए घुटने? UPI पर ‘अंकल सैम फैक्टर’: अमेरिकी दबाव के बीच सरकार ने खोला MDR का रास्ता

UPI और RuPay पर शुल्क की कानूनी बाधा हटाने वाला संशोधन संसद में; अमेरिका लंबे समय से भारत की ‘जीरो-MDR’ नीति पर उठा रहा सवाल—Visa - Mastercard के हितों का मामला, कांग्रेस ने बताया अमेरिकी दबाव; निर्मला बोलीं—ग्राहक नहीं, मर्चेंट पर लागू होगा MDR

अर्थव्यवस्था/ बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026

UPI पर अचानक बदलाव क्यों, और ठीक इसी वक्त क्यों?

जिस UPI को भारत सरकार वर्षों से देश की डिजिटल क्रांति की सबसे बड़ी कामयाबी बताती रही, जिस UPI का उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सरकार के मंत्री दुनिया के मंचों पर देते रहे और जिसने चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक भुगतान का तरीका बदल दिया, अब उसी UPI की सबसे बड़ी खासियत—बिना MDR वाला भुगतान—बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। केंद्र सरकार संसद में ऐसा कानूनी संशोधन लाई है, जिससे बैंकों और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स के लिए UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर Merchant Discount Rate यानी MDR लगाने का रास्ता खुल सकता है। सरकार का कहना है कि इसका बोझ सीधे ग्राहक पर नहीं बल्कि व्यापारी पर होगा और अंतिम व्यवस्था अभी तय नहीं हुई है। लेकिन बड़ा सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि MDR कौन देगा। असली सवाल है—यह बदलाव अभी क्यों हो रहा है? क्योंकि इसी समय भारत और अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत कर रहे हैं और अमेरिका लंबे समय से भारत की जीरो-MDR नीति तथा RuPay को मिलने वाले कथित फायदे पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में सरकार चाहे इसे महज घरेलू आर्थिक सुधार बताए, लेकिन अमेरिकी दबाव का सवाल इतनी आसानी से खत्म नहीं होने वाला।

जिस UPI पर भारत को गर्व, उसी से अमेरिकी कंपनियों को परेशानी क्यों?

UPI की सफलता को समझेंगे तो पूरा विवाद बेहद आसानी से समझ में आ जाएगा। पहले डिजिटल भुगतान के लिए कार्ड, मशीन और कार्ड नेटवर्क की जरूरत पड़ती थी। इस पूरी व्यवस्था में बैंक, पेमेंट प्रोसेसर और Visa-Mastercard जैसी कंपनियों के लिए कमाई का रास्ता था। फिर UPI आया और खेल बदल गया। मोबाइल निकाला, QR कोड स्कैन किया और पैसा सीधे एक बैंक खाते से दूसरे खाते में पहुंच गया। ग्राहक के लिए आसान, दुकानदार के लिए आसान और आम भुगतान पर MDR शून्य। यही UPI की सबसे बड़ी ताकत बन गई। लेकिन जो चीज भारत के करोड़ों लोगों के लिए सुविधा बनी, वही पारंपरिक कार्ड कंपनियों के कारोबारी मॉडल के लिए चुनौती भी बनी। ऊपर से भारत ने RuPay के रूप में अपना कार्ड नेटवर्क मजबूत कर लिया। मतलब साफ है—UPI ने कई जगह कार्ड की जरूरत घटाई और जहां कार्ड की जरूरत रही, वहां RuPay ने Visa और Mastercard को घरेलू चुनौती दी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर भारत का अपना सिस्टम सस्ता और सफल है, तो क्या उसे इसलिए बदलना चाहिए क्योंकि विदेशी कंपनियों को उसमें अपने लिए उतना बड़ा कारोबारी मौका दिखाई नहीं देता?

अमेरिका पहले ही कह चुका है—भारत की नीति से हमें दिक्कत है

यह अमेरिकी दबाव की कोई हवा-हवाई कहानी नहीं है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि USTR भारत की डिजिटल पेमेंट नीतियों पर बाकायदा सवाल उठा चुका है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि भारत की नीतियां घरेलू पेमेंट नेटवर्क को अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले फायदा देती हैं और अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट कंपनियों को खासकर UPI के जरिए क्रेडिट ट्रांजैक्शन में RuPay जैसा बराबरी का मौका मिलना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिका चाहता है कि भारत का विशाल डिजिटल पेमेंट बाजार उसकी कंपनियों के लिए भी समान कारोबारी अवसर पैदा करे। यहां भारत के सामने सीधा सवाल है—हमारी भुगतान नीति का पहला उद्देश्य भारत के करोड़ों ग्राहकों और छोटे व्यापारियों को सस्ती सुविधा देना है या विदेशी पेमेंट कंपनियों के लिए कमाई के बराबर अवसर तैयार करना? मुक्त प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन देश की सफल सार्वजनिक डिजिटल व्यवस्था को केवल इसलिए बदल देना कि किसी विदेशी कंपनी को अपना बाजार छोटा होता दिखाई दे रहा है, यह बिल्कुल अलग बात होगी।

UPI में अमेरिकी कंपनियां पहले से ताकतवर, फिर शिकायत किस बात की?

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अमेरिकी कंपनियां UPI से बाहर नहीं हैं। उलटे UPI के इस्तेमाल में उनका दबदबा बेहद बड़ा रहा है। अमेरिकी स्वामित्व वाले Google Pay और Walmart समर्थित PhonePe भारत के UPI लेनदेन का बहुत बड़ा हिस्सा संभालते रहे हैं। यानी भारतीय ग्राहक UPI इस्तेमाल कर रहा है और सामने ऐप अमेरिकी कंपनी का भी हो सकता है। इसके बावजूद विवाद जारी है, क्योंकि असली लड़ाई ऐप की नहीं बल्कि उस पैसे की है जो हर ट्रांजैक्शन से कमाया जा सकता है। UPI का जीरो-MDR मॉडल भुगतान को बेहद सस्ता रखता है, लेकिन यही मॉडल पारंपरिक कार्ड नेटवर्क जैसी शुल्क आधारित कमाई को सीमित करता है। इसलिए बहस को केवल ‘विदेशी बनाम स्वदेशी ऐप’ समझना गलत होगा। असली सवाल है—भारत में होने वाले अरबों डिजिटल भुगतान से कमाई किसे और कितनी करने दी जाएगी?

ट्रेड डील चल रही है और उसी बीच कानून बदला जा रहा है—सवाल तो उठेंगे

सरकार के लिए सबसे असहज सवाल टाइमिंग का है। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है। अमेरिकी प्रशासन भारत की कई व्यापार और डिजिटल नीतियों पर अपनी आपत्तियां रख चुका है। और इसी दौर में भारत UPI और RuPay की जीरो-MDR व्यवस्था से जुड़ी कानूनी स्थिति बदलने की तरफ बढ़ रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे सीधे अमेरिकी दबाव से जोड़ा है। सरकार इस आरोप को गलत बता सकती है और उसके पास ऐसा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन केवल आरोप खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। अगर अमेरिकी दबाव का इस बदलाव से कोई लेना-देना नहीं है, तो सरकार बेहद आसान तरीके से विवाद खत्म कर सकती है—देश को साफ-साफ बताए कि MDR का रास्ता खोलने की जरूरत क्यों पड़ी, इसका प्रस्ताव कब तैयार हुआ, इसके पीछे कौन-सा आर्थिक अध्ययन है और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में UPI, RuPay और अमेरिकी पेमेंट कंपनियों को लेकर वास्तव में क्या चर्चा हुई। जब सवाल बड़ा हो तो जवाब भी बड़ा और साफ होना चाहिए।

निर्मला सीतारमण बोलीं—ग्राहक नहीं देगा पैसा; लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ किया है कि MDR ग्राहक पर नहीं बल्कि मर्चेंट यानी व्यापारी पर लागू होता है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सुरक्षा में ज्यादा निवेश करने में मदद मिल सकती है और अभी अंतिम व्यवस्था तय नहीं हुई है। यह महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण है और इसलिए यह कहना गलत होगा कि कल से हर UPI भुगतान पर ग्राहक से सीधे पैसा काट लिया जाएगा। लेकिन सरकार के जवाब से एक दूसरा सवाल खत्म नहीं होता—अगर दुकानदार से पैसा लिया जाएगा तो क्या उसका असर आखिर ग्राहक तक नहीं पहुंचेगा? कोई भी दुकान अपनी लागत हवा में नहीं उड़ाती। कारोबार की लागत बढ़ेगी तो कहीं मार्जिन कम होगा, कहीं कीमत में उसका हिस्सा जुड़ेगा और कहीं छोटे डिजिटल भुगतान को लेकर व्यापारी का व्यवहार बदल सकता है। इसलिए यह कहना कि ‘ग्राहक MDR नहीं देगा’ तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ग्राहक पर उसका कोई आर्थिक असर कभी पड़ेगा ही नहीं।

₹10 की चाय पर भी दुकानदार लागत गिनेगा—छोटे व्यापारियों का क्या होगा?

UPI की असली क्रांति किसी पांच सितारा होटल के काउंटर पर नहीं हुई। इसकी असली क्रांति सड़क किनारे चाय बेचने वाले, सब्जी वाले, ऑटो चालक, छोटी किराना दुकान, पान की दुकान और मोहल्ले के छोटे कारोबारी तक डिजिटल भुगतान पहुंचने में हुई। यही वह वर्ग है जिसके लिए हर छोटी लागत मायने रखती है। अगर ₹20, ₹50 या ₹100 के भुगतान पर भी किसी रूप में व्यापारी की लागत बढ़ती है, तो सरकार को पहले से साफ करना चाहिए कि छोटे व्यापारियों को कैसे बचाया जाएगा। क्या बेहद छोटे भुगतान MDR से बाहर रहेंगे? क्या छोटे दुकानदारों के लिए अलग नियम होगा? क्या कारोबार के आकार के हिसाब से शुल्क तय होगा? सरकार यदि सच में आम आदमी और छोटे व्यापारी के हित की बात कर रही है तो इन सवालों का जवाब कानून बनने के बाद नहीं, कानून बनाने से पहले सामने आना चाहिए।

ब्राजील के Pix पर भी अमेरिका को परेशानी—यानी निशाने पर सिर्फ भारत नहीं

अमेरिका की यह लड़ाई केवल भारत के UPI तक सीमित नहीं है। ब्राजील ने Pix नाम का बेहद सफल इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम बनाया। वह भी कार्ड आधारित भुगतान के मुकाबले सस्ता और आसान है। अमेरिकी व्यापार व्यवस्था ने वहां भी सवाल उठाया कि घरेलू पेमेंट सिस्टम को मिलने वाली प्राथमिकता अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट कंपनियों को नुकसान पहुंचाती है। ब्राजील पर अमेरिकी Section 301 कार्रवाई और टैरिफ के व्यापक विवाद में Pix से जुड़ी अमेरिकी चिंताओं का भी उल्लेख सामने आया। इससे एक बात साफ होती है—वॉशिंगटन डिजिटल पेमेंट को केवल तकनीक या सुविधा के रूप में नहीं देखता, वह इसे अमेरिकी कंपनियों की बाजार पहुंच और व्यापारिक हितों के नजरिए से भी देखता है। इसलिए भारत में जब UPI नीति बदलने की चर्चा उसी दौर में हो जब अमेरिका उसकी मौजूदा व्यवस्था पर आपत्ति जता रहा हो, तो ‘अंकल सैम फैक्टर’ पूछना कोई बेबुनियाद सवाल नहीं है।

भारत ही नहीं—दुनिया के घरेलू पेमेंट सिस्टम से अमेरिका को शिकायत

इंडोनेशिया, वियतनाम, तुर्किये, खाड़ी देशों और चीन तक अमेरिका स्थानीय भुगतान व्यवस्था और अमेरिकी कंपनियों की बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दे उठा चुका है। अमेरिका की अपनी दलील है—अगर बाजार खुला है तो अमेरिकी कंपनियों को घरेलू कंपनियों के बराबर मौका मिलना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ देशों का तर्क भी कमजोर नहीं है। डिजिटल भुगतान अब सिर्फ कारोबार नहीं है; यह देश के वित्तीय ढांचे, डेटा, साइबर सुरक्षा, बैंकिंग सिस्टम और आर्थिक संप्रभुता से जुड़ा मामला बन चुका है। जिस तरह कोई देश अपनी सड़क, बिजली या दूरसंचार व्यवस्था को केवल विदेशी कंपनियों की कमाई के हिसाब से नहीं चलाता, उसी तरह डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर भी राष्ट्रीय हित का सवाल उठेगा। भारत को अमेरिका से व्यापार करना है, लेकिन व्यापार का मतलब यह नहीं कि अपनी सफल घरेलू व्यवस्था की शर्तें भी वॉशिंगटन की शिकायतों के हिसाब से लिखी जाएं।

लेकिन UPI सचमुच मुफ्त नहीं चलता—सरकार के पास यह तर्क मजबूत है

इस पूरे मामले में सरकार और बैंकों का पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्राहक को UPI मुफ्त दिखाई देता है, लेकिन UPI सिस्टम चलाने में पैसा खर्च होता है। बैंक के सर्वर चलते हैं, साइबर सुरक्षा पर खर्च होता है, धोखाधड़ी रोकने के सिस्टम बनते हैं, टेक्नोलॉजी लगातार अपडेट करनी पड़ती है और हर दिन भारी संख्या में ट्रांजैक्शन संभालने के लिए विशाल डिजिटल ढांचा चाहिए। यह सब मुफ्त नहीं होता। इसलिए बैंक और फिनटेक कंपनियां अगर कहती हैं कि इतने बड़े सिस्टम को लंबे समय तक चलाने के लिए कमाई का कोई टिकाऊ तरीका चाहिए, तो उस तर्क को केवल ‘कॉरपोरेट लालच’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन फिर सरकार को देश के सामने पूरा हिसाब रखना चाहिए—UPI चलाने में कितना खर्च आता है, अभी उसका पैसा कौन देता है, सरकारी सहायता कितनी है, बैंकों पर कितना बोझ है और MDR आने से कितना पैसा जुटेगा। हिसाब सामने होगा तो जनता खुद तय कर लेगी कि फैसला जरूरत है या बहाना।

कांग्रेस का आरोप गंभीर है तो सरकार दस्तावेज रखकर उसे गलत साबित करे

कांग्रेस ने अगर अमेरिकी दबाव का आरोप लगाया है तो जरूरी नहीं कि आरोप अपने आप सच मान लिया जाए। विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार का काम जवाब देना। लेकिन ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक तंज से नहीं बल्कि तथ्यों से दिया जाना चाहिए। अगर UPI-RuPay से जुड़े बदलाव का अमेरिका की मांगों से कोई संबंध नहीं है तो सरकार के लिए विपक्ष के आरोप की हवा निकालना मुश्किल नहीं होना चाहिए। संबंधित आर्थिक अध्ययन, बैठकों की जानकारी और नीति बदलने का आधार सामने रख दिया जाए। इससे बहस भी खत्म होगी और सरकार की स्थिति भी मजबूत होगी। लेकिन अगर सरकार केवल इतना कहे कि ‘ग्राहक से पैसा नहीं लिया जाएगा’ और मूल सवाल—नीति बदल क्यों रही है?—का जवाब न दे, तो शक खत्म होने के बजाय और बढ़ेगा।

UPI भारत की कामयाबी है, इसे ट्रेड डील की सौदेबाजी मत बनने दीजिए

UPI को किसी सामान्य निजी पेमेंट ऐप की तरह देखना बड़ी भूल होगी। यह भारत की डिजिटल क्षमता की दुनिया भर में पहचानी जाने वाली उपलब्धियों में से एक है। करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं और लाखों छोटे कारोबारियों के लिए QR कोड आज कैश बॉक्स जितना सामान्य हो चुका है। इस व्यवस्था की नीति बदलने का फैसला इसलिए बेहद सोच-समझकर होना चाहिए। अगर भारत को अपने बैंकों और फिनटेक कंपनियों की आर्थिक मजबूती के लिए MDR चाहिए, तो सरकार खुलकर बताए और उस पर देश में बहस हो। लेकिन अगर विदेशी कंपनियों को खुश करने या ट्रेड डील की कोई बाधा हटाने के लिए UPI की बुनियादी व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है, तो देश को यह जानने का पूरा अधिकार है। भारत की डिजिटल सफलता किसी ट्रेड डील की छोटी-सी सौदेबाजी की चीज नहीं हो सकती।

आज ग्राहक से पैसा नहीं कट रहा—इसलिए डर नहीं, लेकिन सवाल जरूर पूछिए

फिलहाल सबसे जरूरी तथ्य यही है कि UPI ग्राहक पर सीधे कोई नया सामान्य शुल्क लागू हो चुका है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। सरकार के मुताबिक MDR व्यापारी से जुड़ा शुल्क है और अंतिम व्यवस्था अभी तय होनी बाकी है। इसलिए लोगों में यह डर फैलाना कि अब हर QR स्कैन पर पैसा कटेगा, गलत होगा। लेकिन इसका उलटा भी सही नहीं कि कोई बदलाव ही नहीं हो रहा। जीरो-MDR व्यवस्था से जुड़े कानूनी ढांचे में बदलाव की दिशा में सरकार बढ़ी है और इसलिए यह जानना जरूरी है कि आगे क्या होने वाला है। जब किसी व्यवस्था का इस्तेमाल करोड़ों लोग रोज करते हों तो “अभी कुछ नहीं हुआ” कहकर भविष्य के असर पर सवाल बंद नहीं किए जा सकते।

आखिर फैसला दिल्ली का है या वॉशिंगटन की नाराजगी का भी असर है?

पूरी कहानी घूम-फिरकर इसी एक सवाल पर आकर टिकती है। भारत सरकार अगर कहती है कि UPI को लंबे समय तक मजबूत और सुरक्षित रखने के लिए आर्थिक मॉडल बदलना जरूरी है, तो वह देश के सामने आंकड़े रखे और समझाए। अगर छोटे व्यापारियों को बचाने के लिए विशेष व्यवस्था होगी, तो अभी बताए। अगर आम ग्राहक पर कोई असर नहीं पड़ेगा, तो उसकी गारंटी व्यवस्था में साफ दिखाई दे। और सबसे महत्वपूर्ण—अगर अमेरिकी दबाव का इस फैसले से कोई संबंध नहीं है, तो इसे भी पूरी पारदर्शिता से स्पष्ट किया जाए। क्योंकि संयोग ऐसा है कि अमेरिका UPI और RuPay की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है और इसी बीच भारत जीरो-MDR व्यवस्था में बदलाव का रास्ता खोल रहा है।

इसलिए सवाल तीखा है और पूछा जाना चाहिए—जिस UPI को भारत ने अपनी डिजिटल आजादी, नवाचार और ताकत की मिसाल बनाया, उसकी अगली शर्त भारत अपने लोगों की जरूरत देखकर तय करेगा या Visa – Mastercard के कारोबारी हित और ट्रंप प्रशासन की नाराजगी भी दिल्ली की कलम पकड़ेंगे? UPI भारत की सफलता है। उसका भविष्य भी भारत के हित में तय होना चाहिए—न कि किसी ‘अंकल सैम’ के दबाव में।

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