राष्ट्रीय/ कानून | ABC NATIONAL NEWS | लखनऊ | 4 सितंबर 2026
ब्रिटिश नागरिकता के दावे पर हाईकोर्ट में बड़ा झटका
राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाने वाली याचिका को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। 31 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभिषेक कुमार चौधरी की पीठ ने याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए उसे वापस ली गई याचिका के रूप में खारिज कर दिया। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं और इस आधार पर उनकी रायबरेली लोकसभा सदस्यता पर भी सवाल उठाया था। लेकिन सुनवाई के दौरान जब अदालत ने इस दावे के समर्थन में ठोस दस्तावेज मांगे, तो याचिकाकर्ता ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके जो इस आरोप को प्रमाणित करता हो।
बड़ा दावा, लेकिन सबूत के नाम पर कुछ नहीं
याचिका में दावा किया गया था कि राहुल गांधी ने वर्ष 2003 में ब्रिटेन में बैकऑप्स लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई थी और कंपनी से जुड़े रिकॉर्ड में खुद को निदेशक, बड़े शेयरधारक और ब्रिटिश नागरिक बताया था। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि अगर वह ब्रिटिश नागरिक हैं तो भारत के नागरिक के रूप में लोकसभा चुनाव कैसे लड़ सकते हैं। लेकिन अदालत के सामने जब इस दावे का आधार पूछा गया, तो याचिकाकर्ता ब्रिटेन के कंपनी रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड, कंपनी के गठन से जुड़े दस्तावेज या राहुल गांधी द्वारा खुद को ब्रिटिश नागरिक घोषित किए जाने का कोई दस्तावेज पेश नहीं कर पाए।
‘राउल विंची’ के पत्र से राहुल गांधी की नागरिकता साबित नहीं हुई
अदालत के सामने याचिकाकर्ताओं की ओर से जिस दस्तावेज का सहारा लिया गया, वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़ा एक पत्र था, जिसमें ‘राउल विंची’ नाम के व्यक्ति की पढ़ाई से संबंधित जानकारी थी। अदालत ने साफ कहा कि यह दस्तावेज राहुल गांधी के ब्रिटिश नागरिक होने के आरोप को किसी भी तरह साबित नहीं करता। यानी जिस दावे के आधार पर एक सांसद की नागरिकता और लोकसभा सदस्यता पर सवाल उठाया जा रहा था, उसके समर्थन में अदालत के सामने संबंधित कंपनी के रिकॉर्ड तक पेश नहीं किए जा सके।
कोर्ट ने कहा—दावा आकर्षक हो सकता है, लेकिन प्रमाण कहां है?
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की दलील पहली नजर में आकर्षक और दूरगामी असर वाली दिखाई देती है, लेकिन जब उसके आधार के बारे में पूछा गया तो कोई ठोस दस्तावेज सामने नहीं रखा जा सका। यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अदालत में किसी व्यक्ति की नागरिकता जैसे गंभीर संवैधानिक और कानूनी सवाल को केवल आरोप या अनुमान के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। उसके लिए प्रमाण और आधिकारिक रिकॉर्ड जरूरी होते हैं।
याचिका वापस लेने की मांग, कोर्ट ने दी अनुमति
जब याचिकाकर्ता अदालत के सामने आरोप के समर्थन में जरूरी दस्तावेज नहीं दिखा सके, तो उन्होंने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने इसकी अनुमति दे दी और याचिका को वापस ली गई याचिका के रूप में खारिज कर दिया। इसका मतलब यह है कि इस विशेष याचिका में अदालत ने राहुल गांधी को ब्रिटिश नागरिक घोषित नहीं किया और न ही याचिकाकर्ताओं के आरोपों को सही ठहराया।
यह मामला यहीं पूरी तरह खत्म नहीं होता
हालांकि इस याचिका को वापस लेने की अनुमति मिल गई, लेकिन राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर एक व्यापक सवाल केंद्र सरकार के स्तर पर पहले से लंबित बताया गया है। अदालत ने पुराने मामलों का भी उल्लेख किया, जिनमें 2015 और 2019 में इसी तरह के सवाल उठाए गए थे। 2015 के मामले में अदालत ने कहा था कि नागरिकता समाप्त होने या विदेशी नागरिकता हासिल करने से जुड़े सवाल पर फैसला करने का अधिकार नागरिकता कानून की धारा 9(2) के तहत केंद्र सरकार के पास है। 2019 में भी संबंधित पक्ष को केंद्र सरकार के सामने अपना मामला रखने की स्वतंत्रता दी गई थी।
राजनीतिक आरोप और अदालत में प्रमाण—दोनों अलग चीजें
राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी आरोप लगते रहे हैं। लेकिन इस मामले ने एक बुनियादी बात फिर सामने रख दी है—किसी बड़े राजनीतिक आरोप को अदालत में साबित करने के लिए ठोस दस्तावेज जरूरी होते हैं। इस मामले में अदालत के सामने ब्रिटिश कंपनी के आधिकारिक रिकॉर्ड या राहुल गांधी की ओर से ब्रिटिश नागरिकता स्वीकार करने वाला कोई दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका। इसलिए इस विशेष याचिका को आगे बढ़ाने के बजाय याचिकाकर्ता ने उसे वापस ले लिया।
सबसे बड़ा संदेश—नागरिकता का फैसला आरोपों से नहीं, प्रमाण से होगा
इस पूरे मामले का सबसे अहम निष्कर्ष यही है कि राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता साबित करने वाला कोई ठोस दस्तावेज इस याचिका में अदालत के सामने नहीं रखा गया। अदालत ने जिस आधार पर याचिका वापस लेने की अनुमति दी, वह सबूतों की कमी थी। हालांकि नागरिकता से जुड़ा व्यापक प्रश्न केंद्र सरकार के समक्ष लंबित होने की बात अदालत के रिकॉर्ड में है, इसलिए इस आदेश को यह कहकर पेश करना भी सही नहीं होगा कि नागरिकता से जुड़े हर संभावित विवाद का अंतिम न्यायिक फैसला हो चुका है। लेकिन इस विशेष याचिका में ब्रिटिश नागरिक होने का दावा प्रमाणित नहीं हो सका और याचिका वापस ले ली गई।




