अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बैंकॉक | 3 अक्टूबर 2026
चीन ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। चीन और लाओस ने लाओस की राजधानी वियनतियाने के उत्तर में स्थित बान केउन एयरफील्ड में संयुक्त उड़ान प्रशिक्षण एवं सहायता केंद्र शुरू किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह चीन का विदेश में पहला एयरफोर्स बेस है और इससे बीजिंग की क्षेत्रीय सैन्य पहुंच को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
चीन अब तक विदेशों में मुख्य रूप से नौसैनिक ठिकानों और सैन्य सुविधाओं के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाता रहा है। लेकिन लाओस में एयरफोर्स से जुड़ी इस संयुक्त सुविधा की शुरुआत को उसके सैन्य प्रभाव के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
पहली बार एयरफोर्स की विदेशी मौजूदगी
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के दक्षिण-पूर्व एशिया विशेषज्ञ जोशुआ कुर्लांट्जिक के मुताबिक, लाओस की यह सुविधा चीन का विदेश में पहला एयरफोर्स बेस है। उनका आकलन है कि चीन भविष्य में क्षेत्र के अन्य मित्र देशों में भी ऐसी सुविधाएं स्थापित करने की कोशिश कर सकता है।
चीन और लाओस दोनों ने इस केंद्र को मुख्य रूप से लाओस की वायुसेना के पायलटों के प्रशिक्षण के लिए बताया है। चीन के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि केंद्र का संचालन दोनों देशों द्वारा सामान्य गतिविधियों के लिए किया जाएगा और इसका उद्देश्य किसी तीसरे देश को निशाना बनाना नहीं है।
लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि पायलटों को प्रशिक्षण देने के लिए चीन को वहां अपने विमान, सैन्य प्रशिक्षक और दूसरे उपकरण तैनात करने पड़ सकते हैं। ऐसे में प्रशिक्षण केंद्र धीरे-धीरे चीन की सैन्य मौजूदगी का आधार भी बन सकता है।
प्रशिक्षण से सैन्य तैनाती तक?
सुरक्षा शोधकर्ता कोलिन कोह का कहना है कि लाओस में प्रशिक्षण गतिविधियों के लिए चीन की सैन्य संपत्तियों की मौजूदगी स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है। उनके अनुसार, प्रशिक्षण से शुरू होने वाली गतिविधियां आगे चलकर सैन्य उपस्थिति का रूप ले सकती हैं।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बान केउन में कितने चीनी सैन्यकर्मी तैनात होंगे या किस तरह के विमान और सैन्य उपकरण वहां रखे जाएंगे।
विशेषज्ञों ने यह संभावना भी जताई है कि भविष्य में इस सुविधा का इस्तेमाल चीनी वायुसेना के लिए क्षेत्रीय ठहराव या लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में हो सकता है। हालांकि, फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
चीन का सैन्य नेटवर्क पहले से विस्तार पर
विदेशी सैन्य ठिकानों के मामले में चीन अभी भी अमेरिका से काफी पीछे है। चीन ने अपना पहला विदेशी सैन्य बेस 2017 में अफ्रीकी देश जिबूती में स्थापित किया था। लाल सागर और अदन की खाड़ी के पास स्थित इस बेस को बाद में विस्तारित किया गया।
चीन ने कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे के विकास में भी मदद की है। थाईलैंड की खाड़ी में स्थित इस सुविधा को लेकर अमेरिका ने पहले चिंता जताई थी कि इससे चीन को दक्षिण चीन सागर के नजदीक रणनीतिक सैन्य पहुंच मिल सकती है।
अब लाओस में एयरफोर्स से जुड़ी सुविधा शुरू होने के बाद चीन की सैन्य गतिविधियों का दायरा केवल समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने की चर्चा तेज हो गई है।
अमेरिका और क्षेत्रीय देश रखेंगे नजर
चीन की इस नई पहल पर अमेरिका के साथ-साथ वियतनाम और थाईलैंड जैसे क्षेत्रीय देश भी नजर रख रहे हैं। खासकर यह देखा जाएगा कि लाओस में चीनी सैन्य मौजूदगी भविष्य में कितनी बढ़ती है और क्या प्रशिक्षण सुविधा के साथ स्थायी सैन्य संसाधन भी तैनात किए जाते हैं।
हालांकि, एशिया के सैन्य मामलों के विशेषज्ञ कार्ल थायर ने तत्काल किसी बड़े संकट की संभावना को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है। उनका कहना है कि बान केउन की क्षमता फिलहाल हल्के विमानों और प्रशिक्षण विमानों तक सीमित हो सकती है। उनके अनुसार, यह सुविधा अभी जिबूती या कंबोडिया के रीम बेस जैसी रणनीतिक क्षमता वाली नहीं है।
लाओस के लिए चीन के साथ नजदीकी का फायदा
लाओस आर्थिक रूप से चीन पर काफी निर्भर है और चीन उसका सबसे बड़ा ऋणदाता भी है। नई सैन्य सुविधा से लाओस को पायलट प्रशिक्षण, सैन्य उपकरण और अन्य सहयोग मिलने की उम्मीद है।
विश्लेषकों के मुताबिक, बीजिंग के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना लाओस के लिए सैन्य और आर्थिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
लेकिन व्यापक तस्वीर में यह घटनाक्रम चीन की ‘विदेशी सैन्य पहुंच’ की बदलती रणनीति की ओर भी संकेत करता है। लाओस में एयरफोर्स सुविधा के जरिए चीन ने पहली बार दक्षिण-पूर्व एशिया के भीतर अपनी वायु सैन्य उपस्थिति के लिए एक नया रास्ता खोला है।
फिलहाल यह सुविधा प्रशिक्षण केंद्र है या भविष्य में चीन के बड़े सैन्य नेटवर्क की कड़ी बनेगी—इसका जवाब आने वाले वर्षों में चीन की तैनाती और गतिविधियों से ही मिलेगा।



