अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग/वॉशिंगटन | 23 अप्रैल 2026
चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी टैरिफ नीति का सामना करते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा, लेकिन अब ईरान युद्ध ने उसकी आर्थिक रफ्तार पर नया दबाव डालना शुरू कर दिया है। वर्षों से जारी अमेरिका-चीन व्यापार तनाव के बावजूद बीजिंग ने अपनी सप्लाई चेन, निर्यात और घरेलू उत्पादन के दम पर संतुलन बनाए रखा, मगर मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष ने उसकी सबसे बड़ी ताकत—निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था—को सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही धीमी वृद्धि, बेरोज़गारी और वैश्विक मांग में गिरावट जैसी चुनौतियों से जूझ रही थी। ऐसे में ईरान युद्ध ने एक और झटका दिया है। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर इसका असर साफ दिख रहा है, जहां फैक्ट्री ऑर्डर घट रहे हैं और उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मध्य-पूर्व संकट के चलते ऊर्जा, प्लास्टिक, कॉपर और एल्यूमिनियम जैसे कच्चे माल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे चीनी कंपनियों का मुनाफा घट रहा है और कई निर्यातक नुकसान में काम करने को मजबूर हैं।
चीन की ताकत उसकी तैयारी रही है। ट्रंप के टैरिफ युद्ध के दौरान भी उसने वैकल्पिक बाजारों की तलाश, घरेलू निवेश और सप्लाई चेन में बदलाव के जरिए खुद को संभाला। हालांकि, 2025–26 में अमेरिका द्वारा 100% से अधिक तक टैरिफ बढ़ाने और फिर कानूनी व राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद चीन ने अपने निर्यात तंत्र को पूरी तरह टूटने नहीं दिया। लेकिन अब समस्या अलग है—यह व्यापार नीति नहीं, बल्कि वैश्विक युद्ध का असर है, जो मांग, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स तीनों को प्रभावित कर रहा है।
ईरान युद्ध के चलते वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आया है, जो 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुका है। इसका सीधा असर चीन के उद्योगों पर पड़ा है। हालांकि चीन ने ऊर्जा के मामले में खुद को काफी हद तक सुरक्षित रखा है—उसके पास बड़े भंडार, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और रूस-मध्य एशिया से पाइपलाइन सप्लाई मौजूद है—फिर भी महंगे ईंधन और परिवहन लागत ने निर्यात कारोबार को कमजोर किया है।
सबसे बड़ा असर मांग पर पड़ा है। यूरोप और मध्य-पूर्व जैसे बड़े बाजारों में अस्थिरता के कारण चीनी उत्पादों की मांग घट रही है। कई विदेशी खरीदार कीमतों में लगातार बदलाव से हिचक रहे हैं, जिससे नए ऑर्डर कम हो रहे हैं। चीन के बड़े व्यापार मेलों में भी इसका असर दिखा, जहां कंपनियों ने ग्राहकों की कमी और घटते सौदों की शिकायत की।
इसके अलावा, वैश्विक सप्लाई चेन भी प्रभावित हुई है। युद्ध के कारण समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ा है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर। इससे शिपिंग लागत बढ़ी है और डिलीवरी में देरी हो रही है। चीन के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर है।
फिर भी, चीन पूरी तरह संकट में नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उसने लंबे समय से ऊर्जा विविधीकरण, घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक बाजारों की रणनीति अपनाकर खुद को कई देशों से बेहतर स्थिति में रखा है। यही कारण है कि जहां कई देश ऊर्जा संकट और महंगाई से बुरी तरह जूझ रहे हैं, वहीं चीन अब भी अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई देता है। लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो चीन की अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गहरा हो सकता है। ट्रंप के टैरिफ से चीन को झटका जरूर लगा था, लेकिन वह उससे उबर गया। अब असली चुनौती ईरान युद्ध है, जो सीधे उसकी आर्थिक नसों—ऊर्जा, निर्यात और वैश्विक मांग—पर असर डाल रहा है। आने वाले महीनों में यह तय करेगा कि चीन इस नए संकट से कितनी तेजी से उबर पाता है या उसे लंबी आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ता है।




