अंतरराष्ट्रीय डेस्क | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अगस्त 2026
अमेरिका और चीन के बीच चल रही व्यापारिक खींचतान अब एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। व्हाइट हाउस की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए कई दूसरे देशों के रास्ते अपने सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत, कनाडा, मैक्सिको, जापान और दक्षिण कोरिया समेत 40 से अधिक देशों का नाम इस प्रक्रिया में सामने आया है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि इस तरह की व्यवस्था के जरिए चीन ने उन सामानों पर लगने वाले शुल्क से बचने की कोशिश की, जिन पर सीधे चीन से अमेरिका पहुंचने पर अधिक टैरिफ लगता। अमेरिकी व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने इसे अमेरिकी नौकरियों और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाला कदम बताया है। हालांकि, चीन ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और कहा है कि व्यापार युद्ध में किसी की जीत नहीं होती। चीन ने यह भी कहा कि तीसरे देशों से होकर जाने वाले सामान के संबंध में एकतरफा कार्रवाई से उन देशों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘ट्रांसशिपमेंट’ नाम की व्यापारिक प्रक्रिया है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि किसी देश में बना सामान सीधे अमेरिका भेजने के बजाय पहले किसी तीसरे देश में भेजा जाए और फिर वहां से अमेरिका पहुंचाया जाए। ऐसा करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। वैश्विक व्यापार में कंपनियां कई बार अलग-अलग देशों के जरिए अपनी सप्लाई चेन चलाती हैं। समस्या तब पैदा होती है जब किसी उत्पाद के वास्तविक मूल देश को छिपाकर उसे दूसरे देश का सामान दिखाया जाए और इस तरह कम टैरिफ का लाभ लेने की कोशिश की जाए। अमेरिकी रिपोर्ट में चीन पर इसी तरह की गतिविधियों का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ मामलों में सामान की पैकेजिंग बदलने या दस्तावेजों के जरिए उसके वास्तविक स्रोत को छिपाने की कोशिश की गई। अमेरिका ने इसे कागजी प्रक्रिया के पीछे छिपी कथित टैरिफ चोरी बताया है।
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में अलग-अलग अनुमानों के आधार पर कहा गया है कि 30 अरब डॉलर से लेकर लगभग 300 अरब डॉलर तक का सामान ऐसे व्यापारिक रास्तों से गुजर सकता है। हालांकि यह एक अनुमानित दायरा है और अलग-अलग स्रोतों के आंकड़े काफी अलग हैं। इसलिए इसे चीन द्वारा निश्चित रूप से इतनी राशि की टैरिफ चोरी के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असली मुद्दा यह है कि अमेरिका अब वैश्विक सप्लाई चेन पर ज्यादा कड़ी नजर डाल रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने यह भी कहा है कि ट्रांसशिपमेंट की पहचान करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे आने वाले समय में उन कंपनियों और देशों के लिए चुनौती बढ़ सकती है जिनकी अर्थव्यवस्था चीन के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत का नाम इस रिपोर्ट में आना निश्चित रूप से ध्यान देने वाली बात है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत पर अमेरिका ने चीन की टैरिफ चोरी में शामिल होने का कोई अंतिम आरोप सिद्ध कर दिया है। वैश्विक व्यापार में भारत की चीन के साथ बड़ी व्यापारिक कड़ियां हैं और कई उत्पादों की सप्लाई चेन एक से अधिक देशों से होकर गुजरती है। इसलिए किसी सामान का चीन से भारत आना और फिर किसी दूसरे बाजार तक पहुंचना अपने आप में अवैध व्यापार का प्रमाण नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि सामान वास्तव में कहां बना, उसमें कितना मूल्य भारत में जोड़ा गया और उसके मूल देश से जुड़े दस्तावेज कितने सही हैं। यही कारण है कि भारत के लिए इस पूरे मामले में पारदर्शी दस्तावेज, मजबूत कस्टम जांच और स्पष्ट ‘Rules of Origin’ यानी सामान के वास्तविक मूल देश की पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत के लिए यह स्थिति एक चुनौती के साथ-साथ अवसर भी बन सकती है। अगर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चीन से जुड़ी सप्लाई चेन के जोखिम को कम करना चाहती हैं, तो भारत के पास अपने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने का मौका है। लेकिन इसके लिए केवल दूसरे देशों से आने वाले कारोबार को भारत के रास्ते आगे भेजना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऐसी उत्पादन क्षमता विकसित करनी होगी जिसमें वास्तविक निर्माण, तकनीक, रोजगार और मूल्यवर्धन देश के भीतर हो। इससे भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए एक भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी उत्पादन केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
अमेरिका-चीन की लड़ाई अब तीसरे देशों को भी प्रभावित कर सकती है
इस विवाद का बड़ा असर वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। अमेरिका और चीन पहले से ही टैरिफ, तकनीक, रणनीतिक उद्योगों और सप्लाई चेन को लेकर आमने-सामने हैं। अब यदि अमेरिका तीसरे देशों के रास्ते आने वाले चीनी सामान पर भी सख्ती बढ़ाता है, तो उन देशों की कंपनियों पर भी अतिरिक्त जांच और अनुपालन का दबाव बढ़ सकता है। इससे कारोबार की लागत बढ़ सकती है और कंपनियों को अपने सप्लाई नेटवर्क में बदलाव करना पड़ सकता है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन के साथ गहराई से जुड़े देशों के लिए यह नई चुनौती हो सकती है, क्योंकि उन्हें एक तरफ चीन के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने हैं और दूसरी तरफ अमेरिका के नियमों का भी पालन करना है।
आने वाले समय में यह मुद्दा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित बातचीत में भी महत्वपूर्ण बन सकता है। अमेरिका यह तर्क दे सकता है कि यदि चीनी सामान तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचता रहा, तो केवल चीन पर सीधे टैरिफ लगाना पर्याप्त नहीं होगा। दूसरी तरफ चीन यह कह सकता है कि अमेरिका व्यापारिक नीतियों के नाम पर दूसरे देशों और कंपनियों पर भी दबाव बढ़ा रहा है। ऐसे में व्यापार विवाद केवल अमेरिका और चीन के बीच नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन का हर बड़ा खिलाड़ी इसके प्रभाव में आ सकता है।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता संतुलन और पारदर्शिता का है। एक ओर चीन के साथ वैध व्यापार जारी रहना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध हैं। दूसरी ओर भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी जमीन का इस्तेमाल किसी भी तरह की गलत व्यापारिक गतिविधि के लिए न हो। इसके लिए कस्टम और व्यापार निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है, संदिग्ध आयात-निर्यात की डिजिटल निगरानी बढ़ाई जा सकती है और कंपनियों के लिए मूल देश से जुड़े दस्तावेजों की जांच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही, जिन भारतीय कंपनियों का कारोबार वास्तविक उत्पादन और मूल्यवर्धन पर आधारित है, उन्हें अनावश्यक जांच या व्यापारिक बाधाओं से बचाने के लिए स्पष्ट नियम और तेज प्रक्रियाएं जरूरी होंगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को इस विवाद को केवल जोखिम के रूप में नहीं देखना चाहिए। चीन-अमेरिका व्यापार तनाव वैश्विक कंपनियों को वैकल्पिक उत्पादन केंद्र तलाशने के लिए प्रेरित कर सकता है और भारत इस बदलाव का बड़ा लाभ उठा सकता है। इसके लिए भारत को विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, कौशल, तकनीक और निर्यात गुणवत्ता पर लगातार काम करना होगा। यदि भारत दूसरे देशों के लिए केवल एक ‘ट्रांजिट रूट’ बनने के बजाय वास्तविक उत्पादन और नवाचार का केंद्र बनता है, तो इससे रोजगार और निर्यात दोनों को लाभ मिल सकता है।
अंततः इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापार केवल माल खरीदने और बेचने का नाम नहीं है, बल्कि सप्लाई चेन, तकनीक, डेटा, नियम और भरोसे का भी खेल है। अमेरिका की कार्रवाई और चीन पर लगाए गए आरोपों के बीच भारत को किसी पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय अपने आर्थिक हितों, पारदर्शी व्यापार और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी। अगर भारत अपनी व्यापार निगरानी व्यवस्था मजबूत करता है, वास्तविक विनिर्माण को बढ़ावा देता है और वैश्विक कंपनियों के लिए भरोसेमंद साझेदार बनता है, तो अमेरिका-चीन के बीच बढ़ता तनाव भारत के लिए चुनौती के साथ-साथ एक बड़ा आर्थिक अवसर भी बन सकता है।




