पटना, 29 अक्टूबर 2025 | रिपोर्ट — विशेष संवाददाता
जब पूरे बिहार में छठ घाटों पर श्रद्धा, अनुशासन और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा था — उसी वक्त मौत ने 108 परिवारों के घरों में मातम का दीया जला दिया। घाटों पर डूबते सूरज को अर्घ्य देने निकले श्रद्धालु प्रशासन की लापरवाही के कारण खुद लहरों में डूब गए।
आस्था का यह सागर अचानक अफ़रातफ़री, चीख़ों और बेबसी के मंजर में बदल गया।
चुनावी बिहार और सोया हुआ सिस्टम
इस समय बिहार चुनावी सरगर्मी से उबल रहा है। हर गली में “वोट चोर गद्दी छोड़” का शोर है। नेता रैलियों में व्यस्त हैं, वोट समीकरण गढ़े जा रहे हैं, पोस्टर-बैनर और सोशल मीडिया प्रचार में सत्ता की साख तौली जा रही है।
पर इसी बीच, जब जनता आस्था में डूबी थी, तब पूरा प्रशासनिक अमला चुनावी तैयारियों, VIP दौरों और वोट गिनती के हिसाब-किताब में उलझा था। नतीजा — घाटों पर कोई प्रभारी नहीं, कोई समय पर गश्त नहीं, और न ही पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम।
क्या यही “सुशासन” है, जहाँ त्योहार पर श्रद्धालु डूब रहे हैं और प्रशासन वोट मैनेजमेंट की मीटिंगों में व्यस्त है?
त्रासदी का भूगोल — हर ज़िले में मातम
पटना, नालंदा, वैशाली, बेगूसराय, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, औरंगाबाद — कोई जिला अछूता नहीं रहा।
नालंदा में 8, वैशाली में 7, मुजफ्फरपुर में 7, और पटना में 13 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है।
कुल 108 श्रद्धालुओं की मौत, 10 अब भी लापता — यह सिर्फ आंकड़े नहीं, ये बिहार की टूटती संवेदनशीलता का चार्ट हैं।
लोगों ने बताया — कई घाटों पर रोशनी नहीं थी, फिसलनभरी सीढ़ियाँ टूटी थीं, और दलदल से भरे किनारों पर कोई चेतावनी बोर्ड नहीं लगा था। एनडीआरएफ और गोताखोर दल घंटों बाद पहुँचे। स्थानीय युवक रस्सियों और बांस के सहारे शव निकालते रहे, जबकि अधिकारी घटना के बाद फोटो सेशन में दिखाई दिए।
त्योहार या त्रासदी: प्रशासन की दोहरी भूमिका
- हर साल छठ से पहले “तैयारी पूरी है” की घोषणाएँ होती हैं — लेकिन इस बार यह तैयारियाँ सिर्फ प्रेस नोट तक सीमित रहीं।
- घाटों पर कोई स्थायी योजना नहीं, कोई डिज़ाइन गाइडलाइन नहीं।
- नतीजा — लाखों की भीड़, लेकिन ज़िम्मेदारी शून्य।
सरकार ने अब जांच के आदेश और मुआवज़े की घोषणा कर दी है — पर सवाल वही है:
- क्या छठ जैसे पर्व पर हर साल प्रशासन की जवाबदेही सिर्फ मुआवज़े के चेक तक सीमित रहेगी?
जनता का सवाल — “हमारे पर्व की सुरक्षा कौन करेगा?”
छठ सिर्फ पूजा नहीं, यह जीवनशैली है। यह वह पर्व है जहाँ औरतें दो दिन निर्जला रहकर पूरे परिवार की मंगलकामना करती हैं। लेकिन जब घाटों पर वही औरतें अपने बच्चों के शव ढूँढ़ती नज़र आएँ — तो यह सिर्फ एक त्रासदी नहीं, बल्कि शासन की आत्मा पर कलंक है। घाट पर रोते हुए एक बुज़ुर्ग ने कहा, “हमने सूर्य भगवान से सुख माँगा था, सरकार ने हमें शोक दिया।” यह वाक्य शायद पूरे बिहार के दर्द को बयान करता है।
अब जनता जागे — जनभागीदारी ही उपाय
अब वक्त है कि प्रशासन नहीं, जनता और समाज खुद आगे आए। एनजीओ, स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामाजिक संगठन मिलकर स्थायी छठ घाटों की सुरक्षा मानक तय करें। आपदा प्रबंधन को हर साल औपचारिकता नहीं, बल्कि जनता से जुड़ा अभियान बनाया जाए। आस्था को वोट के बीच कुचला नहीं जा सकता — और अगर सरकारें अपनी प्राथमिकता तय नहीं करेंगी, तो जनता जरूर कर देगी।
यह हादसा नहीं, चेतावनी है
छठ में डूबी ये 108 ज़िंदगियाँ सिर्फ लापरवाही का परिणाम नहीं — यह “मानव निर्मित आपदा” है। यह उस तंत्र की लाश है जो लोगों की सुरक्षा से ज़्यादा अपनी सत्ता बचाने में व्यस्त है। बिहार को अब यह तय करना होगा कि अगली सुबह सूर्य अर्घ्य के साथ उठेगा — या सिस्टम की अंधेरी रात और लंबी होगी। क्योंकि यह सिर्फ छठ की त्रासदी नहीं, यह प्रशासन की संवेदनशीलता की परीक्षा है — और इस बार वह बुरी तरह फेल हुआ है।



