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लखनऊ में ब्राह्मण विधायकों का सहभोज: सियासी मुलाक़ात या शक्ति प्रदर्शन? योगी राज में बीजेपी के अंदर हलचल तेज़

अनिल यादव | लखनऊ 25 दिसंबर 2025

उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर अंदरूनी सरगर्मियों से गर्म है। राजधानी लखनऊ में मंगलवार रात बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों और विधान परिषद सदस्यों का एक साथ जुटना महज़ सामाजिक भोज नहीं रहा, बल्कि इसने सत्ता और संगठन के भीतर चल रही बेचैनी, अपेक्षाओं और संदेशों को खुलकर सामने ला दिया। यह सहभोज बीजेपी विधायक और एमएलसी पी.एन. पाठक के आवास पर हुआ, जहां प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आए ब्राह्मण चेहरे एक ही मेज़ पर बैठे, साथ भोजन किया और देर रात तक बातचीत होती रही। बाहर से देखने पर यह एक सांस्कृतिक-सामाजिक मिलन जैसा लग सकता है, लेकिन सियासत में ऐसे दृश्य कभी भी सिर्फ संयोग नहीं होते।

इस सहभोज में शामिल विधायकों और नेताओं की सूची भी अपने-आप में संकेत देती है। अलग-अलग जिलों से आए प्रभावशाली ब्राह्मण प्रतिनिधि, जिनकी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन है, एक मंच पर दिखाई दिए। चर्चा में विकास, संगठन, सरकार के कामकाज और भविष्य की राजनीतिक दिशा जैसे विषय बताए जा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मुलाक़ात बीजेपी के भीतर संतुलन और हिस्सेदारी को लेकर एक सामूहिक संवाद भी थी। खासकर ऐसे समय में जब लोकसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति नए समीकरणों से गुजर रही है और जातिगत संतुलन को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार लगातार सख़्त प्रशासन और मजबूत नेतृत्व की छवि पेश करती रही है, लेकिन पार्टी के भीतर अलग-अलग सामाजिक समूह अपनी भूमिका और प्रतिनिधित्व को लेकर सजग भी हैं। ब्राह्मण समुदाय लंबे समय से बीजेपी का अहम आधार रहा है और ऐसे में विधायकों का एकजुट होकर मिलना यह संदेश देता है कि वे खुद को केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा मानते हैं। यह सहभोज न तो खुला विद्रोह था और न ही कोई औपचारिक बैठक, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक इशारा था जो बिना बोले बहुत कुछ कह जाता है।

राजनीति में भोजन की मेज़ अक्सर विचारों और रणनीतियों की मेज़ बन जाती है। लखनऊ की इस रात भी यही हुआ। कैमरों के सामने भले ही इसे सौहार्द और आपसी मेल-मिलाप बताया गया हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में इसे बीजेपी के भीतर शक्ति संतुलन और आने वाले समय की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ आपसी संवाद तक सीमित रहेगा या आने वाले दिनों में इसके असर संगठन और सरकार के फैसलों में भी दिखाई देंगे। फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह सहभोज एक साधारण घटना नहीं, बल्कि एक गूंज छोड़ने वाला सियासी संकेत बन चुका है।

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