राष्ट्रीय | शोभिक सरकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 मई 2026
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए साफ कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना कोई अपराध नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वैचारिक विरोध और विद्रोह भड़काने के बीच स्पष्ट अंतर होता है, और दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। यह मामला एक याचिका से जुड़ा था, जिसे सिमरन गुप्ता नाम की महिला ने दाखिल किया था। उन्होंने राहुल गांधी के एक बयान को आधार बनाते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी ने 2025 में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि वे भाजपा, आरएसएस और भारत सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, जिससे लोगों की भावनाएं आहत हुईं और इसे देश को अस्थिर करने वाला बयान बताया गया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि संसदीय लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना न सिर्फ स्वीकार्य है, बल्कि जरूरी भी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी नीति या विचारधारा के खिलाफ बोलना और लोगों को विद्रोह के लिए उकसाना दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि अगर किसी नीति का विरोध करता है या अपनी राजनीतिक लड़ाई की बात करता है, तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि राहुल गांधी का बयान एक इंटरव्यू के दौरान दिया गया था, जो सामान्य राजनीतिक चर्चा का हिस्सा था। जब तक यह साबित न हो कि किसी बयान से सीधे तौर पर हिंसा या विद्रोह भड़काने की मंशा थी, तब तक उसे आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 152 के प्रावधानों का भी जिक्र करते हुए कहा कि कानून खुद इस तरह के मामलों में कुछ अपवाद देता है।
इससे पहले यह मामला संभल की एक अदालत में गया था, जहां एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया गया था। उसी फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 8 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है।
इस फैसले के साथ अदालत ने यह संदेश भी दिया है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना की जगह बनी रहनी चाहिए। राजनीतिक बयानबाजी को सीधे अपराध की नजर से नहीं देखा जा सकता, जब तक कि उसमें साफ तौर पर कानून तोड़ने या हिंसा फैलाने की मंशा न हो।




