राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 अक्टूबर 2026
लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुनना सरकार की जिम्मेदारी होती है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जन आंदोलन और सत्ता से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी प्रक्रियाओं का हिस्सा है। लेकिन दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ कांग्रेस के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले राजघाट पर जमावड़े पर रोक लगाए जाने के बाद विपक्ष ने सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का सवाल है कि अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण है और विपक्ष अपनी मांग लोकतांत्रिक तरीके से जनता और संस्थाओं के सामने रखना चाहता है, तो उसे बार-बार रोका क्यों जा रहा है?
विपक्ष का आरोप है कि पिछले कुछ दिनों में राहुल गांधी समेत विपक्षी सांसदों को प्रदर्शन और मार्च के दौरान हिरासत में लिया गया और उन्हें चुनाव आयोग तक अपनी बात पहुंचाने से रोका गया। अब राजघाट पर भी रोक लगाए जाने से यह सवाल और गंभीर हो गया है कि आखिर लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह कहां बची है। विपक्ष का कहना है कि संसद के भीतर सवाल पूछने और संसद के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से जनता के मुद्दे उठाने का अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण है।
राहुल गांधी और विपक्षी दल SIR तथा मतदाता सूची से जुड़े सवालों को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांग रहे हैं। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर रहा है। सरकार और चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग जवाब दिए गए हैं, जबकि दिल्ली पुलिस कानून-व्यवस्था और निर्धारित नियमों के तहत कार्रवाई की बात कह रही है। लेकिन राजनीतिक विवाद का मूल सवाल अब यही है—क्या शांतिपूर्ण असहमति को रोकना लोकतांत्रिक संवाद का विकल्प हो सकता है?
राजघाट महात्मा गांधी की समाधि है—वह स्थान जो अहिंसा, सत्य और शांतिपूर्ण संघर्ष की विरासत का प्रतीक माना जाता है। ऐसे स्थान पर किसी राजनीतिक प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंध की खबर अपने आप में गंभीर लोकतांत्रिक बहस खड़ी करती है। प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति और वास्तविक सुरक्षा खतरे के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए। लोकतंत्र की ताकत केवल सत्ता चलाने में नहीं, बल्कि असहमति को सहने और सवालों का जवाब देने की क्षमता में भी दिखाई देती है।
विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में सरकार से सवाल पूछने वाली राजनीतिक आवाजों पर कार्रवाई बढ़ी है और विरोध करने वाले नेताओं को हिरासत, FIR और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर दबाव के रूप में देखता है। सरकार दूसरी ओर कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और निर्धारित नियमों के पालन की आवश्यकता का हवाला देती है। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक टकराव अब लोकतंत्र में असहमति की सीमा और राज्य की शक्ति की सीमा की बड़ी बहस में बदलता जा रहा है।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए और शांतिपूर्ण विरोध को केवल इसलिए संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि वह सत्ता के खिलाफ है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, विपक्ष की भूमिका सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की आलोचना करना और जनता के मुद्दों को सामने रखना है। इसी तरह प्रशासन का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों और राजनीतिक दलों के वैध लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है।
आज सवाल सिर्फ राजघाट पर प्रदर्शन की अनुमति का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में सत्ता से असहमति जताने की आवाज को पर्याप्त लोकतांत्रिक जगह मिल रही है? अगर विपक्ष के हर प्रदर्शन का जवाब रोक, हिरासत और FIR से दिया जाएगा, तो राजनीतिक संवाद का रास्ता कमजोर होगा। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता और नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार स्थायी होना चाहिए।
महात्मा गांधी की समाधि के सामने आज का यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा तब नहीं होती जब सब सरकार के पक्ष में हों। असली परीक्षा तब होती है जब कोई सत्ता से असहमत होकर खड़ा हो, सवाल पूछे और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज जनता तक पहुंचाना चाहे। सरकार को विरोध की आवाज से लड़ने के बजाय उसके सवालों का जवाब देना चाहिए—क्योंकि लोकतंत्र में सवाल दबाए नहीं जाते, उनके जवाब दिए जाते हैं।



