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बी.पी. मंडल — 30 दिन का कार्यकाल, लेकिन सदियों तक असर : जिसने भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी

भारतीय राजनीति में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी.पी. मंडल) का नाम उन गिने-चुने नेताओं में शामिल है जो अपने पद की अवधि से नहीं, बल्कि अपने विचारों की शक्ति से अमर हो जाते हैं। 1968 में, बी.पी. मंडल ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में केवल 30 दिनों तक कार्य किया, लेकिन यह संक्षिप्त कार्यकाल ही था जिसने उन्हें भारत के सबसे निर्णायक सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन, यानी मंडल आयोग (Mandal Commission), का चेहरा बना दिया। उनके इस एक ऐतिहासिक निर्णय ने देश की सामाजिक और जातीय संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया और भारतीय लोकतंत्र को उसकी समावेशी आत्मा के करीब ला दिया।

बी.पी. मंडल के योगदान का वास्तविक और स्थायी प्रभाव 1979 में शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने उन्हें मंडल आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया। इस आयोग का एकमात्र और महत्वपूर्ण उद्देश्य था — भारत की सामाजिक संरचना में पिछड़े वर्गों (OBCs) की स्थिति का गहन अध्ययन करना और उन्हें समान अवसर दिलाने के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करना। बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में, आयोग ने व्यापक सामाजिक-आर्थिक सर्वे किए और 1980 में अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी सिफारिश थी: सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण दिया जाए, जिसने सामाजिक न्याय की दिशा में एक मील का पत्थर स्थापित किया।

हालांकि, मंडल रिपोर्ट 11 साल तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही। 1990 में, जब प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) ने इस सिफारिश को लागू करने की घोषणा की, तब देश की राजनीति में भूचाल आ गया। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन, आत्मदाह की दुखद घटनाएँ और तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण देखने को मिला, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक न्याय के एक नए युग का भी सूत्रपात हुआ। इस फैसले ने बी.पी. मंडल का नाम सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि “समानता के शिल्पकार” के रूप में स्थापित कर दिया। 1990 के दशक में शुरू हुए “मंडल बनाम कमंडल” के संघर्ष ने भारतीय राजनीति की ध्रुव रेखा को हमेशा के लिए बदल दिया।

 बी.पी. मंडल का मानना था कि सामाजिक समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि अवसर की बराबरी से आती है। उनकी विरासत ने भारतीय राजनीति को तीन स्थायी सबक दिए हैं: सत्ता में समान प्रतिनिधित्व ही स्थिरता की कुंजी है, जाति के अन्याय को खत्म करना आवश्यक है, और विकास तभी संभव है जब हर वर्ग को उसका हक मिले। इस प्रकार, बी.पी. मंडल, अपने सिर्फ एक महीने के कार्यकाल के बावजूद, वह सामाजिक और राजनीतिक क्रांति का बीज बो गए, जिसका प्रभाव आज भी हर चुनाव, हर आरक्षण नीति और हर सामाजिक विमर्श में महसूस किया जाता है।

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