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आस्था पर एक और डाका: राम मंदिर चंदे में सैकड़ों करोड़ की चोरी के बाद अब हज टेंडर में ₹350 करोड़ का घोटाला?

राष्ट्रीय / आस्था / अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 सितंबर 2026

मंदिर के चंदे पर सेंधमारी के बाद हज यात्रियों की जेब पर सीधा हमला

अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे और दान की रकम को लेकर जो खुलासे हुए हैं, उन्होंने पूरे देश को हिला दिया। महज 42-45 दिनों की जांच में करीब 70 चोरी की घटनाएं सामने आईं और लगभग ₹80 लाख बरामद हुए। अब उसी आस्था के नाम पर हज 2027 के टेंडर में एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ मंदिर का चंदा लूटा जा रहा था, दूसरी तरफ हज यात्रियों के नाम पर सैकड़ों करोड़ का संभावित अतिरिक्त बोझ थोपा जा रहा है। सवाल साफ है—आस्था का पैसा आखिर किसका है और उसका हिसाब कौन देगा?

8,717 रियाल की बोली पीछे, 9,777 रियाल वाली कंपनी आगे—क्यों?

हज 2027 के लिए भारतीय हाजियों को सऊदी अरब में आवास और व्यापक सेवाएं उपलब्ध कराने वाली निविदा अगस्त 2026 में जारी हुई। सरकारी रिकॉर्ड में साफ दिखता है कि मशारेक अल मुतमायिजाह ने प्रति हाजी 8,717.01 सऊदी रियाल की बोली लगाई, जबकि इथरा अल-खैर की बोली 9,777 रियाल प्रति हाजी रही। दोनों के बीच करीब 1,060 रियाल का फर्क है। अगर लगभग 1.22 लाख हाजियों पर यह अंतर लागू किया जाए तो करीब 12.9 करोड़ सऊदी रियाल यानी भारतीय मुद्रा में मोटे तौर पर ₹300 से 350 करोड़ का अतिरिक्त बोझ बनता है। कम बोली वाली कंपनी मौजूद थी, फिर महंगी कंपनी को ठेका क्यों दिया गया? यह सवाल अब सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि हाजियों की मेहनत की कमाई का सवाल बन चुका है।

तकनीकी अंक 92.13 का दावा सही है तो अंतिम फैसला कैसे पलट गया?

रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि मशारेक अल मुतमायिजाह ने तकनीकी मूल्यांकन में 92.13 अंक हासिल किए और तकनीकी रूप से मजबूत दावेदार साबित हुई। अगर यह आंकड़ा सही है तो फिर अंतिम चयन में वह कंपनी पीछे कैसे रह गई? क्या उसकी कम कीमत को अव्यावहारिक माना गया? क्या संचालन क्षमता पर कोई आपत्ति आई? क्या तकनीकी समिति और अंतिम निर्णय लेने वाली समिति के निष्कर्ष अलग-अलग थे? अगर हां, तो उसका लिखित कारण कहां है? सिर्फ यह कह देना कि प्रक्रिया नियमों के मुताबिक हुई, अब पर्याप्त नहीं है। सैकड़ों करोड़ के संभावित अंतर पर जवाब दस्तावेजों के साथ आना चाहिए।

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चार साल से एक ही कंपनी—क्या प्रदर्शन की स्वतंत्र जांच नहीं हो सकती?

इथरा अल-खैर को लगातार चौथी बार भारतीय हज यात्रियों की सेवा का ठेका मिलने की बात सामने आ रही है। लगातार एक कंपनी को ठेका मिलना अपने आप में अपराध नहीं है, लेकिन जब कीमत, तकनीकी मूल्यांकन और पिछले प्रदर्शन पर एक साथ सवाल उठ रहे हों तो पिछले वर्षों का रिकॉर्ड क्यों नहीं खोला जाता? हज 2026 में मक्का के अजीजिया इलाके में भारतीय हाजियों ने आवास, भीड़भाड़, साफ-सफाई, पानी और लिफ्ट को लेकर शिकायतें की थीं। क्या उन शिकायतों को इस बार के मूल्यांकन में कोई जगह दी गई? अगर दी गई तो अंक क्या रहे? अगर नहीं दी गई तो क्यों नहीं? पिछले प्रदर्शन को नजरअंदाज करके बार-बार एक ही कंपनी को आगे बढ़ाना सवाल पैदा करता है।

स्मार्टवॉच से लेकर आवास तक—हर सुविधा का हिसाब कहां है?

हज 2026 में स्मार्टवॉच की खरीद भी चर्चा में रही थी। कुछ यात्रियों ने बैटरी और काम करने की क्षमता को लेकर शिकायतें की थीं। हज यात्रियों से अगर किसी सुविधा का पैसा लिया जाता है तो उसकी कीमत, गुणवत्ता जांच और खराब सुविधा मिलने पर जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए। सरकारी खरीद का सिद्धांत यही है कि पैसा जनता का है तो हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए। धर्म के नाम पर इस सिद्धांत को कमजोर नहीं किया जा सकता।

₹7,500 करोड़ का शोर छोड़िए, ₹300-350 करोड़ के सवाल का जवाब दीजिए

सोशल मीडिया पर ₹6,750 करोड़ और ₹7,500 करोड़ जैसे बड़े आंकड़े घूम रहे हैं। लेकिन उपलब्ध बोली के आंकड़ों से इतनी रकम सीधे साबित नहीं होती। वास्तविक अंतर लगभग 1,060 रियाल प्रति हाजी का है, जो 1.22 लाख हाजियों पर करीब ₹300-350 करोड़ बैठता है। अगर यह अतिरिक्त बोझ वास्तव में नहीं पड़ रहा तो सरकार अपनी गणना सार्वजनिक करे। और अगर पड़ रहा है तो बताए कि ज्यादा कीमत वाली कंपनी को चुनने के पीछे ऐसा कौन सा अतिरिक्त लाभ था जिसके लिए इतना बड़ा अंतर स्वीकार किया गया।

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राम मंदिर और हज—मामले अलग, लेकिन जवाबदेही का सिद्धांत एक

अयोध्या में हुई चोरी की जांच और हज 2027 का टेंडर दो अलग मामले हैं। एक की जांच दूसरे में भ्रष्टाचार साबित नहीं करती। लेकिन दोनों घटनाएं एक ही बुनियादी सवाल सामने रखती हैं—धार्मिक आस्था से जुड़ा पैसा आखिर किसका है? राम मंदिर में दान की रकम पर सुरक्षा और निगरानी की कमियां जांच के दायरे में आईं। अब हज के मामले में अगर सैकड़ों करोड़ के संभावित अंतर का सवाल उठ रहा है तो उसकी जांच और स्पष्टीकरण भी उतनी ही गंभीरता से होना चाहिए। धर्म अलग हो सकता है, व्यवस्था अलग हो सकती है, लेकिन जनता के पैसे की जवाबदेही का सिद्धांत अलग नहीं हो सकता।

सरकार को बयानबाजी नहीं, दस्तावेज पेश करने चाहिए

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने कहा है कि चयन निर्धारित और संरचित प्रक्रिया से हुआ, गुणवत्ता, क्षमता और संचालन तैयारी को ध्यान में रखा गया। लेकिन जब सवाल इतने बड़े हों तो सिर्फ बयान काफी नहीं। तकनीकी अंकतालिका, वित्तीय बोलियां, अंतिम मूल्यांकन का आधार और पिछले वर्षों का प्रदर्शन रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। अगर कम बोली वाली कंपनी में कोई कमी थी तो बताए। अगर महंगी कंपनी बेहतर थी तो उसके अंक दिखाए। अगर कीमत और गुणवत्ता के संतुलन से फैसला हुआ तो पूरा फॉर्मूला सामने रखे।

हाजियों की जेब कोई प्रयोगशाला नहीं

हज पर जाने वाला व्यक्ति सरकारी ठेकेदार नहीं होता। वह अपनी जिंदगी भर की बचत से यह यात्रा करता है। कई परिवार सालों तक थोड़ा-थोड़ा जोड़कर हज का सपना पूरा करते हैं। प्रति हाजी करीब 1,060 रियाल का संभावित अंतर सिर्फ कागज का आंकड़ा नहीं है। यह हजारों परिवारों के लिए वास्तविक आर्थिक बोझ बन सकता है। इसलिए हज व्यवस्था को सिर्फ प्रशासनिक टेंडर मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह लाखों लोगों के विश्वास और उनकी मेहनत की कमाई से जुड़ा विषय है।

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सात सवाल जिनका जवाब अभी तक नहीं मिला

कम बोली वाली कंपनी क्यों पीछे हुई? तकनीकी मूल्यांकन में 92.13 अंक का दावा सही है या नहीं? 9,777 रियाल वाली कंपनी को अंतिम बढ़त किस आधार पर मिली? चार साल से एक ही कंपनी को ठेका मिलने के पीछे प्रदर्शन रिकॉर्ड क्या है? हज 2026 की शिकायतों का इस बार के मूल्यांकन में क्या असर पड़ा? ₹300-350 करोड़ के संभावित अतिरिक्त बोझ की गणना सही है या गलत? और अगर पूरी प्रक्रिया साफ है तो पूरी टेंडर फाइल जनता के सामने रखने में दिक्कत क्या है?

आस्था का पैसा हो तो हिसाब भी आस्थावानों के सामने होना चाहिए

राम मंदिर का चंदा हो या हज यात्रियों का शुल्क—धर्म अलग हो सकता है, लेकिन हिसाब का कानून एक होना चाहिए। अगर हज टेंडर साफ है तो पूरी फाइल खोलिए। अगर ₹300-350 करोड़ का सवाल गलत है तो आंकड़ों के साथ जवाब दीजिए। और अगर सवाल सही है तो बताइए—हाजियों की जेब पर इतना संभावित अतिरिक्त बोझ आखिर क्यों थोपा जा रहा है? मंदिर हो या मक्का, चंदा हो या हज शुल्क—आस्था के नाम पर खर्च होने वाला हर रुपया जवाबदेही मांगता है।

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