भारत आज़ादी के 78 वर्ष पूरे कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब “अमृतकाल” की बात करते हैं, तो वे एक ऐसे भारत का सपना दिखाते हैं जो 2047 तक “विश्वगुरु” बन जाएगा — एक ऐसा राष्ट्र जो ज्ञान, विकास और समृद्धि में दुनिया का मार्गदर्शन करेगा। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इस दावे से बिल्कुल उलट है। आज का भारत ज्ञान का नहीं, भूख और असमानता का गुरु बन चुका है। ये वही भारत है जहां मुट्ठीभर अरबपति आसमान छू रहे हैं, जबकि करोड़ों आम नागरिक रोटी के एक टुकड़े के लिए तरस रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि मोदी राज में भारत की अर्थव्यवस्था ने नहीं, बल्कि अंबानी-अडानी की संपत्ति ने उड़ान भरी है।
मोदी राज में देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की संपत्ति ने दस वर्षों में जो छलांग लगाई है, वह चौंकाने वाली है। 2014 में मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति $18.6 अरब (लगभग ₹1.5 लाख करोड़) थी, जो 2024 में बढ़कर $119.5 अरब (₹9.5 लाख करोड़) हो गई। यानी दस साल में उनकी दौलत में लगभग आठ लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। इसी तरह, गौतम अडानी की संपत्ति 2014 में $7.1 अरब (₹57,000 करोड़) थी, जो 2024 में बढ़कर $116 अरब (₹9.3 लाख करोड़) हो गई। यानी दस साल में उन्होंने आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जोड़ी। इन दोनों की संपत्ति की यह वृद्धि सामान्य कारोबारी सफलता नहीं बल्कि सरकारी नीति की पक्षपातपूर्ण दिशा का परिणाम है। कोयला, बिजली, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा और दूरसंचार — हर क्षेत्र में इन दो नामों की पकड़ मज़बूत होती गई और बाकी भारतीय उद्योग धीरे-धीरे किनारे कर दिए गए।
इसी अवधि में भारत का ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) बुरी तरह गिर गया। 2014 में भारत की रैंक 55 थी, जो 2025 में फिसलकर 102 पर आ गई। यह सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक त्रासदी है — एक ऐसा आईना जो दिखाता है कि देश में अमीरों की तिजोरी भरी है लेकिन गरीबों की थाली खाली। यह वही भारत है जहां ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा गूंजा, लेकिन नतीजा रहा ‘कुछ का साथ, कुछ का विकास’। पिछले एक दशक में महंगाई ने गरीबों की थाली छोटी कर दी, रोजगार की कमी ने युवाओं को हताश किया और किसानों को आत्महत्या तक मजबूर कर दिया। जिन वादों के सहारे जनता ने “अच्छे दिन” की उम्मीद की थी, वे आज केवल जुमले बनकर रह गए हैं।
मोदी सरकार का पूरा आर्थिक मॉडल अब तीन शब्दों में सिमट गया है — “अडानी, अंबानी और एजेंसी”। इन तीनों के इर्द-गिर्द नीति, पूंजी और प्रचार घूमते हैं। सरकारी बैंक जहां आम आदमी के दस हज़ार रुपये के लोन पर नोटिस भेजते हैं, वहीं अरबों रुपये के कर्ज़दार उद्योगपतियों को “स्ट्रेटेजिक पार्टनर” कहा जाता है। देश में जहां सरकारी संपत्तियाँ जैसे एयरपोर्ट, रेल परियोजनाएँ, और कोयला ब्लॉक धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रही हैं, वहीं सरकार इसे “विकास” और “निजीकरण” का नाम देकर जनसमर्थन की कहानी बुनती है। यह ‘Ease of Doing Business’ का दौर नहीं, बल्कि ‘Ease of Looting Business’ का युग है — जहां नीतियाँ आम जनता के लिए नहीं, कुछ खास घरानों के हित में बनाई जाती हैं।
All India Bank Employees’ Association (AIBEA) की रिपोर्ट इस झूठे विकास के पर्दे को हटाती है। रिपोर्ट बताती है कि भारत की GDP में जो वृद्धि दिखाई जा रही है, उसका 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ शीर्ष 1% लोगों के पास जा रहा है। बाकी 99% भारतीयों की आय या तो स्थिर है या घट रही है। इसका मतलब यह है कि भारत अमीर नहीं हो रहा, बल्कि असमानता में डूबता जा रहा है। यह वह दौर है जहां विकास का मतलब है — एक तरफ अरबों की संपत्ति और दूसरी तरफ भूख से तड़पती जनता। यही वजह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में आज भी लाखों बच्चे बिना भोजन के सो जाते हैं।
सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान इस हकीकत को ढकने के लिए “विश्वगुरु” का नारा उछालते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब देश में हर चौथा बच्चा कुपोषित है, हर दूसरा युवा बेरोज़गार है, और हर तीसरा परिवार कर्ज़ में डूबा हुआ है, तो भारत किस चीज़ का विश्वगुरु बनेगा? शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार — ये तीन स्तंभ जो किसी भी विकसित राष्ट्र की नींव होते हैं, भारत में आज सबसे कमज़ोर स्थिति में हैं। सरकारी स्कूलों की हालत बदतर है, अस्पतालों में दवाइयाँ नहीं हैं, और युवाओं के पास न नौकरी है न सुरक्षा। “विकास” का यह मॉडल एक झूठी चमक है जो दिल्ली-मुंबई के मीडिया स्टूडियो तक सीमित है, गाँव-कस्बों की सच्चाई इससे बिल्कुल विपरीत है।
मोदी राज में ‘अमृतकाल’ की जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह दरअसल ‘असमानताकाल’ की असली तस्वीर है। लोकतंत्र की जड़ों में पूंजीवाद का ज़हर घुल चुका है। संसद में अब बहस नहीं, सौदे होते हैं; मीडिया में अब सवाल नहीं, स्तुति होती है; और जनता की आवाज़ को ‘एंटी-नेशनल’ कहकर दबा दिया जाता है। देश के भविष्य पर पूंजीपतियों की मुहर लग चुकी है। जहां पहले सरकारें जनता की थीं, अब सरकारें निवेशकों की हो गई हैं। यह व्यवस्था गरीबों के लिए नारे बनाती है और अमीरों के लिए नीतियाँ। यही है “नया भारत” — एक ऐसा भारत जो ऊपर से चमकता है और भीतर से सड़ता है।
अगर भारत को वाकई विश्वगुरु बनना है, तो उसे भूख और गरीबी से लड़ना होगा, न कि उन्हें ढंकने के लिए प्रचार अभियान चलाना होगा। भूख, बेरोज़गारी और असमानता किसी भी देश की प्रगति के सबसे बड़े दुश्मन हैं। भारत का असली विकास तब होगा जब किसान आत्महत्या नहीं करेगा, जब हर युवा को रोज़गार मिलेगा, और जब कोई बच्चा भूखा नहीं सोएगा। लेकिन आज का भारत इन मूलभूत बातों से कोसों दूर है।
आज जब सरकार अपनी उपलब्धियाँ गिनाती है — तो GDP की रफ्तार, एक्सपोर्ट का ग्राफ, विदेशी निवेश और डिजिटल इंडिया की बातें की जाती हैं। मगर यह कोई नहीं बताता कि इस “विकास” के बीच गरीबी बढ़ी है, असमानता बढ़ी है, भूख बढ़ी है। जो लोग यह कहने की हिम्मत करते हैं, उन्हें “देशविरोधी” ठहरा दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जो देश अपने नागरिकों को दो वक्त की रोटी नहीं दे सकता, वह विश्वगुरु नहीं, भूखगुरु कहलाने लायक है।
मोदी राज ने देश को विश्वगुरु नहीं, भूखगुरु बना दिया है। यह वह भारत है जहां अमीरों की थाली में सोना है और गरीब की थाली में सन्नाटा। जहां सरकारें अडानी-अंबानी के मुनाफे पर खुश हैं और जनता महंगाई के बोझ तले दब रही है। जहां विकास की भाषा में प्रचार की मिठास है और सच्चाई की कड़वाहट को छिपा दिया गया है। भारत आज भी वही है — एक ओर चमकता हुआ कॉरपोरेट इंडिया, दूसरी ओर भूख से बिलखता आम भारत। और जब तक यह खाई पाटी नहीं जाती, तब तक कोई भी नारा, कोई भी वादा, भारत को विश्वगुरु नहीं बना सकता।



