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EVM सेटिंग का आरोप: पुष्पम प्रिया बोलीं—बटन ऊपर से बदले गए

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बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूचाल लाने वाला बयान आया है—और इस बार यह आरोप किसी साधारण कार्यकर्ता का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी स्पष्टवादिता के लिए जानी जाने वाली नेता पुष्पम प्रिया चौधरी का है। उन्होंने X (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट में दावा किया है कि दरभंगा में उनके नामांकन के तुरंत बाद EVM की बटन पोज़ीशन को “ऊपर से” बदल दिया गया, जिससे संदेह का एक नया सिलसिला शुरू हो गया है। उनके अनुसार, स्थानीय स्तर पर पहले बताया गया था कि चुनावी मशीन में क्रम 6 पर महागठबंधन के उमेश सहनी, 7 पर वह खुद—पुष्पम प्रिया—और 8 पर जनसुराज के आर.के. मिश्रा होंगे। लेकिन, सिर्फ 24 घंटे के भीतर आदेश बदल दिया गया और क्रम 5, 6, 7 कर दिया गया। वह दावा करती हैं कि यह बदलाव एक ऐसे ‘ट्रांसफ़र फॉर्मूले’ को बचाने के लिए किया गया, जिसके मुताबिक़ 6 नंबर का वोट सीधे बीजेपी उम्मीदवार संजय सरावगी के लिए ट्रांसफ़र होना था। उनकी दलील में यह भी शामिल है कि यदि महागठबंधन 6वें नंबर पर रहता, तो “सेटिंग” पकड़ी जा सकती थी—इसलिए बटन ऊपर-नीचे कर दिए गए।

पुष्पम प्रिया का आरोप यहीं खत्म नहीं होता। वह कहती हैं कि “मशीन में एक बार जो ट्रांसफ़र फॉर्मूला सेट हो चुका था, उसे बदलना संभव नहीं था”। इसी वजह से मतगणना के दौरान कई बूथों पर असामान्य परिणाम सामने आए—ऐसे बूथ जहाँ मुस्लिम वोटरों की अधिकता के कारण बीजेपी को परंपरागत रूप से वोट मिलना लगभग असंभव माना जाता है, वहां अचानक रिकॉर्ड वोट बीजेपी उम्मीदवार के खाते में जाते दिखाई दिए। वह दावा करती हैं कि यहां तक कि बीजेपी के खुद के काउंटिंग एजेंट भी चौंक गए, क्योंकि जिन इलाकों से उनकी पार्टी को कभी वोट नहीं मिलता था, वहाँ भी वोट “जादुई तरीके से” बढ़े हुए दिख रहे थे। पुष्पम प्रिया कहती हैं—“मेरे पास हर बूथ के इतने प्रमाण हैं कि इस बार पर्दाफ़ाश तय है। इस बार गलती इतनी बड़ी है कि अब इसे छुपाया नहीं जा सकेगा।”

इन आरोपों के बाद उन्होंने राजनीतिक दबाव और धमकियों की आशंका भी जताई है। उनके अनुसार, आने वाले दिनों में लालच, समझौते की कोशिशें, फिर दबाव, और अंत में सरकारी एजेंसियों—ED, CBI, EC—के नोटिसों का हमला शुरू हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में जब भी कोई नेता सत्ता से टकराते हुए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, तो उसके खिलाफ अक्सर यही क्रम चलता है—पहले प्रलोभन, फिर धमकी, और आखिर में चरित्र हनन की मशीनरी पूरी ताकत से सक्रिय हो जाती है। सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी, आईटी सेल और संगठन के कट्टर समर्थक व्यक्तिगत हमलों, अफवाहों और चरित्र पर कीचड़ उछालने में देर नहीं लगाते। पुष्पम प्रिया अपनी पोस्ट में इस डर को बेहद स्पष्ट शब्दों में लिखती हैं—“अब मुझे लालच भी दिया जाएगा, नहीं मानी तो धमकाया जाएगा… और फिर चरित्र हत्या की जाएगी।”

इसी पोस्ट के दूसरे हिस्से में उन्होंने एक तीखा सवाल उछाला है—“क्या आप तैयार हैं, पुष्पम प्रिया चौधरी?”

यह सवाल वे खुद से नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र, मीडिया और जनता से पूछती दिखाई देती हैं। क्योंकि यह लड़ाई केवल एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता अधिकार और लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ी है।

उनका संदेश स्पष्ट है—अगर उन्होंने जो देखा, उसे सच मानकर वह लड़ाई लड़ने जा रही हैं, तो सत्ता की पूरी ताकत उनके खिलाफ उतर सकती है। लेकिन अगर उनके आरोप सही हैं, तो यह बिहार ही नहीं, भारत के लोकतंत्र के लिए एक बेहद गंभीर क्षण है।

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