एबीसी नेशनल न्यूज | 16 जनवरी 2026
एक बार फिर देश की चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नागरिक संगठन वोट फॉर डेमोक्रेसी ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एक विस्फोटक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें दावा किया गया है कि एनडीए ने व्यापक चुनावी धांधली के ज़रिये 103 सीटों पर जीत दर्ज की। संगठन का कहना है कि अगर यह कथित धांधली नहीं होती, तो न तो एनडीए की सरकार बन पाती और न ही नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनते। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया एक योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी गई, जिसमें चुनाव आयोग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
“ऑडिट ऑफ द स्टोलेन मैंडेट” नाम से जारी इस रिपोर्ट में वोट फॉर डेमोक्रेसी ने चुनाव आयोग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों का गहन विश्लेषण करने का दावा किया है। संगठन के मुताबिक, चुनाव से पहले ही एनडीए ने अपनी जीत सुनिश्चित करने की रणनीति बना ली थी और इसके लिए प्रशासनिक और चुनावी तंत्र का कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट का कहना है कि चुनाव आयोग की ओर से करवाई गई गतिविधियां सामान्य प्रक्रिया से हटकर थीं और उनका सीधा फायदा बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मिला।
रिपोर्ट में मतदाता सूचियों (वोटर लिस्ट) के विशेष गहन परीक्षण (SIR) पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। संगठन का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुईं, जिनका उद्देश्य चुनिंदा वर्गों के मतदाताओं को सूची से बाहर करना और सत्ता पक्ष के लिए अनुकूल मतदाताओं को बनाए रखना था। वोट फॉर डेमोक्रेसी का कहना है कि इन कथित गड़बड़ियों से एनडीए को सीधे तौर पर चुनावी लाभ मिला।
इसके अलावा रिपोर्ट में मतदान केंद्रों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी को भी संदेह के दायरे में रखा गया है। संगठन का दावा है कि बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की संख्या और मतदान केंद्रों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि यह बढ़ोतरी निष्पक्ष व्यवस्था के बजाय सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने के इरादे से की गई। रिपोर्ट के अनुसार, इससे मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने और परिणामों को नियंत्रित करने में मदद मिली।
वोट फॉर डेमोक्रेसी ने जीविका दीदियों के चुनाव में कथित इस्तेमाल को भी “चुनावी चोरी” का एक बड़ा ज़रिया बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी योजनाओं से जुड़ी महिलाओं के नेटवर्क का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया गया। इसके साथ ही संगठन ने मतदान और मतगणना के आंकड़ों में हेराफेरी का भी आरोप लगाया है, यह कहते हुए कि आधिकारिक आंकड़ों में कई असंगतियां पाई गई हैं, जो निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा पर सवाल खड़े करती हैं।
रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की निष्पक्षता, चुनावी पारदर्शिता और लोकतंत्र की मजबूती को लेकर नई बहस छिड़ गई है। विपक्षी दलों और नागरिक समूहों का कहना है कि इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि बिहार चुनाव वास्तव में जनता का जनादेश था या फिर “चोरी किया गया मैंडेट”। वहीं, एनडीए और चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।




