राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026
‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार ने इस सैन्य अभियान के दौरान शहीद हुए जवानों की शहादत को लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं किया और संसद समेत देश को पूरी जानकारी नहीं दी।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान शहीद हुए छह सैन्यकर्मियों के नाम एक वर्ष तक सार्वजनिक नहीं किए गए, जबकि हाल ही में उनके नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) के ‘रोल ऑफ ऑनर’ में दर्ज किए गए। कांग्रेस का दावा है कि इससे पहले सरकार ने आधिकारिक रूप से इन शहीदों की पहचान सार्वजनिक नहीं की थी।
पवन खेड़ा ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद देश की रक्षा करते हुए जान देने वाले इन जवानों को समय रहते वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। उनका आरोप है कि राष्ट्रवाद की बात करने वाली सरकार ने ही उनके सर्वोच्च बलिदान को सार्वजनिक मान्यता देने में देरी की।
कांग्रेस का यह भी आरोप है कि सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जुड़े तथ्यों को लेकर संसद और जनता के सामने पूरी तस्वीर नहीं रखी। विपक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
वहीं केंद्र सरकार का पक्ष यह रहा है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सूचनाओं को सार्वजनिक करने का समय तथा स्वरूप सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। सरकार ने हाल ही में शहीद हुए छह सैन्यकर्मियों के नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के ‘रोल ऑफ ऑनर’ में शामिल किए हैं और उन्हें आधिकारिक सम्मान दिया है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य अभियानों और उनसे जुड़ी जानकारी को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच लगातार राजनीतिक बहस चल रही है। कांग्रेस इस मुद्दे पर संसद में जवाबदेही की मांग कर रही है, जबकि सरकार अपने फैसलों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य प्रक्रियाओं के अनुरूप बता रही है।
अब इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सूचना साझा करने और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है, या फिर विपक्ष के आरोपों के अनुसार सरकार को ऐसे मामलों में संसद और जनता के प्रति अधिक पारदर्शी होना चाहिए। यही बहस आने वाले दिनों में राजनीतिक और संसदीय विमर्श का प्रमुख विषय बन सकती है।




