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SIR के बाद बंगाल में 22.21 लाख वोटरों का पेंच, दोबारा नाम जुड़वाने के रास्ते पर बड़ा सवाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

SIR के बाद नई मुश्किल—22.21 लाख मामलों का क्या होगा?

पश्चिम बंगाल में Special Intensive Revision (SIR) के बाद मतदाता सूची से जुड़े मामलों में एक नया पेच सामने आया है। चुनाव आयोग की ओर से SIR के दौरान छूट गए मतदाताओं को दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने के लिए Form-6 के जरिए विशेष घर-घर अभियान चलाने की बात कही गई है, लेकिन यह व्यवस्था उन मतदाताओं पर लागू नहीं होगी जिनके मामले पहले से अपीलीय ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसे 22.21 लाख अपीलें ट्रिब्यूनलों के सामने लंबित हैं। अब सवाल यह है कि इन लोगों के मतदाता अधिकार की बहाली कितनी जल्दी और किस रास्ते से होगी।

दो रास्ते, दो अलग-अलग रफ्तार—यहीं से बढ़ा सवाल

पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि SIR के बाद मतदाता सूची में दोबारा नाम शामिल कराने के लिए अब दो अलग-अलग रास्ते दिखाई दे रहे हैं। एक रास्ता उन लोगों के लिए है जो Form-6 के जरिए Electoral Registration Officer यानी ERO के पास आवेदन करेंगे। दूसरा रास्ता उन लोगों का है जिनके मामले पहले ही अपीलीय ट्रिब्यूनल में चल रहे हैं। चुनाव आयोग ने Form-6 के आवेदनों को लगभग एक से दो महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर, ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों की सुनवाई में काफी अधिक समय लग सकता है। यही अंतर अब उन लाखों मतदाताओं के लिए चिंता का विषय बन रहा है जिनके मामले पहले से न्यायिक प्रक्रिया में हैं।

22 लाख से ज्यादा लोग पहले से कानूनी प्रक्रिया में

चुनाव आयोग के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 22.21 लाख अपीलें अपीलीय ट्रिब्यूनलों के सामने लंबित हैं। यानी इन मामलों में मतदाताओं की स्थिति पहले से विवाद या समीक्षा की प्रक्रिया में है। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि ऐसे मामलों को सामान्य Form-6 प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे पहले से ही ट्रिब्यूनल के सामने विचाराधीन हैं। आयोग का तर्क है कि इन मामलों को अलग रखना जरूरी है क्योंकि उन पर पहले से adjudication की प्रक्रिया चल रही है।

Form-6 वालों को जल्दी राहत, ट्रिब्यूनल वालों को लंबा इंतजार?

यहीं से पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। यदि Form-6 के जरिए आवेदन करने वाले किसी व्यक्ति का नाम एक-दो महीने में दोबारा जुड़ सकता है, लेकिन ट्रिब्यूनल में लंबित मामला वर्षों तक चल सकता है, तो दोनों श्रेणियों के मतदाताओं के लिए इंतजार का समय एक जैसा नहीं रहेगा। इससे एक ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें एक ही SIR प्रक्रिया से प्रभावित दो नागरिकों को मतदाता सूची में वापस आने के लिए अलग-अलग समय और अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़े। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में समयबद्ध और स्पष्ट प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चुनाव के समय मतदाता सूची में नाम होना सीधे मतदान के अधिकार से जुड़ा है।

ASDD सूची की भी होगी दोबारा जांच

SIR की Enumeration Phase के बाद तैयार की गई ASDD सूची—Absent, Shifted, Dead और Duplicate श्रेणियों में आने वाले नामों को लेकर भी प्रक्रिया जारी है। चुनाव आयोग के अनुसार, Booth Level Officers यानी BLOs दोबारा जांच करेंगे कि कहीं कोई पात्र मतदाता इस प्रक्रिया में छूट तो नहीं गया। लेकिन जिन लोगों के मामले पहले से अपीलीय ट्रिब्यूनल में लंबित हैं, उन्हें अलग श्रेणी में रखा गया है। आयोग का कहना है कि उनके मामले पहले से adjudication के अधीन हैं, इसलिए उन्हें सामान्य re-enrolment अभियान में शामिल नहीं किया जाएगा।

असली सवाल—मतदाता कितने समय तक इंतजार करेगा?

इस पूरी प्रक्रिया ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—अगर कोई व्यक्ति खुद को वैध मतदाता मानता है और उसका मामला ट्रिब्यूनल में लंबित है, तो उसे अपना नाम मतदाता सूची में वापस पाने के लिए कितने समय तक इंतजार करना होगा? यह सवाल केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं है। मतदाता सूची में नाम किसी नागरिक के चुनावी अधिकार की बुनियादी कड़ी है। इसलिए SIR के बाद बाहर रह गए लोगों के लिए पुनः नामांकन की प्रक्रिया जितनी स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध होगी, उतना ही मतदाता का भरोसा मजबूत होगा।

बंगाल का मामला अब SIR की पूरी प्रक्रिया पर बड़ा सवाल

पश्चिम बंगाल का यह मामला SIR की पूरी प्रक्रिया के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती भी रखता है। एक तरफ चुनाव आयोग छूटे हुए पात्र मतदाताओं को दोबारा शामिल करने के लिए विशेष अभियान की बात कर रहा है, दूसरी तरफ लाखों मामले पहले से अपीलीय ट्रिब्यूनलों में लंबित हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों प्रक्रियाओं के बीच ऐसा समन्वय बनाया जा सकता है जिससे किसी पात्र मतदाता को केवल लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण अपने मतदान अधिकार के लिए वर्षों इंतजार न करना पड़े?

लोकतंत्र में अंतिम सवाल वोटर का है

SIR की पूरी बहस अंततः किसी राजनीतिक दल या चुनावी नारे से ज्यादा मतदाता के अधिकार पर आकर टिकती है। पश्चिम बंगाल में 22.21 लाख लंबित अपीलों का आंकड़ा बताता है कि मतदाता सूची से जुड़े विवाद छोटे पैमाने का मामला नहीं हैं। अब निगाह इस बात पर होगी कि ट्रिब्यूनलों में लंबित मामलों का निपटारा कितनी तेजी से होता है और प्रभावित मतदाताओं को कब तक स्पष्ट राहत मिलती है। क्योंकि चुनावी लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मतदाता सूची तैयार कैसे हुई—सवाल यह भी है कि जिस नागरिक का नाम सूची से बाहर हो गया, उसे वापस आने का रास्ता कितना आसान, निष्पक्ष और समयबद्ध मिला।

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