ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जून 2026
भारत में नागरिकता को लेकर बहस अब केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं रह गई है। यह करोड़ों भारतीयों की पहचान, अधिकार, भरोसे और संवैधानिक सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है। विदेश मंत्रालय ने हाल ही में स्पष्ट किया कि पासपोर्ट यात्रा और पहचान का दस्तावेज़ है, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं। इससे पहले विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज़ों की सीमाओं पर भी अलग-अलग संस्थानों के रुख सामने आए हैं। ऐसे में आम नागरिक के मन में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—आखिर वह कौन-सा दस्तावेज़ है, जिससे एक भारतीय अपनी नागरिकता निर्विवाद रूप से साबित कर सके?
विडंबना यह है कि जब कोई भारतीय विदेश जाता है, तो उसके हाथ में मौजूद भारतीय पासपोर्ट देखकर पूरी दुनिया उसे भारत का नागरिक मानती है। एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अधिकारी, विदेशी सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसी पासपोर्ट के आधार पर उसकी राष्ट्रीयता स्वीकार करती हैं। लेकिन जब यही कहा जाता है कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि जिस दस्तावेज़ के आधार पर पूरी दुनिया मुझे भारतीय मानती है, क्या वही दस्तावेज़ मेरे अपने देश में मेरी नागरिकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा?
इसी बहस के बीच एक नाम बार-बार सामने आता है—अदनान सामी। पाकिस्तान में जन्मे प्रसिद्ध गायक अदनान सामी को भारत सरकार ने 1 जनवरी 2016 से भारतीय नागरिकता प्रदान की थी। उस समय केंद्र सरकार ने इस निर्णय को नए साल के एक महत्वपूर्ण फैसले के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित किया था। अदनान सामी आज भारतीय नागरिक हैं क्योंकि उन्हें भारतीय नागरिकता अधिनियम के तहत विधिवत नागरिकता प्रदान की गई। इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है।
लेकिन यहीं से आम भारतीय का सवाल शुरू होता है। यदि एक विदेशी नागरिक को भारत की नागरिकता देने की प्रक्रिया स्पष्ट और औपचारिक है, तो जन्म से भारतीय करोड़ों लोगों के लिए नागरिकता सिद्ध करने की प्रक्रिया को लेकर इतना भ्रम क्यों है? यदि पासपोर्ट अंतिम प्रमाण नहीं, आधार नहीं, वोटर आईडी नहीं, राशन कार्ड नहीं, पैन कार्ड भी नहीं—तो आखिर वह कौन-सा दस्तावेज़ है जिस पर एक आम भारतीय निश्चिंत होकर भरोसा करे?
सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2014 से 2024 के बीच आठ हजार से अधिक विदेशियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई। यह पूरी तरह भारतीय कानून के तहत हुई प्रक्रिया है। लेकिन दूसरी ओर CAA, संभावित NRC और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) जैसे मुद्दों ने नागरिकता पर नई बहस को जन्म दिया है। विपक्ष का आरोप है कि नागरिकता का प्रश्न अब प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती रही है कि उसका उद्देश्य केवल कानून के अनुसार वास्तविक नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करना और व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाना है।
राजनीतिक टिप्पणीकार प्रशांत टंडन ने इसी बहस पर व्यंग्य करते हुए सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आम भारतीय किस दस्तावेज़ के भरोसे अपनी नागरिकता साबित करेगा? उनका तर्क है कि जब लगातार अलग-अलग दस्तावेज़ों की सीमाएँ बताई जाती हैं, तो नागरिकों के मन में स्वाभाविक रूप से असमंजस और असुरक्षा पैदा होती है। यह एक राजनीतिक टिप्पणी है, लेकिन इससे उपजे प्रश्न सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं।
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। कानून अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास से भी चलता है। यदि एक आम भारतीय को यह चिंता होने लगे कि भविष्य में उससे फिर उसकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जा सकता है और उसके पास मौजूद दस्तावेज़ पर्याप्त नहीं माने जाएँगे, तो यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न भी बन जाता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि भारतीय कानून में नागरिकता का निर्धारण भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत होता है और किसी एक दस्तावेज़ को नागरिकता का सार्वभौमिक प्रमाण नहीं माना गया है। लेकिन यही कानूनी स्थिति सरकार पर यह जिम्मेदारी भी डालती है कि वह नागरिकों के सामने स्पष्ट और सरल तरीके से यह बताए कि कौन-से दस्तावेज़ पहचान के लिए हैं, कौन-से निवास के लिए हैं और किन परिस्थितियों में नागरिकता का निर्धारण किया जाता है।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना असहमति नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है। इसलिए यह पूछना भी स्वाभाविक है कि यदि विदेश में जन्मा व्यक्ति स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के तहत भारतीय नागरिक बन सकता है, तो जन्म से भारतीय करोड़ों लोगों को अपनी नागरिकता को लेकर किसी प्रकार की अनिश्चितता या भ्रम क्यों महसूस होना चाहिए?
आख़िरकार, नागरिकता केवल एक कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि राष्ट्र और नागरिक के बीच विश्वास का सबसे मजबूत बंधन होती है। और यदि वही बंधन लगातार सवालों के घेरे में आने लगे, तो सबसे बड़ी चुनौती किसी राजनीतिक दल के सामने नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास के सामने खड़ी होती है।
आज का सबसे बड़ा सवाल यही है—अदनान सामी भारतीय नागरिक हैं, यह स्पष्ट है। लेकिन क्या हर आम भारतीय उतनी ही स्पष्टता और निश्चिंतता के साथ अपनी नागरिकता साबित कर सकता है?




