भूमिका और आईपीओ का लक्ष्य
भारत के आईवियर रिटेलिंग सेक्टर के एक प्रमुख खिलाड़ी, लेंसकार्ट (Lenskart) ने 31 अक्टूबर, 2025 को अपना बहुप्रतीक्षित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) लॉन्च किया, जो बाजार में गहन जांच और बहस का विषय बन गया है। इस आईपीओ के माध्यम से कंपनी का लक्ष्य ₹7,278 करोड़ की एक बड़ी पूंजी जुटाना है। इस राशि में ₹2,150 करोड़ का नया पूंजी निवेश (Fresh Issue) शामिल है, जिसका उपयोग कंपनी के विस्तार और अन्य कॉर्पोरेट उद्देश्यों के लिए किया जाएगा, जबकि शेष राशि हिस्सेदारी की बिक्री (Offer for Sale – OFS) के रूप में मौजूदा निवेशकों द्वारा बेची जाएगी। इस आईपीओ के लिए कंपनी का मूल्यांकन (Valuation) लगभग ₹70,000 करोड़ (करीब 8 अरब डॉलर) निर्धारित किया गया है, जिसने तुरंत बाजार में तीन गंभीर और मौलिक सवाल खड़े कर दिए हैं, जो आईपीओ की पारदर्शिता और नैतिकता पर संदेह पैदा करते हैं:
- कंपनी का वैल्यूएशन सिर्फ तीन महीनों के भीतर नाटकीय रूप से आठ गुना कैसे बढ़ गया;
- क्या संस्थागत निवेशकों (जैसे म्यूचुअल फंड्स और HNIs) के साथ किसी प्रकार की पूर्व-निर्धारित या पसंदीदा डील (Pre-arranged Deal) की गई थी;
- खुद संस्थापक पियूष बंसल ने जुलाई में काफी कम दाम पर शेयर खरीदे और अब इतनी जल्दी, ऊँचे दामों पर सार्वजनिक रूप से बेचने की तैयारी क्यों की।
लेंसकार्ट की पृष्ठभूमि और बिज़नेस मॉडल की सच्चाई
लेंसकार्ट की स्थापना 2010 में पियूष बंसल द्वारा “ऑनलाइन चश्मा बेचने” के क्रांतिकारी विचार के साथ की गई थी। उस समय, बंसल ने इस मॉडल को एक नया व्यापार मॉडल बताया, यह दावा करते हुए कि “कोई ऑनलाइन चश्मा नहीं बेचता”। हालांकि, यह अवधारणा जल्द ही जमीनी हकीकत से टकरा गई। उपभोक्ताओं को बिना ट्राई किए पावर ग्लासेस खरीदना पसंद नहीं आया, क्योंकि चश्मा एक व्यक्तिगत और मेडिकल रूप से सटीक उत्पाद होता है।
इस उपभोक्ता अनिच्छा के कारण, लेंसकार्ट को अंततः अपने व्यापार मॉडल में संशोधन करना पड़ा और देशभर में भौतिक दुकानों (Stores) की एक विस्तृत श्रृंखला स्थापित करनी पड़ी, जिससे यह अनिवार्य रूप से वही पारंपरिक खुदरा मॉडल बन गया, जिसका पालन पहले से ही उद्योग के अन्य खिलाड़ी कर रहे थे। इस प्रकार, ऑनलाइन-ओनली मॉडल की अपनी शुरुआती दूरदर्शी छवि के बावजूद, कंपनी का परिचालन काफी हद तक ईंट और गारे (Brick-and-Mortar) के पारंपरिक रिटेलिंग पर निर्भर हो गया।
वित्तीय प्रदर्शन और अचानक वैल्यूएशन की छलांग
लेंसकार्ट का वित्तीय प्रदर्शन आईपीओ से पहले तक लगातार संघर्षपूर्ण रहा है। कंपनी ने लगातार तीन वित्तीय वर्षों तक घाटा दर्ज किया है: वित्त वर्ष 2022 में ₹102 करोड़ का बड़ा घाटा हुआ, जो वित्त वर्ष 2023 में थोड़ा कम होकर ₹64 करोड़ रहा, और वित्त वर्ष 2024 में यह घटकर ₹10 करोड़ हो गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि कंपनी मुश्किल से अपने घाटे को कम करने की स्थिति में थी और अभी तक लाभप्रदता (Profitability) के मार्ग पर पूरी तरह से स्थिर नहीं हुई थी।
इसके अतिरिक्त, कंपनी पर लगभग ₹300 करोड़ का कुल बकाया कर्ज (Debt) भी है। वित्तीय रूप से मुश्किल से घाटे से उबर रही एक कंपनी के लिए, अचानक ₹70,000 करोड़ का भारी-भरकम और अविश्वसनीय मूल्यांकन निर्धारित करना बाजार के विश्लेषकों और निवेशकों के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है, जिसकी व्याख्या कंपनी के हालिया परिचालन प्रदर्शन के आधार पर करना कठिन है।
चौंकाने वाला वैल्यूएशन जंप और संस्थापक का मुनाफा
इस आईपीओ के संबंध में सबसे चौंकाने वाला पहलू वह वैल्यूएशन जंप है जो सिर्फ तीन महीनों की अवधि में हुआ है। जुलाई 2025 में, संस्थापक पियूष बंसल ने कंपनी के पुराने निवेशकों से ₹222 करोड़ खर्च करके 4.26 करोड़ शेयर खरीदे थे। उस समय, इन लेनदेन के आधार पर कंपनी का कुल मूल्यांकन लगभग ₹8,700 करोड़ आँका गया था। लेकिन, केवल तीन महीने बाद, अक्टूबर 2025 में, कंपनी ने अपने आईपीओ के लिए ₹70,000 करोड़ के मूल्यांकन की घोषणा कर दी — जो जुलाई के मूल्यांकन से लगभग आठ गुना अधिक है।
इस त्वरित और अत्यधिक वृद्धि का सीधा अर्थ है कि बंसल तीन महीने की छोटी अवधि में ही लगभग ₹1,600 करोड़ का अनुमानित कागजी मुनाफा (Paper Profit) कमा सकते हैं, क्योंकि अब वही शेयर सार्वजनिक निवेशकों को कई गुना ऊँचे दामों पर बेचे जा रहे हैं। यह स्थिति केवल “बाजार का जादू” नहीं लगती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि क्या नियामक संस्थाओं (Regulators) द्वारा इस त्वरित और अत्यधिक मूल्यांकन वृद्धि में कोई चुपचाप भूमिका निभाई गई, या क्या यह एक पूर्वनियोजित रणनीति का हिस्सा था।
संदिग्ध लेनदेन और कर्ज़ के माध्यम से लाभ
जुलाई 2025 में हुए लेनदेन की पड़ताल से एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। खबर यह थी कि पियूष बंसल ने अपनी कंपनी के शेयर खरीदने के लिए ₹200 करोड़ का लोन लिया था, जब कंपनी का मूल्यांकन ₹8,500 करोड़ के आसपास था। अब, नवंबर में, उन्हीं शेयरों को ₹70,000 करोड़ के मूल्यांकन पर जनता को बेचा जा रहा है। इस रणनीति से, बंसल न केवल अपना लिया गया कर्ज चुकाने की स्थिति में होंगे, बल्कि उन्हें सैकड़ों करोड़ रुपये का त्वरित और बड़ा लाभ भी सीधे उनकी जेब में जाएगा।
यह पूरी प्रक्रिया, जिसमें कर्ज लेना, कम दाम पर शेयर खरीदना, और फिर कुछ ही महीनों में अत्यधिक ऊँचे दाम पर उसे बेचना शामिल है, मात्र चार महीनों की अवधि में पूरी हुई है। यह वित्तीय इंजीनियरिंग और लाभ कमाने की गति बाजार के विश्लेषकों के बीच “भीतर की जानकारी” (Insider Trading) और “पसंदीदा मूल्यांकन” (Favourable Valuation) के आरोपों को हवा देती है।
असली निशाना: संस्थागत निवेशक और म्यूचुअल फंड
इस आईपीओ की रणनीति को करीब से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि लेंसकार्ट का प्राथमिक लक्ष्य आम जनता या छोटे खुदरा निवेशक नहीं हैं। इसके बजाय, कंपनी का असली निशाना वे ₹65 लाख करोड़ की विशाल पूंजी है, जो आम जनता द्वारा म्यूचुअल फंड्स और अन्य बड़े वित्तीय संस्थानों में लगाई गई है। कंपनी की रणनीति इस मूलभूत समझ पर आधारित है कि “1 लाख छोटे निवेशकों से 1-1 लाख रुपये जुटाना मुश्किल है, पर 100 फंड मैनेजर से 10-10 करोड़ लेना बहुत आसान।”
यह दिखाता है कि कंपनी का ध्यान बड़े, संस्थागत निवेशकों पर है, जिनके पास त्वरित और बड़ी पूंजी उपलब्ध है। इसलिए, यह आशंका है कि आईपीओ लॉन्च होने से पहले ही, बड़े-बड़े डील 5-स्टार होटलों, बिजनेस क्लबों और बंद कमरों में पहले ही तय (Pre-fixed) किए जा चुके होंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि फंड मैनेजर सार्वजनिक पूंजी का उपयोग करके इस ऊँचे मूल्यांकन पर शेयर खरीदें।



